मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदये
who
तु
but
धर्म्य-अमृतम्
the nectar of righteousness
इदम्
this
यथा-उक्तम्
as described
पर्युपासते
follow
श्रद्दधाना
endowed with faith
मत्-परमा
having Me as the supreme
भक्ता
devotees
ते
they
अतीव
exceedingly
मे
to Me
प्रिय
dear.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु जो इस धर्म्य अमृत (भक्तियोग) को, जैसा ऊपर कहा गया है, श्रद्धा सहित, मुझ परम परायण होकर सेवन करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान ने भक्त के लक्षण बताने के बाद कहा कि जो इस प्रकार वर्णित भक्तियोग का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं। यहाँ "अतीव" शब्द विशेष बल देता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
परन्तु जो इस धर्ममय अमृत के समान भक्तियोग का, जैसा कहा गया है, श्रद्धापूर्वक, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर अनुसरण करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक अध्याय 12 का निष्कर्ष है। भक्तियोग का पालन श्रद्धा और एकनिष्ठता से करने वाले भक्त भगवान को अत्यधिक प्रिय होते हैं। यह भक्ति की सर्वोच्चता को स्थापित करता है।