श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 6 (ध्यान योग (Dhyan Yoga))

अध्याय 6 · श्लोक 28

ध्यान योग (Dhyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 2 मिनट का पठन 107 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
युञ्जन्
योग में लगाता हुआ
एवम्
इस प्रकार
सदा
सदा
आत्मानम्
अपने को
योगी
योगी
विगतकल्मषः
पापरहित
सुखेन
सुखपूर्वक
ब्रह्मसंस्पर्शम्
ब्रह्म का स्पर्श
अत्यन्तम्
परम
सुखम्
सुख
अश्नुते
भोगता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्म के स्पर्श रूप परम सुख को भोगता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

निरंतर अभ्यास से योगी पापमुक्त होकर ब्रह्मानन्द का अनुभव करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस प्रकार सदा अपने को योग में लगाने वाला, पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्म के स्पर्श रूप परम सुख को प्राप्त करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

योग का अंतिम फल ब्रह्मानन्द है, जो सभी पापों से मुक्त होने पर मिलता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 6: ध्यान योग (Dhyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 28 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 28/47 60% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!