📜 सम्पूर्ण श्लोक · बाल काण्ड · सर्ग 1

संक्षेप रामायण

वाल्मीकि रामायण के इस सर्ग के सभी 100 पावन श्लोक, मूल संस्कृत पाठ, अन्वय और सरल हिंदी अनुवाद सहित।

100 सम्पूर्ण श्लोक
1 सर्ग संख्या
29 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा
प्रथम सर्ग
सर्ग 1 · 100 श्लोक
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सम्पूर्ण पावन श्लोक सूची

श्लोक संख्या पर सीधे जाएँ:
श्लोक संख्या 41

ततो नलसेतुं बद्ध्वा रामः सुग्रीवसंयुतः । तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं लङ्कां प्रति ययौ तदा ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् नल द्वारा निर्मित सेतु (पुल) को बाँधकर राम ने सुग्रीव के साथ मिलकर अक्षोभ्य सागर को पार कर लिया और तब लंका की ओर प्रस्थान किया।”

विशेष व्याख्या:

राम ने वानर सेना के साथ समुद्र पर पुल बनवाकर लंका पर चढ़ाई की।

टिप्पणी: इस श्लोक में राम के समुद्र पार करने की घटना का उल्लेख है। नल नामक वानर ने विश्वकर्मा के पुत्र होने के कारण सेतु का निर्माण किया।
श्लोक संख्या 42

ततो लङ्कां समासाद्य रामः सुग्रीवसंयुतः । अवरुध्य च तां लङ्कां न्यवसत्पर्वतोपमः ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् लंका में पहुँचकर राम ने सुग्रीव के साथ मिलकर उस लंका को घेर लिया और पर्वत के समान (अडिग) होकर निवास किया।”

विशेष व्याख्या:

राम और वानर सेना ने लंका को चारों ओर से घेर लिया और युद्ध की तैयारी की।

टिप्पणी: यह श्लोक राम के लंका पहुँचने और नगर को घेरने का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 43

ततो रावणसैन्यैश्च महायुद्धमवर्तत । रामस्य वानरैः सार्धं राक्षसैश्च सुदारुणम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् रावण की सेना और राम के वानरों तथा राक्षसों के बीच अत्यन्त भयंकर महायुद्ध हुआ।”

विशेष व्याख्या:

राम और रावण की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ।

टिप्पणी: यह श्लोक लंकायुद्ध के प्रारम्भ का सूचक है।
श्लोक संख्या 44

तत्र कुम्भकर्णो नाम राक्षसो भीमविक्रमः । रामेण निहतो युद्धे वानरैश्च महाबलैः ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस युद्ध में कुम्भकर्ण नामक भीम पराक्रमी राक्षस राम द्वारा और महाबलशाली वानरों के द्वारा मारा गया।”

विशेष व्याख्या:

कुम्भकर्ण का वध राम और वानरों ने मिलकर किया।

टिप्पणी: यह श्लोक कुम्भकर्ण नामक राक्षस के वध का उल्लेख करता है।
श्लोक संख्या 45

इन्द्रजिन्नाम राक्षसो मायावी युद्धदुर्मदः । लक्ष्मणं शक्तिभिन्नाङ्गं चकार रणमूर्धनि ॥

हिंदी भावार्थ:

“इन्द्रजित् नामक मायावी और युद्ध में दुर्मद राक्षस ने रणभूमि में लक्ष्मण को शक्ति से बींधकर उनके अंगों को पीड़ित कर दिया।”

विशेष व्याख्या:

इन्द्रजित ने लक्ष्मण पर शक्ति का प्रहार किया, जिससे वे मूर्छित हो गए।

टिप्पणी: यह श्लोक इन्द्रजित के पराक्रम और लक्ष्मण के घायल होने का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 46

ततो हनूमान् गत्वाशु हिमवन्तं महागिरिम् । औषधं सञ्जीवनीयमानीय प्राणमापयत् ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् हनुमान् शीघ्र हिमालय पर्वत पर जाकर संजीवनी औषधि लाए और (लक्ष्मण को) पुनः प्राणवान् किया।”

विशेष व्याख्या:

हनुमान् ने हिमालय से संजीवनी लाकर लक्ष्मण को पुनर्जीवित किया।

टिप्पणी: यह श्लोक हनुमान् के अद्भुत पराक्रम और रामभक्ति का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 47

ततो रावणसंग्रामे रामः सत्यपराक्रमः । रावणं सगणं हत्वा यशः प्राप महत्पुनः ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् रावण के साथ युद्ध में सत्यपराक्रमी राम ने रावण को उसके गणों (सेना) सहित मारकर पुनः महान् यश प्राप्त किया।”

विशेष व्याख्या:

राम ने रावण और उसकी सेना का वध करके महान यश प्राप्त किया।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण की पराकाष्ठा – रावण वध का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 48

ततो विभीषणं राज्ये लङ्कायाः स्थापयत्प्रभुः । रामो दाशरथिः श्रीमान् सुग्रीवादिभिरन्वितः ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् प्रभु श्रीमान् राम ने सुग्रीव आदि के साथ मिलकर विभीषण को लंका के राज्य पर स्थापित किया।”

विशेष व्याख्या:

राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया।

टिप्पणी: यह श्लोक राम के धर्मनिष्ठ मित्र विभीषण के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
श्लोक संख्या 49

सीतां पुनरवाप्याथ रामो राजीवलोचनः । तस्याश्चाग्निपरीक्षां वै चकार स महामतिः ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् राजीवलोचन राम ने सीता को पुनः प्राप्त करके उसकी अग्निपरीक्षा की, वे महामति थे।”

विशेष व्याख्या:

राम ने सीता की अग्निपरीक्षा ली।

टिप्पणी: यह श्लोक सीता की अग्निपरीक्षा का उल्लेख करता है, जो रामायण का विवादास्पद प्रसंग है।
श्लोक संख्या 50

ततः पुष्पकमारुह्य रामो दाशरथिर्बली । अयोध्यामागतः श्रीमान् भरतस्य प्रियंकरः ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् बलशाली राम पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अयोध्या लौटे, जो भरत को प्रिय करने वाले हैं।”

विशेष व्याख्या:

राम पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे और भरत को प्रसन्न किया।

टिप्पणी: यह श्लोक राम की अयोध्या वापसी और भरत से मिलन का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 51

ततो रामोऽभिषिक्तश्च लक्ष्मणेन सहानघः । राज्यं प्राप्य पुरीं रम्यामयोध्यां पुनरागतः ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् निष्पाप राम ने लक्ष्मण के साथ राज्य प्राप्त करके रम्य अयोध्या पुरी में अभिषिक्त होकर प्रवेश किया।”

विशेष व्याख्या:

राम का राज्याभिषेक और अयोध्या वापसी।

श्लोक संख्या 52

रामे राज्यं प्रशासति सर्वे धर्मपरा जनाः । न च दुर्भिक्षमरकं न चौरादिभयं क्वचित् ॥

हिंदी भावार्थ:

“जब राम राज्य का शासन कर रहे थे, सभी लोग धर्मपरायण थे। न कहीं दुर्भिक्ष (अकाल) था, न मरी (महामारी), और न चोर आदि का भय।”

विशेष व्याख्या:

राम के शासनकाल में प्रजा सुखी, धर्मपरायण और सभी भयों से मुक्त थी।

श्लोक संख्या 53

सीतायां जनसंवादो रामस्याप्यभवत्तदा । लोकापवादभीतेन सा त्यक्ता जनकात्मजा ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस समय सीता के विषय में जनता में संवाद (अफवाह) हुई, और लोकापवाद से भयभीत राम ने जनकात्मजा सीता का त्याग कर दिया।”

विशेष व्याख्या:

राम ने लोकापवाद के भय से सीता का त्याग किया।

श्लोक संख्या 54

ततो लक्ष्मणमाहूय रामः शोकाकुलस्तदा । गङ्गाकूले विवासाय प्रेषयामास धर्मवित् ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् धर्मज्ञ राम ने शोकाकुल होकर लक्ष्मण को बुलाया और गंगा के तट पर निर्वासन के लिए भेज दिया।”

विशेष व्याख्या:

राम ने लक्ष्मण को सीता को वन में छोड़ने का आदेश दिया।

श्लोक संख्या 55

सा गत्वा वाल्मिकेराश्रमं शोकाकुला तदा । रामस्य चिन्तयन्ती सा न्यवसत्तापसार्चिता ॥

हिंदी भावार्थ:

“वह (सीता) शोकाकुल होकर वाल्मीकि के आश्रम में गई और वहाँ राम का चिन्तन करती हुई, तापसों (ऋषियों) द्वारा पूजित होकर निवास करने लगी।”

विशेष व्याख्या:

सीता वाल्मीकि आश्रम में रहीं और राम का ध्यान करती रहीं।

श्लोक संख्या 56

तस्यां जज्ञातिरौ कुशौ पुत्रौ रामस्य धीमतः । वाल्मिकेः पालनां प्राप्तौ ववृधाते तपोवने ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस (सीता) से धीमान् राम के दो पुत्र – लव और कुश – उत्पन्न हुए। वे वाल्मीकि की पालना प्राप्त करके तपोवन में बढ़ने लगे।”

विशेष व्याख्या:

सीता ने लव और कुश को जन्म दिया, जिनका पालन वाल्मीकि ने किया।

श्लोक संख्या 57

रामस्त्वश्वमेधेन यज्ञेन यजतां वरः । इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्ब्राह्मणैः पूजितोऽभवत् ॥

हिंदी भावार्थ:

“राम ने यज्ञ करने वालों में श्रेष्ठ होकर अश्वमेध यज्ञ किया और अन्य बहुविध यज्ञों का अनुष्ठान करके ब्राह्मणों द्वारा पूजित हुए।”

विशेष व्याख्या:

राम ने अश्वमेध और अन्य यज्ञ किए।

श्लोक संख्या 58

लवकुशौ तु तौ वीरौ रामस्य चरितं महत् । गायन्तौ विबुधैः सार्धं रामायणमगायताम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“वे दोनों वीर लव और कुश राम के महान् चरित्र का गान करते हुए, विद्वानों के साथ रामायण का गायन करने लगे।”

विशेष व्याख्या:

लव-कुश ने रामायण का गायन किया।

श्लोक संख्या 59

सीता तु पुनरालक्ष्य रामस्य वचनात्तदा । भूमिं विवेश धर्मज्ञा पतिव्रतापरायणा ॥

हिंदी भावार्थ:

“तत्पश्चात् सीता ने राम के वचन को सुनकर (या लक्ष्य करके), धर्मज्ञा और पतिव्रतापरायणा होकर भूमि में प्रवेश कर लिया।”

विशेष व्याख्या:

सीता ने राम के कथन के अनुसार भूमि में समाधि ले ली।

श्लोक संख्या 60

रामोऽपि बहुवर्षाणि राज्यं कृत्वा महायशाः । सभ्राता सह सीतेन स्वर्गलोकं जगाम ह ॥

हिंदी भावार्थ:

“राम ने भी बहुत वर्षों तक राज्य करके महान् यश प्राप्त किया, और फिर भाइयों सहित तथा सीता के साथ (अन्त में) स्वर्गलोक को चले गए।”

विशेष व्याख्या:

राम ने दीर्घकाल तक राज्य किया और अन्त में भाइयों और सीता सहित स्वर्गारोहण किया।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।