यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६॥
यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी (विषयों में) चला जाए, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके आत्मा के ही वश में कर लेना चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ६ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या
छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान योग का वर्णन करते हैं। वह आत्म-संयम, मन को वश में करने और ध्यान की विधि बताते हैं। यह अध्याय योगी के जीवन और उसके परम लक्ष्य का विस्तार से वर्णन करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ६ (ध्यान योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान योग का वर्णन करते हैं। वह आत्म-संयम, मन को वश में करने और ध्यान की विधि बताते हैं। यह अध्याय योगी के जीवन और उसके परम लक्ष्य का विस्तार से वर्णन करता है।
मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ २ / २)
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६॥
यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी (विषयों में) चला जाए, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके आत्मा के ही वश में कर लेना चाहिए।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७॥
शान्त मन वाले, शान्त हुए रजोगुण वाले, ब्रह्मभूत और निष्पाप इस योगी को परम सुख प्राप्त होता है।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८॥
इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्म के स्पर्श रूप परम सुख को भोगता है।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९॥
योगयुक्त चित्त वाला योगी सब भूतों में स्थित अपने आत्मा को और सब भूतों को अपने आत्मा में देखता है, वह सर्वत्र समदर्शी होता है।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३०॥
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता और वह मेरे लिए नष्ट नहीं होता।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१॥
जो योगी सब भूतों में स्थित मुझको एकत्व (अभेद) बुद्धि से भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही रहता है।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२॥
हे अर्जुन! जो पुरुष आत्मौपम्य (अपने सदृश) से सर्वत्र समान देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वह योगी परम (सर्वश्रेष्ठ) माना गया है।
अर्जुन उवाच । योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३॥
अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! आपने समता रूप जिस योग का वर्णन किया है, उसकी स्थिर स्थिति मैं नहीं देख पाता, क्योंकि मन चंचल है।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४॥
क्योंकि मन चंचल, प्रमाथी (क्षोभकारी), बलवान् और दृढ़ है, हे कृष्ण! मैं इसे वायु के समान वश में करना अति कठिन समझता हूँ।
श्री भगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५॥
श्री भगवान् बोले: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और दुर्निग्रह (कठिनाई से वश में होने वाला) है, हे कौन्तेय! परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में किया जा सकता है।
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६॥
असंयत चित्त वाले के लिए योग दुष्प्राप्य है, ऐसी मेरी सम्मति है; किन्तु वश में किए हुए चित्त वाला प्रयत्नशील पुरुष उचित साधन से उसे प्राप्त कर सकता है।
अर्जुन उवाच । अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७॥
अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो श्रद्धायुक्त है, परन्तु यत्नहीन है (या जिसका प्रयत्न असफल रहा है), योग से चलित मन वाला है, और योग की सिद्धि को नहीं पाता, वह किस गति को प्राप्त होता है?
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८॥
हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित हुआ उभयभ्रष्ट (दोनों से भ्रष्ट), बिना आधार का होकर, छिन्न-भिन्न बादल की भाँति नष्ट नहीं हो जाता?
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९॥
हे कृष्ण! आप इस मेरे संशय को पूर्णतः दूर करने के योग्य हैं। आपके अतिरिक्त इस संशय का छेदन करने वाला कोई और मिलना संभव नहीं है।
श्री भगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४०॥
श्री भगवान् बोले: हे पार्थ! उस (योगभ्रष्ट) का न तो इस लोक में विनाश होता है और न परलोक में। हे तात! कल्याण करने वाला कोई भी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१॥
बहुत वर्षों तक पुण्यात्माओं के लोकों में निवास करके, योगभ्रष्ट पुरुष शुद्ध और समृद्ध घर में जन्म लेता है।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२॥
अथवा वह बुद्धिमान योगियों के कुल में जन्म लेता है। निश्चय ही ऐसा जन्म इस लोक में अत्यन्त दुर्लभ है।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३॥
हे कुरुनन्दन! वहाँ वह पूर्व शरीर की बुद्धि को (योग के संस्कार को) प्राप्त करता है और फिर सिद्धि के लिए पहले से अधिक प्रयत्न करता है।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४॥
उसी पूर्वाभ्यास के वश से वह अनिच्छुक होते हुए भी (योग की ओर) खिंच जाता है। योग का जिज्ञासु भी शब्दब्रह्म (वैदिक कर्मकाण्ड) को अतिक्रमण कर जाता है।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५॥
किन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी, पूर्णतः पापरहित होकर, अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध होकर, तत्पश्चात् परम गति को प्राप्त होता है।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६॥
योगी तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और कर्मयोगियों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७॥
सब योगियों में भी जो श्रद्धावान् भक्त मेरे परायण अन्तःकरण से मुझको भजता है, वह मेरी दृष्टि में सबसे अधिक युक्त (श्रेष्ठ) है।
वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।
संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।