श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 43

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 100 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
तत्र
वहाँ
तम्
उस
बुद्धिसंयोगम्
बुद्धि के संयोग (प्राप्ति) को
लभते
प्राप्त करता है
पौर्वदेहिकम्
पूर्व शरीर का
यतते
प्रयत्न करता है
च
और
ततः
उससे
भूयः
फिर
संसिद्धौ
सिद्धि के लिए
कुरुनन्दन
हे कुरुनन्दन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुरुनन्दन! वहाँ वह पूर्व शरीर की बुद्धि को (योग के संस्कार को) प्राप्त करता है और फिर सिद्धि के लिए पहले से अधिक प्रयत्न करता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

नए जन्म में भी योगी को पूर्वाभ्यास के संस्कार मिल जाते हैं, जिससे वह पुनः प्रयत्न करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कुरुनन्दन! वहाँ वह पूर्व शरीर के बुद्धि-संयोग (योग के संस्कार) को प्राप्त कर लेता है, और फिर सिद्धि के लिए और अधिक प्रयत्न करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

पूर्वाभ्यास के संस्कार साथ आते हैं। इससे साधक को पुनः साधना में आसानी होती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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श्लोक 43/47 91% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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