Durga Bhajan Lyrics

भजन - जइहा ना पुरुबवा बलमुआ लिरिक्स इन हिंदी - भक्ति लोक

52 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"जइहा ना पुरुबवा बलमुआ" एक अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक भोजपुरी देवी गीत (भजन) है, जो विशेष रूप से शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर संपूर्ण उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के क्षेत्रों में श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ गाया जाता है। यह भजन केवल एक लोकगीत नहीं है, बल्कि यह दांपत्य प्रेम, पारिवारिक सामंजस्य और भगवती दुर्गा के प्रति अनन्य भक्ति का एक अद्भुत और जीवंत उदाहरण है। इस भजन में एक पत्नी अपने पति (बलमुआ) से आजीविका के लिए परदेस (विशेषकर पूर्वी क्षेत्रों, जिसे लोकभाषा में 'पुरुबवा' कहा गया है) न जाने की भावुक मनुहार करती है। वह चाहती है कि उसका जीवनसाथी नवरात्रि के पावन दिनों में उसके साथ रहे, ताकि दोनों मिलकर आरा के प्रसिद्ध देवी मंदिर के मेले में जा सकें और आदि शक्ति माँ जगदम्बा का दर्शन-पूजन कर सकें। यह गीत विरह की आशंका, दांपत्य स्नेह और माँ दुर्गा के प्रति अटूट श्रद्धा के त्रिवेणी संगम को दर्शाता है, जो श्रोताओं के हृदय में भक्ति रस का संचार करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ जइहा ना पुरुबवा बलमुआ ॥

(कोरस / मुखड़ा)
जइहा ना पुरुबवा बलमुआ, आरा के मेला घुमाईब हो।
मैया के दर्शन कराईब हो, जइहा ना पुरुबवा बलमुआ॥
आरा के मेला घुमाईब हो, मैया के दर्शन कराईब हो।
जइहा ना पुरुबवा बलमुआ, आरा के मेला घुमाईब हो॥

(अंतरा - १)
सोने के थारी में जेवना परोसलीं, जेवना जेवहु मोरे स्वामी हो।
मैया के चरनन में शीश झुकाईब, भक्ति के रस बरसाईब हो॥
जइहा ना पुरुबवा बलमुआ, आरा के मेला घुमाईब हो।
मैया के दर्शन कराईब हो, जइहा ना पुरुबवा बलमुआ॥

(अंतरा - २)
गंगा जी के पनिया से कलशा भराईब, मैया के आरती उतारीब हो।
मनसा के पूरा कराईब हो, जइहा ना पुरुबवा बलमुआ॥
आरा के मेला घुमाईब हो, मैया के दर्शन कराईब हो।
जइहा ना पुरुबवा बलमुआ, आरा के मेला घुमाईब हो॥

(अंतरा - ३)
लाल रे चुनरिया मैया के चढ़ाईब, नारियल कंचन चढ़ाईब हो।
गोदी में बालक मंगाईब हो, जइहा ना पुरुबवा बलमुआ॥
जइहा ना पुरुबवा बलमुआ, आरा के मेला घुमाईब हो।
मैया के दर्शन कराईब हो, जइहा ना पुरुबवा बलमुआ॥

(अंतरा - ४)
शिल्पी राज गावेली मैया के भजनिया, सब पर कृपा बरसाईब हो।
मैया के चरनन में ध्यान लगाईब, बिगड़ी के बात बनाईब हो॥
जइहा ना पुरुबवा बलमुआ, आरा के मेला घुमाईब हो।
मैया के दर्शन कराईब हो, जइहा ना पुरुबवा बलमुआ॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भोजपुरी लोक संस्कृति और सनातन धर्म की समृद्ध परंपरा का एक सुंदर दस्तावेज है। इसका सरल अर्थ और भावार्थ निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

दांपत्य और भक्ति का समन्वय: इस भजन में नायिका अपने पति से कहती है कि हे मेरे प्रियतम (बलमुआ), आप कमाने के लिए पूर्व दिशा (परदेस) मत जाइए। हमारे जीवन में धनोपार्जन आवश्यक है, लेकिन नवरात्रि का यह पावन समय माँ दुर्गा की आराधना का है। मैं आपको आरा के प्रसिद्ध देवी मेले में ले जाऊँगी और हम दोनों मिलकर माँ के दर्शन करेंगे। यह दर्शाता है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी ईश्वर की भक्ति को प्राथमिकता देनी चाहिए।

समर्पण और सेवा भाव: अंतरा में नायिका अपने पति की सेवा के लिए सोने की थाली में भोजन परोसती है और उनसे भोजन करने का आग्रह करती है। यह भारतीय नारी के सेवा भाव और पतिव्रत धर्म को दर्शाता है। इसके साथ ही, वह माँ दुर्गा के चरणों में शीश झुकाकर भक्ति रस में सराबोर होने की इच्छा व्यक्त करती है।

पवित्रता और अनुष्ठान: भजन में गंगाजल से कलश भरने और माँ की आरती उतारने का वर्णन है। यह नवरात्रि के दौरान की जाने वाली घटस्थापना (कलश स्थापना) और पूजा अनुष्ठान की शुद्धता को रेखांकित करता है। नायिका को पूर्ण विश्वास है कि माँ दुर्गा की शरण में जाने से उसकी सभी मनोकामनाएं (मनसा) पूरी होंगी।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत गहरा है। इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • लोक संस्कृति का जीवंत चित्रण: यह भजन बिहार के आरा जिले और वहां आयोजित होने वाले ऐतिहासिक देवी मेले की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है। आरा में स्थित माँ अरण्य देवी का मंदिर अत्यंत प्राचीन और सिद्ध पीठ माना जाता है।
  • प्रवासन (Migration) की पीड़ा और भक्ति का संबल: पूर्वांचल और बिहार के समाज में पुरुषों का काम के सिलसिले में बाहर जाना (विशेषकर कोलकाता, असम आदि पूर्वी क्षेत्रों में) एक ऐतिहासिक सच्चाई रही है। यह भजन उस सामाजिक पृष्ठभूमि को दर्शाता है जहाँ एक पत्नी त्योहारों के समय अपने पति का साथ चाहती है और भक्ति को इस मिलन का माध्यम बनाती है।
  • मनोकामना पूर्ति का विश्वास: भजन में लाल चुनरी, नारियल और कंचन (सोना/पवित्र सामग्री) चढ़ाने का उल्लेख है, जो देवी पूजा की पारंपरिक सामग्रियां हैं। इसके माध्यम से संतान प्राप्ति और सुखी दांपत्य जीवन की कामना की गई है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने की एक विशेष शास्त्रीय और पारंपरिक विधि है, जिससे साधक को मानसिक शांति और देवी माँ की कृपा प्राप्त होती है:

शुभ समय: यह भजन मुख्य रूप से नवरात्रि (चैत्र और शारदीय नवरात्रि) के नौ दिनों के दौरान सुबह और शाम की पूजा के समय गाया जाता है। इसके अतिरिक्त, दुर्गा पूजा उत्सव, पारिवारिक मांगलिक कार्यों और जागरण (माता की चौकी) में भी इसे बड़े उत्साह के साथ गाया जाता है।

गायन की विधि: इस भजन को ढोलक, मंजीरा, और हारमोनियम के पारंपरिक लोक वाद्यों के साथ सामूहिक रूप से गाना चाहिए। सामूहिक संकीर्तन से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। गाते समय मन में माँ दुर्गा के प्रति पूर्ण समर्पण और अपने परिवार के कल्याण की भावना होनी चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से माँ दुर्गा (आदि शक्ति) को समर्पित है। विशेष रूप से इसमें बिहार के आरा में स्थित माँ अरण्य देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अरण्य देवी का मंदिर अत्यंत जाग्रत है और यहाँ आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस भजन को आधुनिक समय में सुप्रसिद्ध लोक गायिका शिल्पी राज ने अपनी मधुर आवाज देकर जन-जन तक पहुँचाया है, जिससे यह भजन युवा पीढ़ी के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय हो गया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि भोजपुरी लोकगीतों की समृद्ध परंपरा से जुड़ी है। प्राचीन काल से ही भोजपुरी अंचल में 'पूर्वी' और 'देवी गीत' गाने की परंपरा रही है। इस गीत की रचना में उस कालखंड का प्रभाव दिखता है जब संचार और यातायात के साधन सीमित थे और पति के परदेस जाने पर पत्नियां महीनों तक उनके लौटने का इंतजार करती थीं। ऐसे में नवरात्रि का त्योहार एक ऐसा अवसर होता था जब पत्नियां अपने पतियों को घर पर रोकने के लिए देवी माँ के दर्शन और मेले का बहाना बनाती थीं। यह सामाजिक ताने-बाने और धार्मिक आस्था का एक अनूठा दस्तावेज है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा शुद्ध भोजपुरी है, जो अपनी मिठास और आत्मीयता के लिए जानी जाती है। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक 'गीत' या 'पद' है, जिसमें लयबद्धता और गेयता (गाए जाने योग्य) का गुण कूट-कूट कर भरा है। इसमें 'बलमुआ' (पति), 'पुरुबवा' (पूर्व दिशा/परदेस), 'जेवना' (भोजन), और 'पनिया' (जल) जैसे ठेठ देशज शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो मिट्टी की सोंधी खुशबू का अहसास कराते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख और आध्यात्मिक संदेश देता है:

  1. कर्म और भक्ति का संतुलन: जीवन में भौतिक प्रगति और धन कमाना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए अपने परिवार, संस्कृति और आध्यात्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।
  2. पारिवारिक एकता: धार्मिक अनुष्ठान और त्योहार परिवार को एक सूत्र में बांधने का कार्य करते हैं। पति-पत्नी का साथ मिलकर पूजा करना दांपत्य जीवन को सुदृढ़ बनाता है।
  3. पूर्ण शरणागति: अपनी इच्छाओं और मनोकामनाओं को देवी माँ के चरणों में समर्पित कर देना ही सच्ची भक्ति है। माँ अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनती हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

भोजपुरी शब्द/वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक/सांस्कृतिक संदर्भ
बलमुआ पति / प्रियतम / जीवनसाथी दांपत्य प्रेम और आदर का सूचक शब्द।
पुरुबवा पूर्व दिशा / परदेस (कमाने जाने का स्थान) आजीविका के लिए घर से दूर जाने का प्रतीक।
जेवना भोजन / प्रसाद अतिथि और पति की सेवा का पारंपरिक रूप।
पनिया पवित्र जल (गंगाजल) पूजा और कलश स्थापना के लिए प्रयुक्त शुद्ध जल।
मनसा मन की इच्छा / मनोकामना माँ दुर्गा के समक्ष की जाने वाली प्रार्थना।
चुनरिया चुनरी / ओढ़नी देवी माँ को सुहाग के प्रतीक रूप में अर्पित की जाने वाली लाल पोशाक।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"जइहा ना पुरुबवा बलमुआ, आरा के मेला घुमाईब हो..."
नायिका अपने पति से मनुहार करते हुए कहती है कि हे स्वामी, आप इस नवरात्रि में कमाने के लिए परदेस मत जाइए। मैं आपको आरा के प्रसिद्ध मेले में ले जाऊँगी और वहाँ हम दोनों मिलकर आनंद उठाएंगे।

"मैया के दर्शन कराईब हो, जइहा ना पुरुबवा बलमुआ..."
वह आगे कहती है कि मेले में जाने का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि आदि शक्ति माँ दुर्गा का दर्शन करना है। मैं आपको माँ के दिव्य स्वरूप के दर्शन कराकर आपके जीवन को धन्य बनाऊँगी।

"सोने के थारी में जेवना परोसलीं, जेवना जेवहु मोरे स्वामी हो..."
वह अपने पति के प्रति आदर व्यक्त करते हुए सोने की थाली में स्वादिष्ट भोजन परोसती है और कहती है कि आप पहले प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण करें, क्योंकि आपकी प्रसन्नता में ही मेरा सुख निहित है।

"गंगा जी के पनिया से कलशा भराईब, मैया के आरती उतारीब हो..."
वह धार्मिक अनुष्ठान की तैयारी का वर्णन करती है कि हम गंगाजी के पवित्र जल से कलश की स्थापना करेंगे और श्रद्धापूर्वक माँ की आरती उतारकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन और श्रवण के साथ ही माँ दुर्गा के इन कल्याणकारी मंत्रों का जाप करने से अनंत गुना फल प्राप्त होता है:

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम जइहा ना पुरुबवा बलमुआ (भोजपुरी देवी गीत)
मुख्य देवी/देवता माँ दुर्गा / माँ अरण्य देवी (आरा)
प्रसिद्ध गायिका शिल्पी राज (एवं अन्य पारंपरिक लोक कलाकार)
भाषा भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य रस/भाव भक्ति रस, दांपत्य प्रेम, विरह और समर्पण भाव
उपयुक्त अवसर शारदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, दुर्गा पूजा, माता का जागरण
सांस्कृतिक महत्व पूर्वांचल और बिहार की लोक कला एवं धार्मिक आस्था का प्रतीक

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से आदि शक्ति माँ दुर्गा को समर्पित है। इसमें विशेष रूप से बिहार के आरा में स्थित माँ अरण्य देवी के मंदिर और वहां लगने वाले नवरात्रि मेले का संदर्भ दिया गया है।

'पुरुबवा' शब्द का अर्थ पूर्व दिशा या पूर्वी क्षेत्रों (जैसे कोलकाता, असम आदि) से है, जहाँ पुराने समय में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग आजीविका कमाने के लिए जाते थे। यहाँ इसका अर्थ 'परदेस' से है।

यह भजन मुख्य रूप से नवरात्रि (चैत्र और शारदीय नवरात्रि) तथा दुर्गा पूजा के पावन नौ दिनों के दौरान संपूर्ण उत्तर भारत में अत्यंत उत्साह के साथ गाया और सुना जाता है।

यद्यपि यह एक पारंपरिक लोकगीत है, लेकिन आधुनिक समय में इसे सुप्रसिद्ध भोजपुरी गायिका शिल्पी राज ने गाया है, जिससे यह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बेहद लोकप्रिय हुआ है।

बिहार के आरा जिले में स्थित माँ अरण्य देवी का मंदिर एक ऐतिहासिक और पौराणिक सिद्धपीठ है। नवरात्रि में यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है। भजन में इसी मेले में जाकर दर्शन करने की लालसा व्यक्त की गई है।

यह भजन हमें सिखाता है कि सांसारिक और आर्थिक जिम्मेदारियों के बीच भी हमें ईश्वर की भक्ति और परिवार के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए।

हाँ, इस भजन को किसी भी शुभ दिन, विशेषकर मंगलवार और शुक्रवार को, जो देवी माँ की पूजा के लिए विशेष माने जाते हैं, सुना जा सकता है। इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और मधुर भोजपुरी है। इसकी शैली पारंपरिक लोकगीत (देवी गीत) की है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्ति लोक के विद्वान संपादकों द्वारा सनातन धर्म की लोक परंपराओं और भोजपुरी लोक साहित्य के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। इस भजन में प्रयुक्त शब्दों और उनके सांस्कृतिक संदर्भों की प्रामाणिकता की जांच की गई है। यह सामग्री "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" की श्रेणी के अंतर्गत आती है, जिसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध और ज्ञानवर्धक भक्ति साहित्य उपलब्ध कराना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • भोजपुरी लोक साहित्य एवं पारंपरिक देवी गीत संग्रह।
  • माँ अरण्य देवी मंदिर (आरा, बिहार) की स्थानीय पौराणिक मान्यताएं।
  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - शक्ति आराधना का महत्व।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 27 Sep 2026

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