मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदयोगिनाम्
योगियों में
अपि
भी
सर्वेषाम्
सबमें
मद्गतेन
मुझमें लगे हुए
अन्तरात्मना
अन्तःकरण से
श्रद्धावान्
श्रद्धालु
भजते
भजता है
यः
जो
माम्
मुझको
सः
वह
मे
मेरे
युक्ततमः
सबसे अधिक युक्त (श्रेष्ठ)
मतः
माना जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
सब योगियों में भी जो श्रद्धावान् भक्त मेरे परायण अन्तःकरण से मुझको भजता है, वह मेरी दृष्टि में सबसे अधिक युक्त (श्रेष्ठ) है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अध्याय का समापन: सबसे श्रेष्ठ योगी वह है जो श्रद्धापूर्वक भगवान् का भजन करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
सभी योगियों में भी जो श्रद्धावान् भक्त, अपने अन्तःकरण को मुझमें लगाकर, मेरा भजन करता है, वह मेरी दृष्टि में सबसे अधिक युक्त (श्रेष्ठ) है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग की सभी धाराओं का सार है भक्ति। श्रद्धा और समर्पण से किया गया भजन ही परम सिद्धि है।