मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदअर्जुन
Arjuna
उवाच
said
एवम्
thus
सतत-युक्ता
constantly devoted
ये
who
भक्ता
devotees
त्वाम्
You
पर्युपासते
worship
ये
who
च
and
अपि
also
अक्षरम्
the imperishable
अव्यक्तम्
the unmanifest
तेषाम्
among them
के
who
योग-वित्तमाः
the best knowers of yoga.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्जुन ने कहा: जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपकी उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर (ब्रह्म) की उपासना करते हैं, उनमें योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ कौन हैं?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन का यह प्रश्न भक्ति और ज्ञान मार्ग की तुलना के लिए है। वह जानना चाहते हैं कि कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है। Arjuna's question sets the stage for Krishna to explain the superiority of devotion.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से पूछते हैं कि जो भक्त सदा आपकी (सगुण रूप में) उपासना करते हैं और जो अव्यक्त, अक्षर ब्रह्म (निर्गुण) की उपासना करते हैं, उन दोनों में योग का सबसे अच्छा ज्ञाता कौन है? यह प्रश्न भक्ति और ज्ञान मार्ग की तुलना के लिए है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
साधक के मन में अक्सर यह संदेह होता है कि कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है। अर्जुन का प्रश्न इसी जिज्ञासा को दर्शाता है। गुरु के लिए यह आवश्यक है कि वह शिष्य की जिज्ञासा को समझे और उचित मार्गदर्शन दे।