श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 33

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 103 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच । योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
अर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
यः
जो
अयम्
यह
योगः
योग
त्वया
तुम्हारे द्वारा
प्रोक्तः
कहा गया
साम्येन
समता के रूप में
मधुसूदन
हे मधुसूदन
एतस्य
इसका
अहम्
मैं
न
नहीं
पश्यामि
देखता हूँ
चञ्चलत्वात्
चंचलता के कारण
स्थितिम्
स्थिति
स्थिराम्
स्थिर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! आपने समता रूप जिस योग का वर्णन किया है, उसकी स्थिर स्थिति मैं नहीं देख पाता, क्योंकि मन चंचल है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन को संदेह है कि चंचल मन को वश में करना असंभव-सा है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! आपने समता के रूप में जिस योग का वर्णन किया है, उसकी स्थिर स्थिति मैं नहीं देख पाता, क्योंकि मन चंचल है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग का मार्ग कठिन है, विशेषकर चंचल मन के कारण। यहाँ अर्जुन की शंका उठती है, जिसका समाधान कृष्ण अगले श्लोकों में करेंगे।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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