श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 32

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
आत्मौपम्येन
अपने से उपमा देकर
सर्वत्र
सब जगह
समम्
समान
पश्यति
देखता है
यः
जो
अर्जुन
हे अर्जुन
सुखम्
सुख
वा
या
यदि वा
या
दुःखम्
दुःख
सः
वह
योगी
योगी
परमः
परम
मतः
माना जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे अर्जुन! जो पुरुष आत्मौपम्य (अपने सदृश) से सर्वत्र समान देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वह योगी परम (सर्वश्रेष्ठ) माना गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो सब प्राणियों के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख के समान देखता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! जो सर्वत्र अपने समान (दूसरों के सुख-दुःख को अपने समान) देखता है, वही परम योगी माना गया है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सच्चा योगी दूसरों के सुख-दुःख को अपने जैसा अनुभव करता है। यही समदर्शिता का चरम रूप है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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