सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
किष्किन्धाकाण्ड का 56वाँ सर्ग सम्पाती और वानरों के मिलन का वर्णन करता है। वानरों की निराशा देख सम्पाती उन्हें जटायु की मृत्यु और सीता के लंका में होने की सूचना देते हैं, जिससे वानरों को नई आशा मिलती है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५६
(सम्पाती द्वारा जटायु की मृत्यु की सूचना सुनना)
🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में समुद्र के तट पर पहुँचकर निराश हो जाते हैं। विशाल समुद्र को पार करना असम्भव लगता है। तभी वहाँ एक विशाल गृध्र (सम्पाती) आता है। वह वानरों से अपने भाई जटायु का समाचार पूछता है। यह सर्ग सम्पाती और वानरों के इस मिलन तथा सम्पाती द्वारा सीता के लंका में होने की पुष्टि का वर्णन करता है।
🌊 वानरों की निराशा और सम्पाती का आगमन (श्लोक १-८)
गत्वा निराशाः सञ्जाता न पश्यन्ति स्म जानकीम् ॥
ततः सम्पातिराकाशे श्रुत्वा तद्वानरवाक्यतः ।
अवतीर्य महातेजा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
के यूयं कस्य पुत्रा वा किमर्थं चात्र संस्थिताः ।
शोकसागरमध्यस्थाः सत्यं वदत मा चिरम् ॥
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥
रामस्य दूता वैदेह्या मार्गामो यत्र सा स्थिता ।
राक्षसेन हृता सीता त्वं हि जानासि राघवीम् ॥
इत्युक्तः स तदा तेन सम्पातिर्वाक्यमब्रवीत् ।
जटायुरिति विख्यातो मम भ्राता महाबलः ॥
स रामकार्ये निधनं गतः सत्यपराक्रमः ।
तस्य मे श्रूयतां वाक्यं यद्वृत्तं पूर्वमेव हि ॥
🦅 सम्पाती-जटायु की कथा और जटायु के वध का वृत्तान्त (श्लोक ९-२२)
भ्रात्रा दशरथस्यैष मम भ्राता महाबलः ॥
श्रूयतां यदि तत्सर्वं यथा वृत्तं पुरातनम् ।
पूर्वमावां महावेगौ सूर्यमार्गजिगीषया ॥
उत्पत्य गगनं प्राप्तौ भ्रातरौ रविमण्डलम् ।
तत्र मे दह्यमानस्य पक्षौ निपतितौ भुवि ॥
जटायुस्तु कृच्छ्रेण रक्षितो मां समुद्धरन् ।
ततः प्रभृति मे पक्षौ न वृद्धिं यात कर्हिचित् ॥
स एष रावणेनाद्य हतो दृष्टो मया पुरा ।
युध्यमानः सुबहुशो रामकार्ये दृढव्रतः ॥
जहार जानकीं सीतां मायामास्थाय दारुणाम् ॥
तं दृष्ट्वा जटायुः संग्रामे निवार्य रथिनां वरः ।
युयुधे बहुभिः शस्त्रै रावणेन बलीयसा ॥
स रावणबलोद्भूतैः शरैर्भिन्नतनुच्छदः ।
पपात धरणीं वीरो जटायुर्विनदन्मुहुः ॥
ततो रावणमासाद्य सीतां कृत्वा च दक्षिणे ।
जगाम लङ्कां दुर्धर्षो राक्षसैः परिवारितः ॥
तत्र सीता हि वैदेही रावणस्य निवेशने ।
रक्ष्यते राक्षसीभिश्च शोकाकुलितचेतना ॥
🏝️ सीता के लंका में होने की पुष्टि और वानरों का उत्साह (श्लोक २३-३५)
शतयोजनविस्तीर्णा दुर्गा रावणपालिता ॥
तत्र सीता स्थिता देवी राक्षसीभिः सुरक्षिता ।
रावणेन समानीता क्रोशन्ती रामरामेति ॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य सम्पातेर्हृष्टमानसाः ।
वानराः सहसोत्पेतुः कृतकृत्याश्च तेऽभवन् ॥
ततो हनूमतः प्रीतिः सम्बभूव महात्मनः ।
लङ्कायाश्च समुद्रस्य पारं गन्तुं मनो दधे ॥
सम्पातिरपि तान्सर्वानाशीर्भिरभिनन्द्य च ।
उवाच गम्यतां शीघ्रं सिद्धिं यास्यथ पुष्कलाम् ॥
प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रययुर्दक्षिणामुखाः ॥
सम्पातिरपि तान्दृष्ट्वा प्रस्थितान्हृष्टमानसः ।
अनुज्ञाप्य च तान्सर्वान्स्वमाश्रममुपागमत् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🦅 सम्पाती की भूमिका
सम्पाती इस सर्ग में मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। वे न केवल सीता के ठिकाने की जानकारी देते हैं, बल्कि जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर भी वानरों को प्रोत्साहित करते हैं। उनके बिना वानरों का अभियान अधूरा रह जाता।
❤️ भ्रातृप्रेम
सम्पाती और जटायु की कथा भ्रातृप्रेम का अद्भुत उदाहरण है। सम्पाती ने अपने भाई को खोया, फिर भी वह राम के कार्य में सहायता करता है।
🗺️ लंका का वर्णन
इस सर्ग में लंका की स्थिति, दूरी (सौ योजन) और वहाँ सीता की अवस्था का वर्णन है, जो आगे के सुन्दरकाण्ड की नींव रखता है।
🚀 हनुमान का संकल्प
सम्पाती के वचनों से हनुमान में लंका जाने का दृढ़ संकल्प जागता है, जो अगले सर्गों में फलीभूत होगा।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि निराशा के क्षणों में भी सही मार्गदर्शन मिलने पर नई आशा जागती है। हमें दूसरों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए, जैसे सम्पाती ने वानरों की सहायता की।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।