श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 38

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 93 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
कच्चित्
क्या?
न
नहीं
उभयविभ्रष्टः
दोनों से भ्रष्ट
छिन्नाभ्रम्
टूटे हुए बादल के समान
इव
जैसे
नश्यति
नष्ट होता है
अप्रतिष्ठः
बिना आधार का
महाबाहो
हे महाबाहो
विमूढः
मोहित
ब्रह्मणः
ब्रह्म के
पथि
मार्ग में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित हुआ उभयभ्रष्ट (दोनों से भ्रष्ट), बिना आधार का होकर, छिन्न-भिन्न बादल की भाँति नष्ट नहीं हो जाता?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन की आशंका: क्या योगभ्रष्ट व्यक्ति दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाता है?

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित हुआ, दोनों (इहलोक और परलोक) से भ्रष्ट, बिना आधार का होकर, टूटे हुए बादल की तरह नष्ट नहीं हो जाता?

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

अर्जुन को लगता है कि बिना सिद्धि के योगभ्रष्ट का कोई सहारा नहीं रहता। कृष्ण इस भ्रान्ति को दूर करेंगे।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 38 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 38/47 81% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!