📜 सम्पूर्ण श्लोक · बाल काण्ड · सर्ग 1

संक्षेप रामायण

वाल्मीकि रामायण के इस सर्ग के सभी 100 पावन श्लोक, मूल संस्कृत पाठ, अन्वय और सरल हिंदी अनुवाद सहित।

100 सम्पूर्ण श्लोक
1 सर्ग संख्या
29 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा
प्रथम सर्ग
सर्ग 1 · 100 श्लोक
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सम्पूर्ण पावन श्लोक सूची

श्लोक संख्या पर सीधे जाएँ:
श्लोक संख्या 81

यः पठेदेकमप्यत्र श्लोकं रामायणस्य तु । स याति रामसालोक्यं रामचन्द्रप्रसादतः ॥

हिंदी भावार्थ:

“जो इस रामायण के एकमात्र श्लोक को भी पढ़ता है, वह रामचन्द्र की कृपा से राम के सालोक्य (समान लोक) को प्राप्त होता है।”

विशेष व्याख्या:

रामायण का एक श्लोक भी पढ़ने से रामसालोक्य की प्राप्ति होती है।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के एक श्लोक के पाठ के फल का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 82

धर्मार्थकाममोक्षाणां रामायणमिति स्मृतम् । यः पठेत् प्रयतो नित्यं स सर्वं लभते नरः ॥

हिंदी भावार्थ:

“धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए रामायण स्मरण किया जाता है। जो नित्य संयमपूर्वक पढ़ता है, वह मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है।”

विशेष व्याख्या:

रामायण चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्रदान करता है।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण को चारों पुरुषार्थों का दाता बताता है।
श्लोक संख्या 83

मनःशुद्धिकरं पुण्यं पापघ्नं सुखदं शुभम् । रामायणमिदं दिव्यं सर्वरोगापहं नृणाम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“यह दिव्य रामायण मन की शुद्धि करने वाला, पुण्यमय, पापनाशक, सुखदायक, शुभ और मनुष्यों के सभी रोगों का नाश करने वाला है।”

विशेष व्याख्या:

रामायण के गुण – मन:शुद्धि, पापनाश, सुख, शुभता और रोगनाश।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के विभिन्न गुणों का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 84

कल्पवृक्षसमं पुण्यं रामायणमनुत्तमम् । सर्वकामप्रदं नृणां सर्वपापहरं शुभम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“कल्पवृक्ष के समान पुण्यमय, अनुपम रामायण मनुष्यों के लिए सभी कामनाओं को देने वाला, सभी पापों को हरने वाला और शुभ है।”

विशेष व्याख्या:

रामायण की तुलना कल्पवृक्ष से – सर्वकामनाप्रद और पापहर।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण की तुलना कल्पवृक्ष से करता है।
श्लोक संख्या 85

रामायणरताः सन्तो धन्या रामपदे रताः । तेषां वै रामसायुज्यं रामेण सह मोदते ॥

हिंदी भावार्थ:

“रामायण में रत रहने वाले सन्त (सज्जन) धन्य हैं, जो राम के चरणों में रत हैं। उन्हीं को राम का सायुज्य (एकरूपता) प्राप्त होता है और वे राम के साथ आनन्दित होते हैं।”

विशेष व्याख्या:

रामायण में रत सज्जन रामसायुज्य प्राप्त करते हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के अनुरागियों के उच्चतम फल का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 86

इतिहासोत्तमे ह्यस्मिन् रामायणे महात्मनः । रामचन्द्रस्य चरितं वर्णितं पापनाशनम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“इस उत्तम इतिहास रामायण में महात्मा रामचन्द्र का पापनाशक चरित्र वर्णित है।”

विशेष व्याख्या:

रामायण में रामचन्द्र का पापनाशक चरित्र वर्णित है।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के विषय का सारांश देता है।
श्लोक संख्या 87

सर्वदानफलं यस्मात् प्राप्नोति शृण्वतां नरः । रामायणकथां पुण्यां तस्माच्छृणुयादादरात् ॥

हिंदी भावार्थ:

“जिससे सुनने वाला मनुष्य सभी दानों का फल प्राप्त कर लेता है, उस पुण्यमय रामायण कथा को इसलिए आदरपूर्वक सुनना चाहिए।”

विशेष व्याख्या:

रामायण श्रवण से सभी दानों का फल मिलता है।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण श्रवण को दान के समान फलदायी बताता है।
श्लोक संख्या 88

यः शृणोति सदा भक्त्या रामायणमनुत्तमम् । स सर्वपापनिर्मुक्तो रामलोके महीयते ॥

हिंदी भावार्थ:

“जो सदा भक्तिपूर्वक इस अनुपम रामायण को सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रामलोक में पूजित होता है।”

विशेष व्याख्या:

भक्तिपूर्वक रामायण सुनने से पापमुक्ति और रामलोक की प्राप्ति।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण श्रवण के फल का पुनः स्मरण कराता है।
श्लोक संख्या 89

अनेकयज्ञदानानां तपसां च फलं लभेत् । रामायणमिदं पुण्यं यः पठेत् शृणुयादपि ॥

हिंदी भावार्थ:

“अनेक यज्ञों, दानों और तपों का जो फल होता है, वह फल इस पुण्यमय रामायण को जो पढ़ता या सुनता है, उसे प्राप्त होता है।”

विशेष व्याख्या:

रामायण पाठ या श्रवण से अनेक यज्ञों, दानों और तपों का फल मिलता है।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के फल की तुलना यज्ञ-दान-तप से करता है।
श्लोक संख्या 90

इति संक्षेपरामायं प्रथमः सर्ग उच्यते । यस्य श्रवणमात्रेण पापं नश्यति तत्क्षणात् ॥

हिंदी भावार्थ:

“इस प्रकार संक्षेप रामायण का प्रथम सर्ग कहा जाता है, जिसके मात्र श्रवण मात्र से पाप तत्क्षण नष्ट हो जाता है।”

विशेष व्याख्या:

संक्षेप रामायण के प्रथम सर्ग का समापन और उसकी महिमा।

टिप्पणी: यह श्लोक संक्षेप रामायण के प्रथम सर्ग के समापन और उसकी महिमा का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 91

प्रथमे सर्गमाहात्म्यं शृणुयाद्यः सदा नरः । स रामभक्तिं लभते रामलोकं च गच्छति ॥

हिंदी भावार्थ:

“जो मनुष्य प्रथम सर्ग की महिमा को सदा सुनता है, वह रामभक्ति प्राप्त करता है और रामलोक को जाता है।”

विशेष व्याख्या:

प्रथम सर्ग के माहात्म्य को सुनने से रामभक्ति और रामलोक की प्राप्ति होती है।

टिप्पणी: यह श्लोक प्रथम सर्ग की महिमा का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 92

य इदं कीर्तयेद् भक्त्या प्रथमं सर्गमुत्तमम् । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्यं वर्षकोटिभिः ॥

हिंदी भावार्थ:

“जो भक्तिपूर्वक इस उत्तम प्रथम सर्ग का कीर्तन करता है, उसके पुण्यफल को करोड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता।”

विशेष व्याख्या:

प्रथम सर्ग के कीर्तन का फल अपरिमित है।

टिप्पणी: यह श्लोक प्रथम सर्ग के कीर्तन के फल का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 93

प्रथमे सर्गमाहात्म्यं सर्वविघ्नविनाशनम् । रामप्रसादजननं सर्वसम्पत्करं शुभम् ॥

हिंदी भावार्थ:

“प्रथम सर्ग की महिमा सभी विघ्नों का नाश करने वाली, राम की कृपा उत्पन्न करने वाली, सभी सम्पत्तियाँ देने वाली और शुभ है।”

विशेष व्याख्या:

प्रथम सर्ग की महिमा के गुण – विघ्ननाश, रामकृपा, सर्वसम्पत्कर, शुभ।

टिप्पणी: यह श्लोक प्रथम सर्ग के गुणों का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 94

कलियुगे पापबहुले रामायणकथा शुभा । नराणां मुक्तिदा प्रोक्ता प्रथमसर्ग एव च ॥

हिंदी भावार्थ:

“पापबहुल कलियुग में रामायण की शुभ कथा मनुष्यों के लिए मुक्तिदायिनी कही गई है, और विशेष रूप से प्रथम सर्ग ही (मुक्तिदायक है)।”

विशेष व्याख्या:

कलियुग में रामायण कथा और विशेष रूप से प्रथम सर्ग मुक्तिदायक है।

टिप्पणी: यह श्लोक कलियुग में रामायण और प्रथम सर्ग के महत्व को बताता है।
श्लोक संख्या 95

सर्वशास्त्रसारभूतं रामायणमनुत्तमम् । तस्य प्रथमसर्गोऽयं सर्वपापप्रणाशनः ॥

हिंदी भावार्थ:

“सर्वशास्त्रों के सारभूत अनुपम रामायण का यह प्रथम सर्ग सभी पापों का नाश करने वाला है।”

विशेष व्याख्या:

रामायण के प्रथम सर्ग की महिमा – सर्वपापनाशक।

टिप्पणी: यह श्लोक प्रथम सर्ग की पापनाशक महिमा का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 96

गृहस्थेन सदा पुण्यं प्रथमं सर्गमुत्तमम् । पठितव्यं प्रयत्नेन रामप्रीत्यर्थमादरात् ॥

हिंदी भावार्थ:

“गृहस्थ को सदा इस पुण्यमय उत्तम प्रथम सर्ग का प्रयत्नपूर्वक और आदर के साथ पाठ करना चाहिए, राम को प्रसन्न करने के लिए।”

विशेष व्याख्या:

गृहस्थों के लिए प्रथम सर्ग पाठ का विधान।

टिप्पणी: यह श्लोक गृहस्थों को प्रथम सर्ग के पाठ का निर्देश देता है।
श्लोक संख्या 97

दिवसे दिवसे यस्तु प्रथमं सर्गमुत्तमम् । पठेत् तस्य दिने पापं नश्यत्येव न संशयः ॥

हिंदी भावार्थ:

“जो प्रतिदिन इस उत्तम प्रथम सर्ग का पाठ करता है, उसके उस दिन का पाप नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं।”

विशेष व्याख्या:

प्रतिदिन प्रथम सर्ग पढ़ने से उस दिन का पाप नष्ट होता है।

टिप्पणी: यह श्लोक प्रतिदिन प्रथम सर्ग पढ़ने के फल का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 98

इच्छति यत् फलं यस्तु तत् सर्वं लभते नरः । प्रथमं सर्गमासाद्य रामायणस्य कीर्तनात् ॥

हिंदी भावार्थ:

“मनुष्य जिस फल की इच्छा करता है, वह सब कुछ उसे प्राप्त होता है, रामायण के प्रथम सर्ग का कीर्तन करके।”

विशेष व्याख्या:

प्रथम सर्ग के कीर्तन से मनुष्य की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक प्रथम सर्ग के कीर्तन से सर्वकामनापूर्ति का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 99

आयुः कीर्तिं यशश्चैव धनं धान्यं सुतान् पशून् । प्रयच्छति नरेन्द्रस्य प्रथमसर्गकीर्तनात् ॥

हिंदी भावार्थ:

“प्रथम सर्ग के कीर्तन से राजाओं को आयु, कीर्ति, यश, धन, धान्य, पुत्र और पशु प्राप्त होते हैं।”

विशेष व्याख्या:

प्रथम सर्ग के कीर्तन से राजाओं को आयु, कीर्ति, यश, धन, धान्य, पुत्र और पशु मिलते हैं।

टिप्पणी: यह श्लोक प्रथम सर्ग के कीर्तन से होने वाले भौतिक लाभों का वर्णन करता है।
श्लोक संख्या 100

इति श्रीमद्वाल्मीकीये रामायणे बालकाण्डे संक्षेपरामायणं नाम प्रथमः सर्गः ॥

हिंदी भावार्थ:

“इस प्रकार श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण के बालकाण्ड में संक्षेप रामायण नामक प्रथम सर्ग समाप्त हुआ।”

विशेष व्याख्या:

बालकाण्ड के प्रथम सर्ग का समापन।

टिप्पणी: यह श्लोक बालकाण्ड के प्रथम सर्ग का समापन करता है।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।