मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदसर्वभूतस्थितम्
समस्त भूतों में स्थित
यः
जो
माम्
मुझको
भजति
भजता है
एकत्वम्
एकत्व (अभेद बुद्धि)
आस्थितः
स्थित हुआ
सर्वथा
सब प्रकार से
वर्तमानः
वर्तमान रहता हुआ
अपि
भी
सः
वह
योगी
योगी
मयि
मुझमें
वर्तते
रहता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो योगी सब भूतों में स्थित मुझको एकत्व (अभेद) बुद्धि से भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही रहता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जो योगी सब प्राणियों में स्थित भगवान् की एकरूपता से उपासना करता है, वह सब क्रियाओं में भी भगवान् में ही स्थित रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो योगी सब भूतों में स्थित मुझको एकत्व भाव से भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही रहता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योगी की क्रियाएँ भले ही लौकिक हों, किन्तु उसकी दृष्टि में सब कुछ भगवान् है, अतः वह सदा भगवान् में स्थित रहता है।