मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदआत्मौपम्येन
अपने से उपमा देकर
सर्वत्र
सब जगह
समम्
समान
पश्यति
देखता है
यः
जो
अर्जुन
हे अर्जुन
सुखम्
सुख
वा
या
यदि वा
या
दुःखम्
दुःख
सः
वह
योगी
योगी
परमः
परम
मतः
माना जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे अर्जुन! जो पुरुष आत्मौपम्य (अपने सदृश) से सर्वत्र समान देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वह योगी परम (सर्वश्रेष्ठ) माना गया है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो सब प्राणियों के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख के समान देखता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! जो सर्वत्र अपने समान (दूसरों के सुख-दुःख को अपने समान) देखता है, वही परम योगी माना गया है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सच्चा योगी दूसरों के सुख-दुःख को अपने जैसा अनुभव करता है। यही समदर्शिता का चरम रूप है।