श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 29

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 105 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
सर्वभूतस्थम्
समस्त भूतों में स्थित
आत्मानम्
आत्मा को
सर्वभूतानि
समस्त भूतों को
च
और
आत्मनि
आत्मा में
ईक्षते
देखता है
योगयुक्तात्मा
योगयुक्त चित्त वाला
सर्वत्र
सर्वत्र
समदर्शनः
समदर्शी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

योगयुक्त चित्त वाला योगी सब भूतों में स्थित अपने आत्मा को और सब भूतों को अपने आत्मा में देखता है, वह सर्वत्र समदर्शी होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योगी की समदृष्टि: वह सब प्राणियों में अपने आत्मा को और सबको अपने आत्मा में देखता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

योगयुक्त चित्त वाला योगी सब प्राणियों में स्थित आत्मा को और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है; वह सर्वत्र समान दृष्टि वाला होता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग की उच्चतम अवस्था में भेद-बुद्धि मिट जाती है। सबमें एक ही चेतना दिखती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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