श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 8

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः | भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || ८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
प्रकृतिम्
प्रकृति
स्वाम्
अपनी
अवष्टभ्य
अधीन करके
विसृजामि
उत्पन्न करता हूँ
पुनः पुनः
बार-बार
भूत-ग्रामम्
सम्पूर्ण प्राणियों के समूह
इमम्
इस
कृत्स्नम्
समस्त
अवशम्
विवश
प्रकृतेः
प्रकृति के
वशात्
वश में होने से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस समस्त प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से विवश होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान प्रकृति के नियन्ता हैं। वे प्रकृति की सहायता से सृष्टि करते हैं। प्राणी प्रकृति के गुणों से बंधे होते हैं, इसलिए अवश होते हैं। भगवान उनकी सृष्टि करते हैं, लेकिन वे स्वयं बंधन में नहीं आते।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं इस सम्पूर्ण प्राणी-समूह को बार-बार उत्पन्न करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होने से विवश है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सृष्टि के कर्ता हैं, किन्तु वे प्रकृति से परे हैं। जीव प्रकृति से बंधा है, इसलिए उसे जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ना पड़ता है। ईश्वर की शरण में जाकर ही इस बंधन से मुक्ति मिल सकती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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श्लोक 8/34 24% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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