श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 26

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यतः यतः
जहाँ-जहाँ
निश्चरति
चला जाता है
मनः
मन
चञ्चलम्
चंचल
अस्थिरम्
अस्थिर
ततः ततः
वहाँ-वहाँ से
नियम्य
नियंत्रित करके
एतत्
इसको
आत्मनि
आत्मा में
एव
ही
वशम्
वश में
नयेत्
ले जाए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी (विषयों में) चला जाए, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके आत्मा के ही वश में कर लेना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

मन को बार-बार विषयों से हटाकर आत्मा में लगाना चाहिए। यही अभ्यास का सार है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी (विषयों की ओर) भागे, वहाँ-वहाँ से उसे हटाकर आत्मा के ही वश में कर लेना चाहिए।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग में सफलता तब मिलती है जब हर बार मन के भटकने पर उसे वापस आत्मा में टिकाया जाए। यही अभ्यास है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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