मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच । अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदअर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
अयतिः
अयति (बिना प्रयत्न के, या असफल प्रयत्न वाला)
श्रद्धया
श्रद्धा से
उपेतः
युक्त
योगात्
योग से
चलितमानसः
चलित मन वाला (भ्रष्ट)
अप्राप्य
न प्राप्त करके
योगसंसिद्धिम्
योग की सिद्धि
काम्
कौन सी
गतिम्
गति
कृष्ण
हे कृष्ण
गच्छति
जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो श्रद्धायुक्त है, परन्तु यत्नहीन है (या जिसका प्रयत्न असफल रहा है), योग से चलित मन वाला है, और योग की सिद्धि को नहीं पाता, वह किस गति को प्राप्त होता है?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन की नई शंका: योग में असफल साधक की क्या गति होती है?
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो श्रद्धा से युक्त है, परन्तु प्रयत्न नहीं कर पाता (या असफल रहता है), जिसका मन योग से भ्रष्ट हो गया है, और जो योग की सिद्धि को नहीं पाता, वह किस गति को प्राप्त होता है?
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग में असफलता पर क्या होता है? यह प्रश्न सभी साधकों के मन में उठता है। कृष्ण अगले श्लोकों में इसका समाधान देंगे।