मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदतत्र
वहाँ
तम्
उस
बुद्धिसंयोगम्
बुद्धि के संयोग (प्राप्ति) को
लभते
प्राप्त करता है
पौर्वदेहिकम्
पूर्व शरीर का
यतते
प्रयत्न करता है
च
और
ततः
उससे
भूयः
फिर
संसिद्धौ
सिद्धि के लिए
कुरुनन्दन
हे कुरुनन्दन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कुरुनन्दन! वहाँ वह पूर्व शरीर की बुद्धि को (योग के संस्कार को) प्राप्त करता है और फिर सिद्धि के लिए पहले से अधिक प्रयत्न करता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
नए जन्म में भी योगी को पूर्वाभ्यास के संस्कार मिल जाते हैं, जिससे वह पुनः प्रयत्न करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे कुरुनन्दन! वहाँ वह पूर्व शरीर के बुद्धि-संयोग (योग के संस्कार) को प्राप्त कर लेता है, और फिर सिद्धि के लिए और अधिक प्रयत्न करता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
पूर्वाभ्यास के संस्कार साथ आते हैं। इससे साधक को पुनः साधना में आसानी होती है।