भक्ति रस काव्य व भजन

मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई - मीराबाई का अमर भजन

6 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भजन का परिचय, भाव एवं भक्ति संदर्भ

भक्ति आंदोलन की महान कवयित्री और श्री कृष्ण की अनन्य उपासिका मीराबाई द्वारा रचित 'मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई' केवल एक भजन नहीं, बल्कि एक आत्मा का परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण का घोषणापत्र है। मीराबाई का जीवन त्याग, तपस्या और कृष्ण प्रेम का एक जीवंत उदाहरण है। इस भजन में मीरा ने संसार के सभी भौतिक और लौकिक संबंधों को गौण बताते हुए केवल गिरधर गोपाल को ही अपना सर्वस्व स्वीकार किया है।

ऐतिहासिक रूप से, मीराबाई का जन्म मेड़ता के राठौड़ परिवार में हुआ था। राजसी सुख-सुविधाओं के बीच पली-बढ़ी मीरा ने बचपन से ही कृष्ण को अपना पति मान लिया था। जब उनका विवाह मेवाड़ के राजघराने में हुआ, तब भी उनका मन सांसारिक बंधनों में नहीं फंसा। यह भजन उनकी उस मानसिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ उन्होंने लोक-लाज, कुल की मर्यादा और सांसारिक संबंधों को कृष्ण प्रेम के लिए त्याग दिया था। यह भजन 'मधुर भाव' की भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ भक्त स्वयं को भगवान की दासी मानकर उनके चरणों में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है।

सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स

मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।
तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई।
छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई।।
संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक लाज खोई।
चुनरी के किए टूक, ओढ़ लीन्ही लोई।।
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई।
अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम बेलि बोई।।
अब तो बेलि फैल गई, आणंद फल होई।
दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई।।
माखन जब काढ़ि लियो, छाछ पिए कोई।
आया है सो जाएगा, राजा रंक कोई।।
मीरा दासी गिरधर की, तारो अब मोही।।

पदवार सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक संदेश

मीराबाई कहती हैं कि मेरा तो केवल गिरधर गोपाल ही है, उनके अतिरिक्त मेरा कोई नहीं है। जिनके सिर पर मोर का मुकुट सुशोभित है, वही मेरे स्वामी हैं। मीरा आगे कहती हैं कि संसार में माता, पिता, भाई, बंधु-बांधव कोई भी अपना नहीं है। मैंने अपने कुल की मर्यादा को छोड़ दिया है, अब मुझे किसी की परवाह नहीं है कि कोई क्या कहेगा।

भजन के अगले चरण में मीरा बताती हैं कि संतों के साथ बैठकर उन्होंने लोक-लाज खो दी है। उन्होंने राजसी वस्त्रों का त्याग कर संन्यास का मार्ग चुना है। वे कहती हैं कि भक्तों को देखकर मुझे प्रसन्नता होती है, परंतु सांसारिक मोह-माया में लिप्त लोगों को देखकर मुझे दुख होता है। मैंने अपने आंसुओं के जल से प्रेम की बेल को सींचा है, जो अब फल देने लगी है। अंत में, वे जीवन के सार को समझाते हुए कहती हैं कि जैसे दूध को मथकर मक्खन निकाल लिया जाता है और छाछ छोड़ दी जाती है, वैसे ही मैंने संसार के सार को समझ लिया है। जो आया है वह जाएगा, चाहे राजा हो या रंक। मीरा अंत में गिरधर से प्रार्थना करती हैं कि वे उनकी रक्षा करें और उन्हें इस भवसागर से पार उतारें।

विशेष संदेश: मीराबाई का यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है। जब हम सांसारिक मोह को त्यागकर केवल प्रभु का ध्यान करते हैं, तभी हमें वास्तविक आनंद की प्राप्ति होती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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