मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदतपस्विभ्यः
तपस्वियों से
अधिकः
श्रेष्ठ
योगी
योगी
ज्ञानिभ्यः
ज्ञानियों से
अपि
भी
मतः
माना जाता है
अधिकः
श्रेष्ठ
कर्मिभ्यः
कर्मियों (कर्मकांडी) से
च
और
अधिकः
श्रेष्ठ
योगी
योगी
तस्मात्
इसलिए
योगी
योगी
भव
बनो
अर्जुन
हे अर्जुन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
योगी तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और कर्मयोगियों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् योगी की श्रेष्ठता बताते हुए अर्जुन को योगी बनने की प्रेरणा देते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और कर्मियों (कर्मकांडियों) से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग साधना सबसे उच्च है क्योंकि यह प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित है और सभी साधनाओं का सार है।