मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||५०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदबुद्धियुक्तः
समबुद्धि से युक्त
जहाति
त्याग देता है
इह
इस लोक में
उभे
दोनों
सुकृतदुष्कृते
पुण्य और पाप
तस्मात्
इसलिए
योगाय
योग के लिए
युज्यस्व
तत्पर हो
योगः
योग
कर्मसु
कर्मों में
कौशलम्
कुशलता (चातुर्य)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
समबुद्धि से युक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए तू योग के लिए तत्पर हो। योग कर्मों में कुशलता (चातुर्य) है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय दृष्टि
सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि समस्त उपनिषदों का सार और मानव मात्र के जीवन को दिशा देने वाला एक दिव्य प्रकाशपुंज माना गया है। महाभारत के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह उपदेश अज्ञान के अंधकार को चीरकर आत्मज्ञान का सूर्योदय करता है। प्रस्तुत श्लोक—"बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते..."—गीता के द्वितीय अध्याय का अत्यंत महत्वपूर्ण और जीवन-दर्शन को झकझोर देने वाला श्लोक है। यह मानव जीवन के सबसे बड़े द्वंद्व—कर्म और उसके फल, पुण्य और पाप, तथा सफलता और असफलता—का अत्यंत वैज्ञानिक और आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत करता है।
आज के इस आधुनिक, भागदौड़ भरे और तनावपूर्ण युग में जहां हर मनुष्य मानसिक अशांति, अवसाद (Depression) और भविष्य की अनिश्चितता से घिरा हुआ है, यह श्लोक एक अचूक औषधि का काम करता है। 'योगः कर्मसु कौशलम्' (कर्मों में कुशलता ही योग है) का यह महामंत्र केवल साधुओं या संन्यासियों के लिए नहीं है, बल्कि यह कार्यालय में काम करने वाले पेशेवर, पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी, और परिवार चलाने वाले गृहस्थ—सभी के लिए समान रूप से प्रासंगिक है। जब मनुष्य अपने कर्मों के फल की आसक्ति (Attachment) को छोड़कर, केवल कर्तव्य भाव से अपने कार्य को समर्पित हो जाता है, तब उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और वह जीवन के समस्त बंधनों से सहज ही मुक्त होने लगता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के हर एक पक्ष का शास्त्रीय, दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधकगण अपने दैनिक जीवन में इसे उतारकर परम शांति और सिद्धि प्राप्त कर सकें।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥
उच्चारण विधि एवं पाठ का नियम:
इस श्लोक का उच्चारण करते समय स्पष्टता और शुद्ध स्वर का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'बुद्धियुक्तः' में विसर्ग का उच्चारण 'हः' की तरह, 'जहातीह' में दीर्घ स्वरों की मात्राओं का उचित संतुलन, और 'योगः कर्मसु कौशलम्' को पूर्ण विराम के साथ सस्वर पढ़ना चाहिए। नियमित रूप से प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस श्लोक का कम से कम 11 बार मानसिक या वाचिक जप करने से बुद्धि में स्थिरता आती है और कार्यक्षमता में अद्भुत वृद्धि होती है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी। जब पांचजन्य और देवदत्त शंखों की गूंज के बीच कौरव और पाण्डव सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब महान धनुर्धर अर्जुन ने अपने सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं (भीष्म और द्रोण) को युद्ध भूमि में देखकर भारी विषाद और मोह का अनुभव किया। उनके हाथ से गाण्डीव धनुष फिसलने लगा और उनका मन कर्तव्य-विमूढ़ हो गया। अर्जुन ने युद्ध करने से स्पष्ट इनकार कर दिया और कहा कि भिक्षा मांगकर जीवन बिताना इस कुल-विनाशक युद्ध से श्रेयस्कर है।
उस विकट और ऐतिहासिक क्षण में, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के उस कायरतापूर्ण और मोहग्रस्त दृष्टिकोण को तोड़ने के लिए ज्ञान का दिव्य शंखनाद किया। भगवान ने सर्वप्रथम अर्जुन को आत्मा की अमरता का उपदेश दिया—'न जायते म्रियते वा कदाचित्' (आत्मा न कभी जन्म लेती है और न मरती है)। इसके बाद, कर्म और उसके फलों के चक्र को समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने 'समबुद्धि' या 'समत्व योग' का प्रतिपादन किया।
महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली श्रीमद्भगवद्गीता हमें यह सिखाती है कि जीवन एक महायुद्ध है, और इस युद्ध में प्रत्येक मनुष्य योद्धा है। अर्जुन के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने संपूर्ण मानवता को यह संदेश दिया कि पलायनवाद (Escapism) समाधान नहीं है। समाधान है—परिस्थितियों का सामना करना, लेकिन आंतरिक रूप से आसक्ति और अहंकार से मुक्त होकर। 'योगः कर्मसु कौशलम्' का यह सूत्र केवल एक दार्शनिक वाक्य नहीं है, बल्कि यह उस सनातन इतिहास का सार है जो संकट के समय मनुष्य को उसकी आंतरिक शक्ति से परिचित कराता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति (Mental Peace)
फल की चिंता छोड़ने से मस्तिष्क का भारी बोझ उतर जाता है, जिससे क्रॉनिक स्ट्रेस, एंग्जैलिटी और अनिद्रा जैसी समस्याओं से तुरंत राहत मिलती है।
2. कर्म बंधनों से मुक्ति (Karmic Purification)
जब कर्म बिना अहंकार और फल की इच्छा के किए जाते हैं, तो उनके अच्छे या बुरे संस्कार (पुण्य-पाप) जीव को नहीं बांधते, जिससे जन्म-मृत्यु का चक्र धीमा होता है।
3. कार्यकुशलता और फोकस में वृद्धि (Enhanced Productivity)
'कर्मसु कौशलम्' के सिद्धांत को अपनाने से व्यक्ति का ध्यान परिणाम पर न रहकर वर्तमान कार्य की गुणवत्ता पर होता है, जिससे कार्य में परफेक्शन आता है।
4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)
इस श्लोक का नित्य स्मरण और चिंतन करने से साधक के आसपास एक उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक औरा (Aura) का निर्माण होता है।
5. निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता (Decision Making)
समबुद्धि प्राप्त होने पर व्यक्ति संकट के समय भी भ्रमित नहीं होता और अत्यधिक निष्पक्ष एवं सटीक निर्णय लेने में सक्षम बनता है।
6. अहंकार और ईर्ष्या का नाश (Ego Dissolution)
"मैं करने वाला हूँ" (कर्ताभाव) का नाश होने से अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है, जिससे दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा बढ़ती है।
7. ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)
भगवान श्रीकृष्ण के इस प्रिय उपदेश को जीवन में उतारने वाले भक्त पर भगवान की अछूतोद्य और निरंतर कृपा बनी रहती है।
8. जीवन के प्रति संतोष और आनंद (Inner Joy)
हार और जीत से परे होकर जीने की कला सीखने वाला व्यक्ति सदैव आनंदित और तृप्त रहता है, उसे बाहरी परिस्थितियां विचलित नहीं कर पातीं।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री प्राचीन वैदिक साहित्यों, महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता (द्वितीय अध्याय, सांख्य योग, श्लोक 50), तथा शंकराचार्य और रामानुजचार्य जैसे महान आचार्यों के भाष्यों का गहन अध्ययन करके संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारे विद्वान भाषाविदों और संस्कृत जानकारों ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अर्थ, उसका दार्शनिक मर्म और आधुनिक जीवन में उसका अनुप्रयोग पूरी तरह से प्रामाणिक, त्रुटिहीन और सनातन परंपरा के अनुकूल हो। हमारा उद्देश्य सनातन धर्म के इस शाश्वत ज्ञान को अत्यंत सरल हिंदी में जन-जन तक पहुंचाना है, ताकि प्रत्येक साधक अपने जीवन को उन्नत बना सके।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
समबुद्धि से युक्त पुरुष इस जीवन में ही पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए तू योग के लिए तत्पर हो। योग कर्मों में कुशलता (चातुर्य) है। Endowed with equanimity, one frees oneself from both good and evil deeds. Therefore, devote yourself to yoga. Yoga is skill in action.
कौशल / Skill
योग का अर्थ है कर्म करने की कला – जो व्यक्ति को बन्धनमुक्त कर दे।