मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदअसंयतात्मना
असंयत (वश में न किए हुए) चित्त वाले द्वारा
योगः
योग
दुष्प्रापः
कठिनाई से प्राप्त होने वाला
इति
ऐसा
मे
मेरी
मतिः
मति (राय)
वश्यात्मना
वश में किए हुए चित्त वाले द्वारा
तु
तो
यतता
प्रयत्न करते हुए
शक्यः
शक्य
अवाप्तुम्
प्राप्त करने के लिए
उपायतः
उपाय से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
असंयत चित्त वाले के लिए योग दुष्प्राप्य है, ऐसी मेरी सम्मति है; किन्तु वश में किए हुए चित्त वाला प्रयत्नशील पुरुष उचित साधन से उसे प्राप्त कर सकता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योग की प्राप्ति के लिए मन का संयत होना आवश्यक है। संयत चित्त वाला साधक उचित साधनों से योग प्राप्त कर सकता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिसने मन को वश में नहीं किया है, उसके लिए योग दुष्प्राप्य है – ऐसा मेरा मत है। परन्तु जिसने मन को वश में कर लिया है, वह प्रयत्नपूर्वक उचित साधन से योग को प्राप्त कर सकता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग साधना के लिए मन पर नियंत्रण पहली शर्त है। उचित साधन (अभ्यास-वैराग्य) से वह सफल हो सकता है।