मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदकच्चित्
क्या?
न
नहीं
उभयविभ्रष्टः
दोनों से भ्रष्ट
छिन्नाभ्रम्
टूटे हुए बादल के समान
इव
जैसे
नश्यति
नष्ट होता है
अप्रतिष्ठः
बिना आधार का
महाबाहो
हे महाबाहो
विमूढः
मोहित
ब्रह्मणः
ब्रह्म के
पथि
मार्ग में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित हुआ उभयभ्रष्ट (दोनों से भ्रष्ट), बिना आधार का होकर, छिन्न-भिन्न बादल की भाँति नष्ट नहीं हो जाता?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन की आशंका: क्या योगभ्रष्ट व्यक्ति दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाता है?
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म के मार्ग में मोहित हुआ, दोनों (इहलोक और परलोक) से भ्रष्ट, बिना आधार का होकर, टूटे हुए बादल की तरह नष्ट नहीं हो जाता?
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
अर्जुन को लगता है कि बिना सिद्धि के योगभ्रष्ट का कोई सहारा नहीं रहता। कृष्ण इस भ्रान्ति को दूर करेंगे।