मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्री भगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदश्री भगवान् उवाच
श्री भगवान् ने कहा
असंशयम्
निःसंदेह
महाबाहो
हे महाबाहो
मनः
मन
दुर्निग्रहम्
दुर्निग्रह (कठिनाई से निग्रह किए जाने योग्य)
चलम्
चंचल
अभ्यासेन
अभ्यास के द्वारा
तु
तो
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
वैराग्येण
वैराग्य के द्वारा
च
और
गृह्यते
वश में किया जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्री भगवान् बोले: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और दुर्निग्रह (कठिनाई से वश में होने वाला) है, हे कौन्तेय! परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में किया जा सकता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण अर्जुन की शंका का समाधान करते हैं: मन कठिन है, पर अभ्यास और वैराग्य से वश में हो सकता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
श्री भगवान् ने कहा: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और वश में करना कठिन है, हे कुन्तीपुत्र! परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह वश में किया जा सकता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
मन की चंचलता स्वाभाविक है, लेकिन निरंतर अभ्यास और विषयों से वैराग्य के द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।