मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदयः
जो
माम्
मुझे
पश्यति
देखता है
सर्वत्र
सर्वत्र
सर्वम्
सब कुछ
च
और
मयि
मुझमें
पश्यति
देखता है
तस्य
उसके लिए
अहम्
मैं
न
नहीं
प्रणश्यामि
नष्ट होता
स
वह
च
और
मे
मुझसे
न
नहीं
प्रणश्यति
नष्ट होता।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता और वह मेरे लिए नष्ट नहीं होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् कहते हैं कि जो सर्वत्र उन्हें देखता है और सब कुछ उनमें देखता है, उससे उनका अटूट संबंध स्थापित हो जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता और वह मेरे लिए नष्ट नहीं होता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योगी की दृष्टि में सब कुछ भगवान् का स्वरूप है। ऐसे योगी से भगवान् कभी दूर नहीं होते।