श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 25

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 108 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
शनैः शनैः
धीरे-धीरे
उपरमेत्
उपरत हो जाए
बुद्ध्या
बुद्धि द्वारा
धृतिगृहीतया
धैर्य से ग्रहण की हुई (युक्त)
आत्मसंस्थम्
आत्मा में स्थित
मनः
मन को
कृत्वा
करके
न
नहीं
किञ्चित्
कुछ भी
अपि
भी
चिन्तयेत्
चिन्तन करे।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपरत हो जाए, मन को आत्मा में स्थिर करके किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अभ्यास की विधि: धैर्यपूर्वक क्रमशः मन को आत्मा में स्थिर करते हुए, किसी अन्य विचार को न आने दें।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपरत हो जाए, मन को आत्मा में स्थित करके किसी अन्य वस्तु का चिन्तन न करे।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग में अभ्यास धीरे-धीरे और धैर्य से करना चाहिए। जबरदस्ती नहीं, बल्कि स्थिरता से मन को आत्मा में टिकाना है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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