मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदयुञ्जन्
योग में लगाता हुआ
एवम्
इस प्रकार
सदा
सदा
आत्मानम्
अपने को
योगी
योगी
विगतकल्मषः
पापरहित
सुखेन
सुखपूर्वक
ब्रह्मसंस्पर्शम्
ब्रह्म का स्पर्श
अत्यन्तम्
परम
सुखम्
सुख
अश्नुते
भोगता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्म के स्पर्श रूप परम सुख को भोगता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
निरंतर अभ्यास से योगी पापमुक्त होकर ब्रह्मानन्द का अनुभव करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्म के स्पर्श रूप परम सुख को प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग का अंतिम फल ब्रह्मानन्द है, जो सभी पापों से मुक्त होने पर मिलता है।