मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदअभ्यासे
in practice
अपि
even
असमर्थ
unable
असि
you are
मत्-कर्म-परम
intent on working for Me
भव
become
मत्-अर्थम्
for My sake
अपि
even
कर्माणि
actions
कुर्वन्
doing
सिद्धिम्
perfection
अवाप्स्यसि
you will attain.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यदि तुम अभ्यास करने में भी असमर्थ हो, तो मेरे लिए कर्म करने में तत्पर हो जाओ। मेरे लिए कर्म करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यदि अभ्यास भी न कर सको तो मेरे लिए कर्म करो। फल की इच्छा छोड़कर मुझे समर्पित भाव से कर्म करना भी सिद्धि देगा।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो, तो मेरे लिए कर्म करने में तत्पर हो जाओ। मेरे लिए कर्म करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त कर लोगे।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर के लिए किए गए कर्म भी उतने ही पवित्र हैं। फलासक्ति त्यागकर ईश्वरार्पण भाव से कर्म करना भी भक्ति का ही एक रूप है।