🕉️ बाल काण्ड · सर्ग 6

अयोध्या के राजा और लोग

बाल काण्ड का षष्ठ सर्ग अयोध्या के राजा दशरथ की प्रजा, उनके मंत्रीगण, राजपुरोहित, सेना, कोष और राजा की दिनचर्या का विस्तृत वर्णन करता है। इस सर्ग में अयोध्या के निवासियों के गुण, राजसभा की गरिमा, और राजा के न्यायप्रिय शासन का सजीव चित्रण है।

28 सम्पूर्ण श्लोक
6 सर्ग संख्या
42 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

बाल काण्ड का षष्ठ सर्ग अयोध्या के राजा दशरथ की प्रजा, उनके मंत्रीगण, राजपुरोहित, सेना, कोष और राजा की दिनचर्या का विस्तृत वर्णन करता है। इस सर्ग में अयोध्या के निवासियों के गुण, राजसभा की गरिमा, और राजा के न्यायप्रिय शासन का सजीव चित्रण है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

यह सर्ग अयोध्या के सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन का अद्भुत चित्र प्रस्तुत करता है। प्रारम्भ में अयोध्या के नागरिकों के गुणों का वर्णन है – वे सभी धर्मपरायण, सत्यवादी, वेदज्ञ, यज्ञशील, दानी और अतिथिसेवक थे। नगर में कोई भी व्यक्ति निर्धन, दुःखी या अधर्मी नहीं था। स्त्री-पुरुष सभी सुशील एवं सुसंस्कृत थे। तत्पश्चात् राजा दशरथ के मंत्रियों का वर्णन है – आठ मंत्री जो राजनीति में निपुण, धर्मात्मा और निष्ठावान थे। उनके नाम हैं – धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र। इनके अतिरिक्त राजपुरोहित वसिष्ठ और वामदेव का विशेष उल्लेख है, जो राजा के प्रमुख सलाहकार थे। सेना के अध्यक्ष एवं सेना के विभिन्न अंगों – हाथी, घोड़े, रथ, पैदल – का भी वर्णन है। राजकोष अपार धन-रत्नों से भरा था। राजा की दिनचर्या का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वे प्रातःकाल उठकर देवपूजन करते थे, फिर प्रजा की समस्याएँ सुनते थे, मंत्रियों के साथ राजनीति पर विचार-विमर्श करते थे, और सायंकाल विश्राम करते थे। वे न्याय में किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं करते थे। इस प्रकार यह सर्ग एक आदर्श राजा और आदर्श प्रजा के सहजीवन का प्रतीक है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६

(अयोध्या के राजा और लोग – शासन, प्रजा और दिनचर्या)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षष्ठः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में अयोध्या नगरी के भव्य रूप का वर्णन था। अब इस षष्ठ सर्ग में वाल्मीकि जी उस नगरी के निवासियों, उनके जीवन-मूल्यों, राजा दशरथ के मंत्रिमण्डल, राजपुरोहितों, सेना, कोष और राजा की दिनचर्या का सूक्ष्म चित्रण करते हैं। यह सर्ग यह दर्शाता है कि एक आदर्श राज्य के लिए केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ ही पर्याप्त नहीं, वरन् एक सुदृढ़ प्रशासनिक ढाँचा, नैतिक मूल्य और राजा-प्रजा का परस्पर प्रेम भी आवश्यक है।

👥 अयोध्या के नागरिक – गुण, स्वभाव एवं जीवनशैली (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १ ॥
तस्यां पुर्यां महातेजा दशरथो महीपतिः ।
आसीद्धर्मपरो नित्यं प्रजानां परिरक्षणे ॥ १-६-१ ॥
🔹 पदच्छेद : तस्याम् = उस; पुर्याम् = पुरी में; महातेजाः = महातेजस्वी; दशरथः = दशरथ; महीपतिः = राजा; आसीत् = थे; धर्मपरः = धर्मपरायण; नित्यम् = नित्य; प्रजानाम् = प्रजा की; परिरक्षणे = रक्षा में।
📖 भावार्थ : उस पुरी में महातेजस्वी राजा दशरथ थे, जो प्रजा की रक्षा में नित्य धर्मपरायण रहते थे।
🔍 व्याख्या : यह श्लोक राजा के प्राथमिक कर्तव्य को रेखांकित करता है – प्रजा की रक्षा करना। 'धर्मपरः' का अर्थ है जो धर्म का पालन करता है और धर्म के मार्ग पर चलता है।
॥ श्लोक २-३ ॥
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ।
सर्वे शीलसमोपेता वृद्धसेवापरायणाः ॥
सर्वे धर्मपरा नित्यं सर्वे वेदविदो जनाः ।
सर्वे यज्ञपरा नित्यं सर्वे दानपरायणाः ॥
📖 भावार्थ : सभी लोग सत्यपरायण, धीर, मत्सर-रहित, शीलसम्पन्न और वृद्धों की सेवा में तत्पर थे। सभी जन नित्य धर्मपरायण, वेदज्ञ, यज्ञ में तत्पर और दानपरायण थे।
🔍 व्याख्या : यहाँ अयोध्या के नागरिकों के आदर्श गुणों का वर्णन है। 'वृद्धसेवापरायणाः' – वृद्धों की सेवा करना उनका स्वभाव था। यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
॥ श्लोक ४-६ ॥
न तत्र चौराः सन्ति स्म न चौरभयमण्वपि ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ॥
सर्वे धर्मरतास्तत्र ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
यज्वानो जप्यशीलाश्च दानशीलाश्च सर्वदा ॥
क्षत्रियाः प्रतिगृह्णन्ति ब्राह्मणेभ्यः प्रदक्षिणम् ।
वैश्याः स्वधर्मनिरताः शूद्राः शुश्रूषणे रताः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ न कोई चोर थे, न चोरों का जरा-सा भय। न घोर रोगों का भय, न डाकुओं का भय। सभी ब्राह्मण धर्म में रत, वेदपारंगत, यज्ञ करने वाले, जपशील और सदा दानशील थे। क्षत्रिय ब्राह्मणों से दक्षिणा ग्रहण करते थे (उनका सम्मान करते थे)। वैश्य अपने धर्म में निरत थे और शूद्र सेवा में तत्पर थे।
॥ श्लोक ७-८ ॥
स्त्रियश्च वरवर्णिन्यो रूपयौवनशालिनः ।
पतिव्रताः पतिप्रेम्णा पतिसेवापरायणाः ॥
न तत्र विधवा काचिन्न च व्यालप्रदूषिता ।
न चान्या पुरुषं याति न च राज्ञोऽप्रियं वदेत् ॥
📖 भावार्थ : स्त्रियाँ उत्तम वर्ण वाली, रूप-यौवन से सम्पन्न, पतिव्रता, पति से प्रेम करने वाली और पति की सेवा में तत्पर थीं। वहाँ कोई विधवा नहीं थी, न कोई दुष्ट व्यक्ति द्वारा दूषित हुई थी। कोई स्त्री अन्य पुरुष के पास नहीं जाती थी और न ही राजा के प्रति अप्रिय बोलती थी।
॥ श्लोक ९-१० ॥
न तत्र शोको नार्ति वा न दुर्भिक्षं न चौरभयम् ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ॥
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ।
सर्वे शीलसमोपेता वृद्धसेवापरायणाः ॥
📖 भावार्थ : (पुनः बल देते हुए) वहाँ न शोक था, न पीड़ा, न अकाल, न चोरों का भय। न घोर रोगों का भय, न डाकुओं का भय। सभी सत्यपरायण, धीर, मत्सर-रहित, शीलसम्पन्न और वृद्धसेवा में तत्पर थे।

📜 राजा दशरथ के मंत्रीगण – नाम, गुण एवं कार्य (श्लोक ११-१८)

॥ श्लोक ११ ॥
मन्त्रिणस्तस्य राजर्षेर्बभूवुर्बुद्धिमत्तमाः ।
धृष्टिर्जयन्तो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः ॥ १-६-११ ॥
🔹 पदच्छेद : मन्त्रिणः = मंत्री; तस्य = उसके; राजर्षेः = राजर्षि के; बभूवुः = थे; बुद्धिमत्तमाः = अत्यन्त बुद्धिमान्; धृष्टिः = धृष्टि; जयन्तः = जयन्त; विजयः = विजय; सुराष्ट्रः = सुराष्ट्र; राष्ट्रवर्धनः = राष्ट्रवर्धन।
📖 भावार्थ : उस राजर्षि के अत्यन्त बुद्धिमान् मंत्री थे – धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन।
॥ श्लोक १२ ॥
अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमो मतः ।
एते मन्त्रिणः सर्वे राजशास्त्रविशारदाः ॥ १-६-१२ ॥
📖 भावार्थ : अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र – ये आठवें मंत्री माने गए। ये सभी मंत्री राजशास्त्र में निपुण थे।
॥ श्लोक १३-१४ ॥
सर्वे धर्मोपधानज्ञाः सर्वे नीतिविशारदाः ।
सर्वे कार्येष्वकर्मण्याः सर्वे शत्रुनिबर्हणाः ॥
सर्वे सत्यपरा राजन् सर्वे धर्मपरायणाः ।
सर्वे पण्डितमान्याश्च सर्वे विगतमत्सराः ॥
📖 भावार्थ : वे सभी धर्म के रहस्यों को जानने वाले, नीति में निपुण, कार्यों में अकर्मण्यता से रहित (सदा कार्यतत्पर), शत्रुओं का दमन करने वाले, सत्यपरायण, धर्मपरायण, पण्डितों द्वारा मान्य और मत्सर-रहित थे।
॥ श्लोक १५-१६ ॥
अष्टौ बभूवुस्ते राज्ञो दशरथस्य महात्मनः ।
मन्त्रिणो मन्त्रकुशला यथावदनुशासिनः ॥
तैः सार्धं स महातेजा मन्त्रिभिर्मन्त्रकोविदैः ।
बुभुजे पृथिवीं कृत्स्नां शशास च यथाविधि ॥
📖 भावार्थ : महात्मा दशरथ के ये आठ मंत्री थे, जो मन्त्र-कुशल और यथावत् शासन करने वाले थे। उन मन्त्रियों के साथ मिलकर वे महातेजस्वी राजा सम्पूर्ण पृथ्वी का भोग करते थे और यथाविधि शासन करते थे।

🕉️ राजपुरोहित – वसिष्ठ एवं वामदेव (श्लोक १९-२२)

॥ श्लोक १९ ॥
तस्य पुरोहितौ राज्ञः पितृपैतामहौ शुभौ ।
वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणोऽन्ये च सर्वशः ॥ १-६-१९ ॥
📖 भावार्थ : उस राजा के दो पुरोहित थे, जो पितृ-पैतामह (परम्परा से आए) और शुभ थे – वसिष्ठ और वामदेव। अन्य मंत्री भी सभी प्रकार से थे।
🔍 व्याख्या : वसिष्ठ और वामदेव अत्यन्त प्रतापी ऋषि थे। वसिष्ठ तो इक्ष्वाकु कुल के कुलगुरु थे। उनकी उपस्थिति राज्य को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती थी।
॥ श्लोक २०-२२ ॥
तावूचतुर्महात्मानौ धर्मज्ञौ धर्मसंहितौ ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञौ धनुर्वेदविशारदौ ॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञौ सर्वलोकहिते रतौ ।
यथावदनुशिष्टौ च राज्ञा धर्मेण धार्मिकौ ॥
📖 भावार्थ : वे दोनों महात्मा, धर्मज्ञ, धर्मसंहित (धर्मग्रन्थों के ज्ञाता), वेद-वेदाङ्ग के तत्त्वज्ञ, धनुर्वेद में निपुण, सभी शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व के ज्ञाता, सर्वलोकहित में रत और राजा द्वारा धर्मपूर्वक यथावत् सम्मानित थे।

⚔️ सेना एवं कोष – राज्य की सुरक्षा एवं समृद्धि (श्लोक २३-२८)

॥ श्लोक २३-२४ ॥
तस्य सेना महावीर्या हस्त्यश्वरथसंकुला ।
पत्तिभिः सुविहितैश्च ध्वजिनी च सुशोभिता ॥
कोषश्चासीन्महाराज्ञः सदा पूर्णो धनैः शुभैः ।
धान्यागारं च विपुलं यथाकालप्रदायकम् ॥
📖 भावार्थ : उस महाराजा की सेना महावीर्य थी, हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई थी। पैदल सैनिकों से सुसज्जित वह सेना ध्वजाओं से सुशोभित थी। उनका कोष सदा धन से परिपूर्ण था और धान्यागार (अन्न भण्डार) अत्यन्त विपुल था, जो समय पर अन्न प्रदान करता था।
🔍 व्याख्या : चतुरंगिणी सेना – हाथी, घोड़े, रथ, पैदल – का यहाँ उल्लेख है। कोष और धान्यागार की पूर्णता राज्य की आर्थिक समृद्धि को दर्शाती है।
॥ श्लोक २५-२६ ॥
नित्यं प्रहृष्टा धर्मज्ञा प्रजा धर्मेण शासिताः ।
न तत्र शोको नार्ति वा न दुर्भिक्षं न चौरभयम् ॥
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ।
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ॥
📖 भावार्थ : नित्य प्रसन्न, धर्मज्ञ प्रजा धर्मपूर्वक शासित थी। वहाँ न शोक, न पीड़ा, न अकाल, न चोरों का भय, न रोगों का भय, न डाकुओं का भय था। सभी सत्यपरायण, धीर और मत्सर-रहित थे।

⏳ राजा दशरथ की दिनचर्या एवं न्यायप्रियता (श्लोक २९-३५)

॥ श्लोक २९ ॥
स राजा प्रातरुत्थाय कृतपौर्वाह्णिकक्रियः ।
प्रजाः सर्वाः समागम्य शृणोति स्म च नित्यशः ॥ १-६-२९ ॥
📖 भावार्थ : वे राजा प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन कर्तव्यों (स्नान, ध्यान, पूजा) को सम्पन्न करके सभी प्रजा को बुलाकर उनकी समस्याएँ नित्य सुनते थे।
॥ श्लोक ३० ॥
तेषां च निखिलं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं वचः ।
विसर्जयित्वा तान् सर्वान् मन्त्रिभिः सह मन्त्रयेत् ॥ १-६-३० ॥
📖 भावार्थ : उनके धर्म और अर्थ से युक्त सम्पूर्ण वचनों को सुनकर, उन सबको विदा करके वे मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करते थे।
॥ श्लोक ३१ ॥
तेन धर्मेण राज्यं वै धार्यते सुमहात्मना ।
न चास्य विद्यते शत्रुर्न च राज्यं परैर्जितम् ॥ १-६-३१ ॥
📖 भावार्थ : उस सुमहात्मा राजा ने धर्म से राज्य धारण किया था। उनका कोई शत्रु नहीं था, न ही उनका राज्य कभी पराजित हुआ।
॥ श्लोक ३२-३३ ॥
स राजा धर्मविद् धीमान् दशरथो महीपतिः ।
प्रजाः पालयते सर्वाः पुत्रवत् प्रियवत्सलः ॥
न तस्य विद्यते शत्रुर्न च राज्यं परैर्जितम् ।
सर्वे तस्य प्रजा नित्यं प्रीतियुक्ताः सुखान्विताः ॥
📖 भावार्थ : वे धर्मज्ञ, बुद्धिमान् राजा दशरथ सभी प्रजाओं को पुत्र के समान स्नेह से पालन करते थे। उनका कोई शत्रु नहीं था, न कोई राज्य पराजित हुआ। उनकी सभी प्रजा सदा प्रीति-युक्त और सुख से युक्त थी।
॥ श्लोक ३४-३५ ॥
एवं गुणगणैर्युक्तः स राजा दशरथः सुखी ।
रेमे सत्यपराक्रमः प्रजानां हितकाम्यया ॥
तस्मिन् राजनि धर्मज्ञे प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः ।
बभूवुर्विगतशोकाश्च नित्यं प्रमुदिताः सदा ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार गुणों से युक्त वे राजा दशरथ सुखी थे और सत्यपराक्रमी होकर प्रजा के हित की कामना से विराजमान थे। उस धर्मज्ञ राजा के रहते सभी प्रजा सुखी, शोक-रहित और नित्य प्रसन्न रहती थी।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक यह निष्कर्ष देते हैं कि राजा के धर्मात्मा होने से ही प्रजा सुखी होती है। यही 'रामराज्य' की अवधारणा का आधार है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 आदर्श राजा के लक्षण

इस सर्ग में राजा दशरथ के माध्यम से एक आदर्श राजा के सभी गुणों का चित्रण हुआ है – धर्मपरायणता, प्रजापालन, न्यायप्रियता, मंत्रियों से परामर्श, सत्यनिष्ठा, और प्रजा को पुत्रवत् स्नेह।

🏛️ मंत्रिपरिषद का महत्व

आठ मंत्रियों का उल्लेख यह दर्शाता है कि राजा अकेले शासन नहीं करता, वरन् बुद्धिमान सलाहकारों के साथ मिलकर निर्णय लेता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का प्राचीन उदाहरण है।

🙏 धर्म और राज्य का संबंध

पूरे सर्ग में धर्म को राज्य का आधार बताया गया है। राजा धर्म से शासन करता है, प्रजा धर्म का पालन करती है – इसी से राज्य सुखी और समृद्ध होता है।

🌟 अयोध्या – एक आदर्श समाज

अयोध्या के नागरिकों के गुण – सत्यनिष्ठा, वृद्धसेवा, वेदज्ञता, दानशीलता – ये एक आदर्श समाज के निर्माण के सूत्र हैं। यहाँ सभी वर्ण अपने-अपने धर्म में स्थित हैं, जो सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि एक सशक्त राष्ट्र के लिए आवश्यक है – एक धर्मात्मा एवं न्यायप्रिय शासक, बुद्धिमान मंत्री, शक्तिशाली सेना, समृद्ध कोष, और सबसे महत्वपूर्ण – सदाचारी एवं कर्तव्यनिष्ठ नागरिक। इन सबके समन्वय से ही रामराज्य की स्थापना संभव है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

श्लोक संख्या 1

तस्यां पुर्यामयोध्यायां वेदवित् सर्वसंग्रहः । दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस अयोध्या नगरी में (राजा) वेदों के ज्ञाता, सर्वसंग्रह करने वाले, दूरदर्शी, महातेजस्वी और नागरिकों तथा जनपदवासियों को प्रिय (रहते थे)।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या नगरी के राजा दशरथ के गुणों का वर्णन करता है। वे वेदवेत्ता, करुणाशील, दूरदर्शी, तेजस्वी और जनता के प्रिय थे।

टिप्पणी: इस श्लोक में राजा के पाँच गुण बताए गए हैं। 'सर्वसंग्रहः' का अर्थ है करों का उचित संग्रह करने वाला या सबका पालन करने वाला। यह राजधर्म का सूचक है।
श्लोक संख्या 2

इक्ष्वाकूणामतिरथो यज्वा धर्मपरो वशी । महर्षिकल्पो राजर्षिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥

हिंदी भावार्थ:

“इक्ष्वाकु वंशियों में अतिरथ (महारथी), यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण, संयमी, महर्षि के समान राजर्षि, तीनों लोकों में विख्यात थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक राजा दशरथ के वंश, वीरता, धार्मिकता एवं लोकप्रियता का वर्णन करता है। वे इक्ष्वाकु वंश में अतिरथ, यज्ञ करने वाले, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय, महर्षि तुल्य राजर्षि थे और तीनों लोकों में विख्यात थे।

टिप्पणी: इस श्लोक में 'अतिरथ' शब्द का प्रयोग हुआ है, जो युद्ध में अकेले ही अनेक रथों का सामना करने की क्षमता रखने वाले योद्धा को कहते हैं। 'महर्षिकल्प' का अर्थ है महर्षि के समान तपस्वी और ज्ञानी, जो राजा होते हुए भी ऋषि जैसा आचरण रखता हो।
श्लोक संख्या 3

बलवान् निहतामित्रो मित्रवान् विजितेन्द्रियः । धनैश्च संचयैश्चान्यैः शक्रवैश्रवणोपमः ॥

हिंदी भावार्थ:

“बलवान्, शत्रुओं का नाश करने वाला, मित्रों से युक्त, जितेन्द्रिय, धन और संचय (कोष) तथा अन्य वैभवों में इन्द्र और कुबेर के समान था।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक राजा दशरथ के शारीरिक बल, शत्रु-विजय, मित्र-बल, इंद्रिय-संयम और ऐश्वर्य का वर्णन करता है। वे इन्द्र और कुबेर के समान धनवान थे।

टिप्पणी: 'शक्र' इन्द्र और 'वैश्रवण' कुबेर के नाम हैं। इन दोनों की तुलना से यह दर्शाया गया है कि राजा के पास अपार धन और संपदा थी, साथ ही उसका यश भी इन देवों के समान था।
श्लोक संख्या 4

यथा मनुर्महातेजा लोकस्य परिरक्षिता । तथा दशरथो राजा लोकस्य परिरक्षिता ॥

हिंदी भावार्थ:

“जैसे महातेजस्वी मनु प्रजा के रक्षक थे, वैसे ही राजा दशरथ प्रजा के रक्षक थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक राजा दशरथ की तुलना मनु से करता है। मनु आदि राजा और धर्मशास्त्र के प्रवर्तक थे। दशरथ भी उसी प्रकार प्रजा के रक्षक थे।

टिप्पणी: मनु का नाम यहाँ आदर्श राजा के रूप में लिया गया है। वे सप्तर्षियों में से एक और धर्मशास्त्र (मनुस्मृति) के रचयिता माने जाते हैं। उनके समान प्रजापालन करना राजा का परम कर्तव्य है।
श्लोक संख्या 5

तेन सत्याभिसंधेन त्रिवर्गमनुतिष्ठता । पालिता सा पुरी श्रेष्ठा इन्द्रेणेवामरावती ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस सत्यप्रतिज्ञ राजा द्वारा, जो धर्म, अर्थ, काम का पालन करता था, वह श्रेष्ठ नगरी ऐसे पालित की गई जैसे इन्द्र द्वारा अमरावती।”

विशेष व्याख्या:

इस श्लोक में राजा दशरथ की सत्यप्रतिज्ञता और त्रिवर्ग के पालन का वर्णन है। उन्होंने अयोध्या की रक्षा उसी प्रकार की जैसे इन्द्र अमरावती की।

टिप्पणी: त्रिवर्ग – धर्म, अर्थ और काम। ये तीन पुरुषार्थ कहे जाते हैं। राजा का कर्तव्य है कि वह इन तीनों का संतुलन बनाए रखे। अर्थ और काम का साधन धर्म से होना चाहिए।
श्लोक संख्या 6

तस्मिन् पुरवरे हृष्टा धर्मात्मानो बहुश्रुताः । नरास्तुष्टा धनैः स्वैः स्वैरलुब्धाः सत्यवादिनः ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस श्रेष्ठ नगर में सभी नर प्रसन्न, धर्मात्मा, बहुश्रुत (विद्वान), अपने-अपने धन से संतुष्ट, अलोभी और सत्यवादी थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की प्रजा के गुणों का वर्णन करता है – वे सभी प्रसन्न, धर्मात्मा, विद्वान, संतुष्ट, अलोभी और सत्यवादी थे।

टिप्पणी: इस श्लोक से पता चलता है कि राजा दशरथ के शासन में प्रजा कितनी सुखी और सद्गुणी थी। यह एक आदर्श राज्य के लक्षण हैं।
श्लोक संख्या 7

नाल्पसंनिचयः कश्चिदासीत् तस्मिन् पुरोत्तमे । कुटुम्बी यो ह्यसिद्धार्थोऽगवाश्वधनधान्यवान् ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस उत्तम नगर में कोई भी ऐसा कुटुम्बी (गृहस्थ) नहीं था जिसके पास थोड़ा संचय हो या जो धन, गौ, अश्व, धान्य से युक्त न हो (सब सम्पन्न थे)।”

विशेष व्याख्या:

इस श्लोक में अयोध्या के निवासियों की आर्थिक समृद्धि का वर्णन है। कोई भी गृहस्थ ऐसा नहीं था जिसके पास पर्याप्त संचय, गाय, घोड़े, धन और अनाज न हो।

टिप्पणी: यह श्लोक दर्शाता है कि अयोध्या में कोई गरीब या असहाय नहीं था। सभी के पास गौ, अश्व, धन और धान्य था। यह राज्य की समृद्धि का परिचायक है।
श्लोक संख्या 8

कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित् । द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिकः ॥

हिंदी भावार्थ:

“अयोध्या में कहीं भी कोई पुरुष कामी, कृपण, क्रूर, अविद्वान् या नास्तिक देखने को नहीं मिलता था।”

विशेष व्याख्या:

इस श्लोक में अयोध्या के निवासियों के नैतिक और बौद्धिक स्तर का वर्णन है। वहाँ कोई कामी, कृपण, क्रूर, अविद्वान या नास्तिक नहीं था।

टिप्पणी: यह श्लोक बताता है कि अयोध्या की प्रजा न केवल आर्थिक रूप से सम्पन्न थी, बल्कि चारित्रिक और बौद्धिक रूप से भी उच्च कोटि की थी। दोषों का अभाव और गुणों की उपस्थिति।
श्लोक संख्या 9

सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयताः । मुदिताः शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामलाः ॥

हिंदी भावार्थ:

“सभी नर और नारियाँ धर्मशील, सुसंयत (अच्छी तरह संयमित), शील और आचरण से प्रसन्न और महर्षियों के समान निर्मल थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या के सभी पुरुषों और स्त्रियों के धार्मिक आचरण, संयम, शील और पवित्रता का वर्णन करता है। वे महर्षियों के समान निर्मल थे।

टिप्पणी: यहाँ महर्षियों से तुलना करके नगरवासियों की उच्च नैतिक स्थिति को दर्शाया गया है। वे सभी आत्मसंयम और पवित्रता में ऋषियों के समान थे।
श्लोक संख्या 10

नाकुण्डली नामुकुटी नास्रग्वी नाल्पभोगवान् । नामृष्टो न नलिप्ताङ्गो नासुगन्धश्च विद्यते ॥

हिंदी भावार्थ:

“(वहाँ) कोई बिना कुण्डल का, बिना मुकुट का, बिना माला का, अल्पभोगी, बिना स्नान किया हुआ, लिप्त अंगों वाला (बिना उबटन लगाए), या सुगन्ध से रहित नहीं था।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के बाहरी ठाठ-बाठ, साज-श्रृंगार और भोग-विलास का वर्णन करता है। सभी आभूषण, वस्त्र, सुगंध आदि से सुसज्जित थे।

टिप्पणी: इस श्लोक में सात प्रकार के निषेध हैं, जिनका तात्पर्य है कि अयोध्या में सभी सुखी, सम्पन्न और सुसज्जित थे। यह राजा के उत्तम शासन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
श्लोक संख्या 11

नामृष्टभोजी नादाता नाप्यनङ्गदनिष्कधृक् । नाहस्ताभरणो वापि दृश्यते नाप्यनात्मवान् ॥

हिंदी भावार्थ:

“अयोध्या में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं देखा जाता था जो बिना हाथ-मुँह धोए भोजन करता हो, जो दान न देता हो, जो आभूषण (अंगद और निष्क) धारण न करता हो, जो हाथों में अंगूठी न पहनता हो, या जो आत्मसंयम से रहित हो।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के उच्च चरित्र और संस्कार को दर्शाता है। प्रत्येक नागरिक शारीरिक स्वच्छता, दानशीलता, श्रृंगार और आत्मसंयम में संपन्न था।

टिप्पणी: इस श्लोक में अयोध्या के लोगों के सात्विक गुणों का उल्लेख है। "अमृष्टभोजी" का अर्थ है बिना हाथ-मुँह धोए भोजन न करना – यह स्वच्छता का प्रतीक है। "अदाता" दान न देने वाला – अयोध्या में कोई कंजूस नहीं था। "अनङ्गदनिष्कधृक्" आभूषण धारण करने वाला – यह समृद्धि और सौंदर्यबोध दर्शाता है। "अहस्ताभरण" बिना हाथों के आभूषण – सभी सजे-धजे रहते थे। "अनात्मवान्" आत्मसंयम रहित – प्रत्येक व्यक्ति इंद्रियों पर नियंत्रण रखता था। यह श्लोक एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत करता है।
श्लोक संख्या 12

नानाहिताग्निर्नायज्वा न क्षुद्रो वा न तस्करः । कश्चिदासीदयोध्यायां न चार्वृत्तो न संकरः ॥

हिंदी भावार्थ:

“अयोध्या में कोई भी ऐसा नहीं था जिसने अग्निहोत्र (अग्नि) स्थापित न की हो, जो यज्ञ न करता हो, जो क्षुद्र (नीच) हो, जो चोर हो, जो दुराचारी हो, या जो वर्णसंकर (मिश्रित जाति) का हो।”

विशेष व्याख्या:

इस श्लोक में अयोध्या के निवासियों की धार्मिक निष्ठा और नैतिकता का वर्णन है। सभी अग्निहोत्री और यज्ञ करने वाले थे, कोई क्षुद्र या चोर नहीं था, और वर्णव्यवस्था का पालन होता था।

टिप्पणी: यह श्लोक अयोध्या की सामाजिक एवं धार्मिक उन्नति को रेखांकित करता है। "अनाहिताग्नि" उन लोगों को कहते हैं जिन्होंने वैदिक अग्नि (गृह्य अग्नि) स्थापित नहीं की। अयोध्या में ऐसा कोई न था, अर्थात सभी गृहस्थ अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते थे। "अयज्वा" वह है जो यज्ञ नहीं करता; यहाँ सभी यज्ञानुष्ठान में रत थे। "क्षुद्र" का अर्थ है नीच प्रवृत्ति का; कोई भी नीच न था। "तस्कर" चोर; अयोध्या में चोरी अज्ञात थी। "अर्वृत्त" बुरे आचरण वाला; सबका आचरण उत्तम था। "संकर" वर्णसंकर, अर्थात मिश्रित जाति के लोग (अनुलोम-प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न); वर्णव्यवस्था शुद्ध थी। यह श्लोक बताता है कि अयोध्या में धर्म, नीति और सामाजिक व्यवस्था पूर्ण रूप से विद्यमान थी।
श्लोक संख्या 13

स्वकर्मनिरता नित्यं ब्राह्मणा विजितेन्द्रियाः । दानाध्ययनशीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे ॥

हिंदी भावार्थ:

“ब्राह्मण सदा अपने-अपने कर्मों में लगे रहते थे, इंद्रियों पर विजय प्राप्त किए हुए थे, दान और अध्ययन में तत्पर थे, और प्रतिग्रह (दान लेने) में संयम रखते थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या के ब्राह्मणों के आदर्श चरित्र का वर्णन करता है। वे स्वधर्मपरायण, जितेन्द्रिय, दानशील, अध्ययनशील और प्रतिग्रह में संयमी थे।

टिप्पणी: इस श्लोक में ब्राह्मणों के चार प्रमुख गुण बताए गए हैं: 1. स्वकर्मनिरता – अपने वैदिक कर्तव्यों (यजन, याजन, अध्यापन, अध्ययन, दान, प्रतिग्रह) का पालन। 2. विजितेन्द्रियाः – इंद्रियों पर नियंत्रण, जो ब्राह्मण के लिए अनिवार्य है। 3. दानाध्ययनशीलाः – वे दान देना और वेदों का अध्ययन-अध्यापन करना अपना स्वभाव बनाए हुए थे। 4. प्रतिग्रहे संयताः – दान लेते समय वे अत्यंत संयम बरतते थे, अर्थात अनुचित या अधिक दान नहीं लेते थे। यह ब्राह्मणों की उच्च कोटि की सात्विकता को दर्शाता है।
श्लोक संख्या 14

नास्तिको नानृती वापि न कश्चिदबहुश्रुतः । नासूयको न चाशक्तो नाविद्वान् विद्यते क्वचित् ॥

हिंदी भावार्थ:

“अयोध्या में कहीं भी कोई नास्तिक, झूठ बोलने वाला, अल्पश्रुत (कम पढ़ा-लिखा), ईर्ष्यालु, असमर्थ या अज्ञानी नहीं था।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों के ज्ञान, सामर्थ्य और सद्गुणों की पराकाष्ठा दर्शाता है।

टिप्पणी: इस श्लोक में अयोध्यावासियों के छः दोषों का अभाव बताया गया है: 1. नास्तिक (आस्तिकता का अभाव), 2. अनृती (झूठ न बोलने वाला), 3. अबहुश्रुत (बहुश्रुत न होना, अर्थात सभी बहुश्रुत थे), 4. असूयक (ईर्ष्या न करने वाला), 5. अशक्त (असमर्थ नहीं, सभी समर्थ), 6. अविद्वान् (विद्वान न होना, अर्थात सभी विद्वान)। यह वर्णन अयोध्या के नागरिकों की उच्चतम शिक्षा, नैतिकता और योग्यता को उजागर करता है।
श्लोक संख्या 15

नाषडङ्गविदत्रास्ति नाव्रतो नासहस्रदः । न दीनः क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन ॥

हिंदी भावार्थ:

“यहाँ (अयोध्या में) कोई भी षडंग (वेद के छः अंग) न जानने वाला, व्रतहीन, सहस्र (बहुत) दान न देने वाला, दीन, व्यग्रचित्त या पीड़ित नहीं था।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्यावासियों की वैदिक शिक्षा, व्रतपरायणता, दानशीलता और मानसिक शांति को दर्शाता है।

टिप्पणी: इस श्लोक में अयोध्या के नागरिकों की वैदिक विद्या, धार्मिक अनुष्ठान, दान और मानसिक स्थिति का वर्णन है। "षडङ्गवित्" – वेद के छः अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) का ज्ञाता। अयोध्या में प्रत्येक व्यक्ति इनमें पारंगत था। "अव्रतः" – व्रत न करने वाला; सभी व्रतपरायण थे। "असहस्रदः" – हजारों का दान न देने वाला; अर्थात सभी बहुत दान देते थे। "दीनः" – दीन, गरीब; अयोध्या में कोई दरिद्र न था। "क्षिप्तचित्तः" – व्यग्र मन वाला; सभी का मन शांत था। "व्यथितः" – पीड़ित; कोई दुःखी न था। यह आदर्श समाज का चित्रण है।
श्लोक संख्या 16

कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान् नाप्यरूपवान् । द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान् ॥

हिंदी भावार्थ:

“अयोध्या में कोई भी पुरुष या स्त्री ऐसा नहीं देखा जा सकता था जो श्रीहीन (धनहीन) हो, रूपहीन हो, या राजा के प्रति भक्तिहीन हो।”

विशेष व्याख्या:

इस श्लोक में अयोध्या के नर-नारियों की संपन्नता, सौंदर्य और राजभक्ति का वर्णन है।

टिप्पणी: यह श्लोक अयोध्या के निवासियों की भौतिक और मानसिक समृद्धि को रेखांकित करता है। "अश्रीमान्" का अर्थ है जिसमें श्री (लक्ष्मी, संपत्ति, तेज) न हो; अयोध्या में ऐसा कोई न था। "अरूपवान्" – रूपहीन; सभी रूपवान थे। "राजन्यभक्तिमान्" – राजा के प्रति भक्ति रखने वाला; यहाँ निषेध का अर्थ है कि कोई राजभक्तिहीन न था। यह वर्णन अयोध्या के आदर्श समाज की पूर्णता को दर्शाता है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति त्रिविध संपन्नता – धन, रूप, और राजभक्ति – से युक्त था।
श्लोक संख्या 17

वर्णेष्वग्र्यचतुर्थेषु देवतातिथिपूजकाः । कृतज्ञाश्च वदान्याश्च शूरा विक्रमसंयुताः ॥

हिंदी भावार्थ:

“अग्र्य (श्रेष्ठ) और चतुर्थ (अंतिम) वर्णों (ब्राह्मण और शूद्र) सहित सभी वर्णों के लोग देवता और अतिथियों की पूजा करने वाले, कृतज्ञ, दानी, और पराक्रम से युक्त वीर थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक सभी वर्णों के लोगों के सार्वभौम सद्गुणों का वर्णन करता है।

टिप्पणी: इस श्लोक में वाल्मीकि ने अयोध्या के सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के समान गुणों का उल्लेख किया है। "अग्र्यचतुर्थेषु" का अर्थ है प्रथम (ब्राह्मण) और चतुर्थ (शूद्र) सहित, अर्थात सभी वर्ण। उनमें सामान्य गुण थे: 1. देवता और अतिथियों की पूजा करना, 2. कृतज्ञता, 3. दानशीलता, 4. वीरता और पराक्रम। यह बताता है कि अयोध्या में वर्ण-व्यवस्था के बावजूद सभी में सद्गुण विद्यमान थे और वे परस्पर सहयोग से रहते थे।
श्लोक संख्या 18

दीर्घायुषो नराः सर्वे धर्मं सत्यं च संश्रिताः । सहिताः पुत्रपौत्रैश्च नित्यं स्त्रीभिः पुरोत्तमे ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस उत्तम नगर (अयोध्या) में सभी पुरुष दीर्घायु थे, धर्म और सत्य का आश्रय लिए हुए थे, तथा पुत्र-पौत्रों और स्त्रियों के साथ सदा सहित (युक्त) थे।”

विशेष व्याख्या:

इस श्लोक में अयोध्या के पुरुषों की दीर्घायु, धर्म-सत्य में आस्था और पारिवारिक सुख का वर्णन है।

टिप्पणी: यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों के जीवन की चार विशेषताएँ बताता है: 1. दीर्घायुषः – सभी दीर्घायु थे, जो स्वास्थ्य और संतोष का सूचक है। 2. धर्मं सत्यं च संश्रिताः – धर्म और सत्य का आश्रय लेना, अर्थात सन्मार्ग पर चलना। 3. पुत्रपौत्रैः सहिताः – पुत्र-पौत्रों से युक्त, यह वंशवृद्धि और पारिवारिक सुख को दर्शाता है। 4. नित्यं स्त्रीभिः – सदा पत्नियों के साथ, यह दांपत्य सुख का प्रतीक है। इस प्रकार अयोध्या के नागरिक शारीरिक, नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक रूप से संपन्न थे।
श्लोक संख्या 19

क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद् वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः । शूद्राः स्वधर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः ॥

हिंदी भावार्थ:

“क्षत्रिय ब्राह्मणों के मुख से निर्देशित होते थे, वैश्य क्षत्रियों के अनुवर्ती थे, और शूद्र अपने धर्म में निरत रहकर तीनों वर्णों की सेवा करते थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक चारों वर्णों के पारस्परिक संबंधों और कर्तव्यों का वर्णन करता है।

टिप्पणी: इस श्लोक में वर्णों के बीच सहयोग और उनके कर्तव्यों का वर्णन है। "क्षत्रं ब्रह्ममुखम्" – क्षत्रिय ब्राह्मणों के मुख से निर्देशित होते थे, अर्थात ब्राह्मणों के परामर्श और आशीर्वाद से राज्य चलता था। "वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः" – वैश्य क्षत्रियों के अनुशासन में रहते थे, उनके संरक्षण में व्यापार-वाणिज्य करते थे। "शूद्राः स्वधर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः" – शूद्र अपने धर्म (सेवा) में निरत होकर तीनों वर्णों की सेवा करते थे। यह एक आदर्श वर्णाश्रम व्यवस्था का चित्र है जहाँ सभी अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए परस्पर सहयोग से रहते हैं।
श्लोक संख्या 20

सा तेनेक्ष्वाकुनाथेन पुरी सुपरिरक्षिता । यथा पुरस्तान्मनुना मानवेन्द्रेण धीमता ॥

हिंदी भावार्थ:

“उस नगरी (अयोध्या) की रक्षा इक्ष्वाकुवंशी राजा (दशरथ) ने उसी प्रकार की थी, जैसे पूर्वकाल में धीमान् मनु (प्रजापति) ने की थी।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक राजा दशरथ की प्रशंसा करता है कि उन्होंने अयोध्या की वैसे ही रक्षा की जैसे मनु ने की थी।

टिप्पणी: इस श्लोक में अयोध्या के राजा दशरथ की तुलना प्रथम राजा मनु से की गई है। "इक्ष्वाकुनाथेन" – इक्ष्वाकुवंश के स्वामी दशरथ। "सुपरिरक्षिता" – अच्छी तरह से रक्षित। "यथा पुरस्तान्मनुना" – जैसे पूर्वकाल में मनु ने। मनु को मानवेन्द्र (मनुष्यों के इंद्र) और धीमान् (बुद्धिमान) कहा गया है। इस प्रकार दशरथ ने अयोध्या की उत्कृष्ट रक्षा की, जिससे वह पूर्ववत् समृद्ध और सुरक्षित रही। यह श्लोक अयोध्या के वर्णन का समापन करता है।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।