मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदप्राप्य
प्राप्त करके
पुण्यकृताम्
पुण्य करने वालों के
लोकान्
लोकों को
उषित्वा
निवास करके
शाश्वतीः
बहुत (अनन्त) काल तक
समाः
वर्ष
शुचीनाम्
पवित्र
श्रीमताम्
सम्पन्न
गेहे
घर में
योगभ्रष्टः
योगभ्रष्ट
अभिजायते
उत्पन्न होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
बहुत वर्षों तक पुण्यात्माओं के लोकों में निवास करके, योगभ्रष्ट पुरुष शुद्ध और समृद्ध घर में जन्म लेता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
योगभ्रष्ट पहले पुण्यलोकों में सुख भोगता है, फिर शुभ परिस्थितियों में जन्म लेता है, जहाँ वह अपनी साधना जारी रख सके।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
बहुत वर्षों तक पुण्यात्माओं के लोकों में निवास करके, योगभ्रष्ट व्यक्ति पवित्र और सम्पन्न घर में जन्म लेता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
योग का अभ्यास कभी व्यर्थ नहीं जाता। यह अगले जन्म में अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करता है।