श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 34

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
चञ्चलम्
चंचल
हि
निश्चय ही
मनः
मन
कृष्ण
हे कृष्ण
प्रमाथि
प्रमाथी (क्षोभ उत्पन्न करने वाला)
बलवत्
बलवान
दृढम्
दृढ़
तस्य
उसका
अहम्
मैं
निग्रहम्
निग्रह
मन्ये
मानता हूँ
वायोः
वायु के
इव
समान
सुदुष्करम्
अत्यन्त कठिन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

क्योंकि मन चंचल, प्रमाथी (क्षोभकारी), बलवान् और दृढ़ है, हे कृष्ण! मैं इसे वायु के समान वश में करना अति कठिन समझता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन मन की प्रकृति का वर्णन करते हैं – चंचल, प्रमाथी, बलवान्, दृढ़, और वायु के समान दुर्निवार।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

क्योंकि मन चंचल, प्रमाथी (क्षोभकारी), बलवान् और दृढ़ है, हे कृष्ण! मैं इसे वायु के समान वश में करना अत्यंत कठिन मानता हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मन की यह प्रकृति ही योग के मार्ग को कठिन बनाती है। परंतु कृष्ण अगले श्लोक में इसका समाधान बताएंगे।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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