मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे | ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || १||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदश्रीभगवान्
भगवान ने
उवाच
कहा
इदम्
यह
तु
तो
ते
तुम्हें
गुह्यतमम्
अति गोपनीय
प्रवक्ष्यामि
कहूँगा
अनसूयवे
दोषदृष्टि न रखने वाले को
ज्ञानम्
ज्ञान
विज्ञान-सहितम्
विज्ञान (अनुभव) सहित
यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
मोक्ष्यसे
तू मुक्त हो जाएगा
अशुभात्
अशुभ (संसार-बन्धन) से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्री भगवान् बोले: तू निंदारहित है, इसलिये तुझको मैं विज्ञान सहित इस ज्ञान को जो कि सबसे अधिक गोपनीय है, अब कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जायेगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान कृष्ण अर्जुन को सबसे गोपनीय ज्ञान देने का वचन देते हैं। "अनसूयवे" का अर्थ है जो ईर्ष्या या आलोचना से मुक्त हो। ऐसा व्यक्ति ही इस ज्ञान को ग्रहण करने का अधिकारी है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अर्जुन को, जो दोषदृष्टि से रहित है, सबसे गोपनीय ज्ञान और उसके अनुभव (विज्ञान) को बताएंगे, जिसे जानकर वह समस्त अशुभ (संसार-बंधन) से मुक्त हो जाएगा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ज्ञान केवल सैद्धांतिक नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे अनुभव (विज्ञान) में भी लाना आवश्यक है। जो साधक निंदा-भाव से रहित होता है, वही परम तत्व को समझ सकता है और मोक्ष का अधिकारी बनता है।