मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्री भगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदश्री भगवान् उवाच
श्री भगवान् ने कहा
पार्थ
हे पार्थ
न
नहीं
एव
ही
इह
इस लोक में
न
नहीं
अमुत्र
परलोक में
विनाशः
विनाश
तस्य
उसका
विद्यते
होता है
न
नहीं
हि
निश्चय ही
कल्याणकृत्
कल्याण करने वाला
कश्चित्
कोई भी
दुर्गतिम्
दुर्गति को
तात
हे तात
गच्छति
जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्री भगवान् बोले: हे पार्थ! उस (योगभ्रष्ट) का न तो इस लोक में विनाश होता है और न परलोक में। हे तात! कल्याण करने वाला कोई भी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् आश्वासन देते हैं कि कल्याण के मार्ग पर चलने वाले का कभी अहित नहीं होता, चाहे वह सिद्धि न भी पाए।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
श्री भगवान् ने कहा: हे पार्थ! उस योगभ्रष्ट का न तो इस लोक में विनाश होता है, न परलोक में। हे तात! कल्याणकारी कर्म करने वाला कभी दुर्गति को नहीं जाता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले का कभी अहित नहीं होता। श्रद्धा और सद्कर्म का फल अवश्य मिलता है।