श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 45

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 114 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
प्रयत्नात्
प्रयत्नपूर्वक
यतमानः
अभ्यास करता हुआ
तु
तो
योगी
योगी
संशुद्धकिल्बिषः
पूर्णतः पापरहित
अनेकजन्मसंसिद्धः
अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध
ततः
तत्पश्चात्
याति
जाता है
पराम्
परम
गतिम्
गति को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

किन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी, पूर्णतः पापरहित होकर, अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध होकर, तत्पश्चात् परम गति को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

निरंतर अभ्यास से, क्रमशः अनेक जन्मों में सिद्ध होकर, योगी परम गति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

किन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी, पापों से मुक्त होकर, अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध होकर, तत्पश्चात् परम गति को प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग की सिद्धि एक जन्म में संभव न हो तो कई जन्मों के निरंतर अभ्यास से अवश्य होती है। अतः धैर्य न छोड़ें।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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