मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदशनैः शनैः
धीरे-धीरे
उपरमेत्
उपरत हो जाए
बुद्ध्या
बुद्धि द्वारा
धृतिगृहीतया
धैर्य से ग्रहण की हुई (युक्त)
आत्मसंस्थम्
आत्मा में स्थित
मनः
मन को
कृत्वा
करके
न
नहीं
किञ्चित्
कुछ भी
अपि
भी
चिन्तयेत्
चिन्तन करे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपरत हो जाए, मन को आत्मा में स्थिर करके किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अभ्यास की विधि: धैर्यपूर्वक क्रमशः मन को आत्मा में स्थिर करते हुए, किसी अन्य विचार को न आने दें।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपरत हो जाए, मन को आत्मा में स्थित करके किसी अन्य वस्तु का चिन्तन न करे।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग में अभ्यास धीरे-धीरे और धैर्य से करना चाहिए। जबरदस्ती नहीं, बल्कि स्थिरता से मन को आत्मा में टिकाना है।