मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदपूर्वाभ्यासेन
पूर्वाभ्यास के द्वारा
तेन
उस
एव
ही
ह्रियते
खिंच जाता है
हि
निश्चय ही
अवशः
बेबस
अपि
भी
सः
वह
जिज्ञासुः
जिज्ञासु
अपि
भी
योगस्य
योग का
शब्दब्रह्म
शब्दब्रह्म (वेदों के कर्मकाण्ड)
अतिवर्तते
अतिक्रमण कर जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
उसी पूर्वाभ्यास के वश से वह अनिच्छुक होते हुए भी (योग की ओर) खिंच जाता है। योग का जिज्ञासु भी शब्दब्रह्म (वैदिक कर्मकाण्ड) को अतिक्रमण कर जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
पूर्व संस्कार इतने प्रबल होते हैं कि योगी अनिच्छा से भी योग की ओर खिंचता है। योग की जिज्ञासा भी उसे कर्मकाण्डों से ऊपर उठा देती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
उसी पूर्वाभ्यास के प्रभाव से वह अनिच्छुक होते हुए भी (योग की ओर) खिंच जाता है। योग का जिज्ञासु भी शब्दब्रह्म (कर्मकाण्ड) को पार कर जाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
पूर्व जन्म के संस्कार अत्यन्त शक्तिशाली होते हैं। वे व्यक्ति को सहज ही योग के मार्ग पर ले जाते हैं।