मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते | क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदक्लैब्यम्
नपुंसकता
मा स्म गमः
मत जा
पार्थ
हे पृथापुत्र
न
नहीं
एतत्
यह
त्वयि
तुझमें
उपपद्यते
उचित है
क्षुद्रम्
तुच्छ
हृदयदौर्बल्यम्
हृदय की दुर्बलता
त्यक्त्वा
त्याग कर
उत्तिष्ठ
खड़ा हो
परन्तप
हे शत्रुतापन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो। यह तुझमें उचित नहीं है। हे शत्रुतापन! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर खड़ा हो जा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय का यह महामंत्र अर्जुन के मोह का शमन कर उनके भीतर की सोई हुई दिव्यता और क्षात्र-तेज को जाग्रत करने का महानतम उपदेश है।
आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना
सनातन संस्कृति और वेदान्त के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का तीसरा श्लोक—“क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते | क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||३||”—मानव इतिहास का सबसे प्रखर, ओजस्वी और चैतन्य जगाने वाला उद्बोधन है। यह केवल कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र तक सीमित रण-घोष नहीं है, बल्कि यह हर उस जीवात्मा के लिए परम ब्रह्म का सीधा संदेश है जो मोह, भ्रम, निराशा और कर्तव्यविमुखता के अंधकार में भटक रही है। जब जीवन के रणक्षेत्र में व्यक्ति अपने दायित्वों से मुंह मोड़ने लगता है, तब भगवान श्रीकृष्ण सारथी के रूप में आकर उसके भीतर के संकोच और कायरता को चकनाचूर कर देते हैं।
इस श्लोक का सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व इस बात में निहित है कि यह मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप—जो कि अमर आत्मा है—का स्मरण कराता है। 'पार्थ' और 'परन्तप' जैसे संबोधन केवल नाम नहीं हैं, बल्कि ये अर्जुन के महान कुलीन वंश और उनकी जन्मजात वीरता के जीवंत प्रतीक हैं। जब अर्जुन अपने ही स्वजनों को सामने देखकर मोहवश गांडीव गिरा देते हैं, तब योगेश्वर कृष्ण उनके इस तात्कालिक मानसिक पतन को 'क्लैब्य' (नपुंसकता या हीनता) और 'हृदयदौर्बल्य' (हृदय की दुर्बलता) की संज्ञा देते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्तव्य पथ से विचलित होना और कायरता दिखाना किसी भी उच्चकोटि के मनुष्य के लिए शोभा नहीं देता।
वैदिक साहित्य में मनुष्य योनि को कर्मक्षेत्र माना गया है। ऐसे में, विषाद और अवसाद में डूब जाना आध्यात्मिक पतन का मार्ग है। श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह चेतना देते हैं कि जीवन की विषम परिस्थितियों में हार मान लेना या अपनी जिम्मेदारियों से भाग जाना पाप है। यह श्लोक ऊर्जा का एक ऐसा महास्त्रोत है जिसके उच्चारण मात्र से मन के कोने-कोने में व्याप्त हताशा, हीनभावना और कायरता का अंधकार छंट जाता है और व्यक्ति एक नए पराक्रम, आत्मबल और दिव्यता के साथ अपने जीवन के युद्ध को जीतने के लिए तत्पर हो जाता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
सच्चे मन, पवित्र देह और एकाग्र चित्त से श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का सस्वर पाठ करना चाहिए:
श्लोक
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥
उच्चारण विधि एवं ध्यान
पाठ का समय: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नानोपरांत या संध्यावंदنا के समय इस श्लोक का 11, 21 या 108 बार मानसिक जप करना अत्यंत फलदायी होता है।
भावना: पाठ करते समय यह भाव रखें कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आपके भीतर के सभी प्रकार के मानसिक विकारों, कमजोरियों और भयों का नाश करके आपको धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर आगे बढ़ा रहे हैं।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
गीता के प्रत्येक शब्द में गूढ़ वेदांतिक रहस्य छिपा है। आइए, इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
महाभारत के युद्ध का प्रसंग इतिहास का वह अद्वितीय मोड़ है जहाँ धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय की सेनाएँ कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर आमने-सामने खड़ी थीं। कौरव सेना के शंखनाद और युद्ध की हुंकार के बीच, पांडव सेना के मुख्य योद्धा और भगवान श्रीकृष्ण के परम सखा अर्जुन ने अपने सारथी कृष्ण से कहा कि उनके रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चला जाए, ताकि वे देख सकें कि युद्ध करने के लिए कौन-कौन से लोग यहाँ उपस्थित हुए हैं।
जब अर्जुन ने कौरव पक्ष में अपने गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, चचेरे भाइयों, मामाओं और स्नेहियों को देखा, तो उनका क्षत्रिय हृदय करुणा और मोह के महासागर में डूब गया। उनके हाथ से गांडीव धनुष छूटने लगा, शरीर कांपने लगा और मुंह सूखने लगा। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से स्पष्ट कह दिया कि वे अपनों का वक्तृत्त्व करके राज्य या सुख नहीं चाहते, और वे युद्ध भूमि में शस्त्र त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गए। उनका यह विलाप सुनकर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गहरी संवेदनशीलता और फिर अत्यंत कठोर व तेजस्वी भाषा में उन्हें डांटा।
महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस महाकाव्य में श्रीमद्भगवद्गीता वह अमृत है जो मोहावरुद्ध अर्जुन को प्रदान किया गया। यहाँ 'पार्थ' (कुंती पुत्र) और 'परन्तप' (शत्रुनाशक) कहकर भगवान ने अर्जुन की उस महान वंशावली की याद दिलाई जिसकी रगों में वीरता का खून दौड़ रहा था। युद्ध से पीछे हटना और अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना क्षत्रिय धर्म के अनुसार सबसे बड़ा पाप और कलंक था। श्रीकृष्ण के इस ओजस्वी उपदेश ने अर्जुन के भीतर की कायरता को भस्म कर दिया और उन्हें पुनः अपने परम कर्तव्य यानी धर्मयुद्ध के लिए उद्यत कर दिया।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के इस शक्तिशाली श्लोक का नियमित स्मरण या मनन करने से साधक को अनेकों मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
1. मानसिक शांति एवं स्थिरता
जीवन के तनाव, अवसाद और अनिश्चितता के दौर में इस श्लोक का पाठ मन को शांत करता है और भ्रम के बादलों को दूर करता है।
2. आंतरिक ऊर्जा और निर्भीकता का संचार
यह श्लोक अचेतन मन की कायरता और डर को नष्ट करके साधक में सिंह जैसी निर्भीकता और आत्मबल भर देता है।
3. सकारात्मक ऊर्जा की aura का निर्माण
नियमित रूप से इस श्लोक का उच्चारण करने से शरीर के चारों ओर एक तेजमय और सकारात्मक आध्यात्मिक कवच (Aura) बनता है।
4. कर्म प्रधान दृष्टिकोण (Karma Yoga)
यह व्यक्ति को फल की चिंता किए बिना अपने निर्धारित कर्तव्यों और धर्म का पालन करने की अटूट प्रेरणा देता है।
5. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)
मोह, राग और द्वेष जैसे मानसिक विकारों का नाश होने से पुराने नकारात्मक कर्मों और संस्कारों का क्षय होता है।
6. एकाग्रता और निर्णय क्षमता में वृद्धि
भ्रम की स्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है, जिससे विद्यार्थी और पेशेवर लोग अपने जीवन में सफल होते हैं।
7. ईश्वरीय कृपा और शरणागति
भगवान कृष्ण के वचनों को अपने जीवन का आधार बनाने से साधक पर निरंतर गुरु और गोविंद की कृपा बनी रहती है।
8. संकटों से लड़ने की मानसिक शक्ति
कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आ जाए, यह श्लोक व्यक्ति को टूटने नहीं देता बल्कि 'उत्तिष्ठ' (उठो) का संदेश देकर पुनः खड़ा कर देता है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, पुराणों, महाभारत और महर्षि वेद व्यास द्वारा प्रणीत श्रीमद्भगवद्गीता के मूल भावों पर आधारित है। इस आलेख को तैयार करते समय पारंपरिक संस्कृत टीकाओं, जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और श्रीमदद्भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की व्याख्याओं का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख हमारे वरिष्ठ वैदिक विद्वानों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा अत्यधिक सावधानी, प्रामाणिक वंशावली संदर्भों और गूगल के Helpful Content दिशा-निर्देशों के अनुरूप पूरी निष्ठा के साथ तैयार किया गया है ताकि हमारे पाठकों को विशुद्ध, त्रुटिहीन और जीवनोपयोगी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण स्पष्ट कहते हैं: हे अर्जुन, नपुंसक मत बन। यह तुझे शोभा नहीं देता। हृदय की इस तुच्छ कमजोरी को त्याग दे और युद्ध के लिए खड़ा हो जा। Krishna uses strong words to shake Arjuna out of his inaction.
प्रेरणा / Inspiration
यह श्लोक हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो जीवन में कठिनाइयों से घबराकर पीछे हटने लगता है। कृष्ण कहते हैं कि अपने स्वभाव और कर्तव्य के अनुरूप साहस के साथ खड़े हो जाओ। This verse inspires us to face challenges with courage, not cowardice.