सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
शत्रुघ्न मथुरा में रहते हुए वाल्मीकि ऋषि के आश्रम जाते हैं और उनसे भेंट करते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ८३
(शत्रुघ्न का वाल्मीकि ऋषि से मिलने जाना)
🌿 आश्रम गमन की इच्छा (श्लोक १-५)
वाल्मीकिं द्रष्टुमिच्छामि मुनिं ब्रह्मर्षिसत्तमम्॥
इति संचिन्त्य धर्मात्मा यमुनापारमागतः।
ततस्तमसातीरं गत्वाश्रमपदं शुभम्॥
ददर्श तापसवृतं वाल्मीकिं ज्वलितप्रभम्।
उपास्यमानं मुनिभिर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥
स दृष्ट्वा परमप्रीतः शत्रुघ्नो रघुनन्दनः।
अवतीर्य रथात्तूर्णं मुनिं प्राञ्जलिरभाषत॥
भगवन्वाल्मीके महर्षे त्वां द्रष्टुं समुपागतः।
अनुग्रहं कुरुष्वेति प्रणामं च चकार ह॥
🙌 वाल्मीकि का स्वागत (श्लोक ६-१०)
प्रत्युत्थाय महातेजा आलिलिङ्ग सभाजयन्॥
स्वागतं ते महाबाहो कुशलं ते निरूप्यताम्।
कच्चित्ते मथुरा रम्या कच्चिद्राज्यं सुखावहम्॥
शत्रुघ्नः प्रत्युवाचेदं भगवन्सर्वमेव हि।
त्वत्प्रसादेन कुशलं राज्यं च सुखदं मम॥
वाल्मीकिरासनं दत्त्वा पाद्यार्घ्यं च न्यवेदयत्।
कुशलं परिपप्रच्छ रामस्य च भरस्य च॥
शत्रुघ्नः सर्वमाख्यातुं प्रवृत्तो राघवं प्रति।
वाल्मीकिः श्रुतवान् प्रीत्या रामचरितमुत्तमम्॥
📖 रामकथा श्रवण (श्लोक ११-१५)
शत्रुघ्नः श्रुतवान्सर्वं भक्त्या परमया युतः॥
यथा रामो वनं गत्वा सीतया सह लक्ष्मणः।
हत्वा रावणमासाद्य लङ्कां विधिवशात्पुनः॥
शत्रुघ्नो विस्मयं प्राप्तो रामस्य चरितं श्रुत्वा।
स्तुतिं चक्रे महात्मानं मुनिं च पर्यपूजयत्॥
ततः कतिपयाहानि तत्रोष्य स महायशाः।
आमन्त्र्य मुनिमुख्यं तं मथुरां पुनरागतः॥
✨ आशीर्वाद एवं प्रस्थान (श्लोक १६-२०)
पुत्रपौत्रविवृद्धिं च राज्यस्थैर्यं सुखानि च॥
शत्रुघ्नोऽपि च तं नत्वा प्रदक्षिणपुरःसरम्।
आरुरोह रथं शीघ्रं मथुरां प्रति सत्वरः॥
एवं शत्रुघ्नवर्येण मुनिदर्शनमुत्तमम्।
कृतं धर्म्यं यशस्यं च सर्वपापप्रणाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि भक्तितः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।