मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदसर्वभूतस्थम्
समस्त भूतों में स्थित
आत्मानम्
आत्मा को
सर्वभूतानि
समस्त भूतों को
च
और
आत्मनि
आत्मा में
ईक्षते
देखता है
योगयुक्तात्मा
योगयुक्त चित्त वाला
सर्वत्र
सर्वत्र
समदर्शनः
समदर्शी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
योगयुक्त चित्त वाला योगी सब भूतों में स्थित अपने आत्मा को और सब भूतों को अपने आत्मा में देखता है, वह सर्वत्र समदर्शी होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योगी की समदृष्टि: वह सब प्राणियों में अपने आत्मा को और सबको अपने आत्मा में देखता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
योगयुक्त चित्त वाला योगी सब प्राणियों में स्थित आत्मा को और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है; वह सर्वत्र समान दृष्टि वाला होता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग की उच्चतम अवस्था में भेद-बुद्धि मिट जाती है। सबमें एक ही चेतना दिखती है।