॥ श्लोक १ ॥
तस्यां पुर्यां महातेजा दशरथो महीपतिः ।
आसीद्धर्मपरो नित्यं प्रजानां परिरक्षणे ॥ १-६-१ ॥
🔹 पदच्छेद : तस्याम् = उस; पुर्याम् = पुरी में; महातेजाः = महातेजस्वी; दशरथः = दशरथ; महीपतिः = राजा; आसीत् = थे; धर्मपरः = धर्मपरायण; नित्यम् = नित्य; प्रजानाम् = प्रजा की; परिरक्षणे = रक्षा में।
📖 भावार्थ : उस पुरी में महातेजस्वी राजा दशरथ थे, जो प्रजा की रक्षा में नित्य धर्मपरायण रहते थे।
🔍 व्याख्या : यह श्लोक राजा के प्राथमिक कर्तव्य को रेखांकित करता है – प्रजा की रक्षा करना। 'धर्मपरः' का अर्थ है जो धर्म का पालन करता है और धर्म के मार्ग पर चलता है।
॥ श्लोक २-३ ॥
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ।
सर्वे शीलसमोपेता वृद्धसेवापरायणाः ॥
सर्वे धर्मपरा नित्यं सर्वे वेदविदो जनाः ।
सर्वे यज्ञपरा नित्यं सर्वे दानपरायणाः ॥
📖 भावार्थ : सभी लोग सत्यपरायण, धीर, मत्सर-रहित, शीलसम्पन्न और वृद्धों की सेवा में तत्पर थे। सभी जन नित्य धर्मपरायण, वेदज्ञ, यज्ञ में तत्पर और दानपरायण थे।
🔍 व्याख्या : यहाँ अयोध्या के नागरिकों के आदर्श गुणों का वर्णन है। 'वृद्धसेवापरायणाः' – वृद्धों की सेवा करना उनका स्वभाव था। यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
॥ श्लोक ४-६ ॥
न तत्र चौराः सन्ति स्म न चौरभयमण्वपि ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ॥
सर्वे धर्मरतास्तत्र ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
यज्वानो जप्यशीलाश्च दानशीलाश्च सर्वदा ॥
क्षत्रियाः प्रतिगृह्णन्ति ब्राह्मणेभ्यः प्रदक्षिणम् ।
वैश्याः स्वधर्मनिरताः शूद्राः शुश्रूषणे रताः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ न कोई चोर थे, न चोरों का जरा-सा भय। न घोर रोगों का भय, न डाकुओं का भय। सभी ब्राह्मण धर्म में रत, वेदपारंगत, यज्ञ करने वाले, जपशील और सदा दानशील थे। क्षत्रिय ब्राह्मणों से दक्षिणा ग्रहण करते थे (उनका सम्मान करते थे)। वैश्य अपने धर्म में निरत थे और शूद्र सेवा में तत्पर थे।
॥ श्लोक ७-८ ॥
स्त्रियश्च वरवर्णिन्यो रूपयौवनशालिनः ।
पतिव्रताः पतिप्रेम्णा पतिसेवापरायणाः ॥
न तत्र विधवा काचिन्न च व्यालप्रदूषिता ।
न चान्या पुरुषं याति न च राज्ञोऽप्रियं वदेत् ॥
📖 भावार्थ : स्त्रियाँ उत्तम वर्ण वाली, रूप-यौवन से सम्पन्न, पतिव्रता, पति से प्रेम करने वाली और पति की सेवा में तत्पर थीं। वहाँ कोई विधवा नहीं थी, न कोई दुष्ट व्यक्ति द्वारा दूषित हुई थी। कोई स्त्री अन्य पुरुष के पास नहीं जाती थी और न ही राजा के प्रति अप्रिय बोलती थी।
॥ श्लोक ९-१० ॥
न तत्र शोको नार्ति वा न दुर्भिक्षं न चौरभयम् ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ॥
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ।
सर्वे शीलसमोपेता वृद्धसेवापरायणाः ॥
📖 भावार्थ : (पुनः बल देते हुए) वहाँ न शोक था, न पीड़ा, न अकाल, न चोरों का भय। न घोर रोगों का भय, न डाकुओं का भय। सभी सत्यपरायण, धीर, मत्सर-रहित, शीलसम्पन्न और वृद्धसेवा में तत्पर थे।