श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 (भक्ति योग (Bhakti Yoga))

अध्याय 12 · श्लोक 1

भक्ति योग (Bhakti Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 3 मिनट का पठन 138 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
अर्जुन
Arjuna
उवाच
said
एवम्
thus
सतत-युक्ता
constantly devoted
ये
who
भक्ता
devotees
त्वाम्
You
पर्युपासते
worship
ये
who
च
and
अपि
also
अक्षरम्
the imperishable
अव्यक्तम्
the unmanifest
तेषाम्
among them
के
who
योग-वित्तमाः
the best knowers of yoga.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन ने कहा: जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपकी उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर (ब्रह्म) की उपासना करते हैं, उनमें योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ कौन हैं?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन का यह प्रश्न भक्ति और ज्ञान मार्ग की तुलना के लिए है। वह जानना चाहते हैं कि कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है। Arjuna's question sets the stage for Krishna to explain the superiority of devotion.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से पूछते हैं कि जो भक्त सदा आपकी (सगुण रूप में) उपासना करते हैं और जो अव्यक्त, अक्षर ब्रह्म (निर्गुण) की उपासना करते हैं, उन दोनों में योग का सबसे अच्छा ज्ञाता कौन है? यह प्रश्न भक्ति और ज्ञान मार्ग की तुलना के लिए है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

साधक के मन में अक्सर यह संदेह होता है कि कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है। अर्जुन का प्रश्न इसी जिज्ञासा को दर्शाता है। गुरु के लिए यह आवश्यक है कि वह शिष्य की जिज्ञासा को समझे और उचित मार्गदर्शन दे।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 12: भक्ति योग (Bhakti Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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