बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन और महापर्व छठ पूजा के अवसर पर लोकगीतों का एक विशेष और अटूट महत्व है। "छठी घाट चला जीजा" (Chhathi Ghat Chala Jija) एक ऐसा ही अत्यंत लोकप्रिय, पारंपरिक और उल्लास से भरा छठ गीत है, जो मुख्य रूप से मैथिली और भोजपुरी लोक संस्कृति के अनूठे पारिवारिक संबंधों और अगाध श्रद्धा को प्रदर्शित करता है। बंशीधर चौधरी द्वारा गाए गए इस मधुर भजन में जीजा और साली के बीच के पवित्र, हास्य-विनोद और आदरयुक्त संबंध के माध्यम से छठी मैया की महिमा और घाट पर जाने की उत्सुकता को दर्शाया गया है। यह गीत न केवल भक्ति रस से सराबोर है, बल्कि यह हमारे समाज में पारिवारिक एकता, सामूहिक उत्सव और लोक कला के जीवंत स्वरूप को भी रेखांकित करता है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन गीत के बोल, इसके गहरे आध्यात्मिक व सांस्कृतिक निहितार्थ, कठिन शब्दों के अर्थ और छठ महापर्व में इसके महत्व का सांगोपांग विश्लेषण करेंगे।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
॥ छठी घाट चला जीजा ॥
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए।
छठी घाट चला जीजा, दउरा माथा पर उठाए॥
साली पुकारे जीजा जीजा, बेरिया भइल जाए।
जल्दी से पगड़ी बांधू, दउरा माथा पर उठाए॥
छठी घाट चला जीजा, दउरा माथा पर उठाए॥
केला और नारियल से, दउरा सजाइल बा।
छठी मैया के पूजन को, मन हरषाइल बा॥
देर ना करा जीजा, सूरज देव डूबत जाए।
छठी घाट चला जीजा, दउरा माथा पर उठाए॥
घाट पर बाजे बाजा, भीर भइल भारी बा।
दीपक जलत बा सुंदर, आरती की तैयारी बा॥
अरघ के बेरिया भइल, मनवा गदगद जाए।
छठी घाट चला जीजा, दउरा माथा पर उठाए॥
बंशीधर गावे गीत, छठी मैया के ध्यान धरे।
सबके सुहाग और गोदी, मैया सदा आबाद करे॥
भक्ति भाव से जीजा, माथा झुकाए जाए।
छठी घाट चला जीजा, दउरा माथा पर उठाए॥
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
यह पावन छठ गीत "छठी घाट चला जीजा" लोक जीवन की जीवंतता और छठी मैया के प्रति अटूट विश्वास का एक सुंदर दस्तावेज है। इस गीत के माध्यम से एक साली अपने जीजा से आग्रह कर रही है कि वे जल्दी से तैयार होकर सिर पर पूजा का दउरा (बांस की टोकरी जिसमें प्रसाद होता है) उठाकर छठी घाट की ओर चलें।
प्रथम अंतरा: गीत की शुरुआत पारंपरिक लोक पंक्तियों "कांच ही बांस के बहंगिया" के संदर्भ से होती है, जो छठ पूजा की पवित्रता और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को दर्शाती है। साली अपने जीजा को पुकारते हुए कहती है कि समय बीतता जा रहा है, संध्या अर्घ्य का समय होने वाला है, इसलिए वे जल्दी से अपने सिर पर पगड़ी बांधें और पूजा का दउरा उठाकर घाट की ओर प्रस्थान करें।
द्वितीय अंतरा: इस भाग में दउरा की सजावट का वर्णन है। दउरा में शुद्धता के साथ केला, नारियल, ठेकुआ और अन्य मौसमी फल सजाए गए हैं। छठी मैया के पूजन के लिए सबका मन अत्यंत हर्षित और उत्साहित है। साली जीजा से कहती है कि अब तनिक भी विलंब न करें, क्योंकि भगवान सूर्य देव अस्ताचल की ओर बढ़ रहे हैं और संध्या अर्घ्य का समय अत्यंत निकट है।
तृतीय अंतरा: घाट के सुंदर और अलौकिक दृश्य का वर्णन करते हुए गीतकार कहते हैं कि घाट पर तरह-तरह के बाजे बज रहे हैं और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। चारों ओर घी के सुंदर दीपक जल रहे हैं और महाआरती की तैयारी हो रही है। अर्घ्य देने का पावन समय आ गया है, जिससे सभी भक्तों का मन गदगद और आनंदित हो रहा है।
चतुर्थ अंतरा: अंतिम पंक्तियों में गायक बंशीधर चौधरी छठी मैया का ध्यान करते हुए प्रार्थना करते हैं कि हे माता! आप सभी सुहागिनों के सुहाग की रक्षा करें और सभी माताओं की गोदी को संतान सुख से आबाद रखें। सभी भक्त और परिवार के सदस्य भक्ति भाव से ओतप्रोत होकर माता के चरणों में अपना शीश झुकाते हैं और मंगल कामना करते हैं।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस गीत की मुख्य भावना पारिवारिक समरसता, उल्लास और सामूहिक भक्ति है। छठ पूजा केवल एक व्यक्तिगत साधना नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार और समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला महापर्व है। इस गीत में निम्नलिखित महत्वपूर्ण संदेश छिपे हैं:
- पारिवारिक सहयोग: गीत में जीजा और साली का संवाद यह दिखाता है कि इस कठिन व्रत की तैयारी और संपादन में परिवार के हर सदस्य की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
- प्रकृति से जुड़ाव: बांस की बहंगी, दउरा, केला, नारियल और सूप जैसी प्राकृतिक वस्तुओं का उल्लेख हमें प्रकृति के संरक्षण और उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश देता है।
- समय का महत्व: "बेरिया भइल जाए" और "सूरज देव डूबत जाए" जैसी पंक्तियां हमें समय की पाबंदी और प्रकृति के नियमों के अनुसार चलने की सीख देती हैं।
- सामूहिक उल्लास: घाट पर बजने वाले बाजे और उमड़ने वाली भीड़ सामाजिक समरसता और भाईचारे का प्रतीक हैं, जहां अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है।
गीत की जानकारी | Song Information
| विवरण बिंदु (Parameter) | गीत की जानकारी (Details) |
|---|---|
| गीत का नाम (Song Name) | छठी घाट चला जीजा (Chhathi Ghat Chala Jija) |
| मुख्य गायक (Singer) | बंशीधर चौधरी (Banshidhar Chaudhary) |
| गीत की भाषा (Language) | मैथिली / अंगिका / भोजपुरी (लोक बोली) |
| मुख्य विषय (Theme) | छठ पूजा, पारिवारिक संवाद और घाट प्रस्थान |
| संगीत शैली (Music Style) | पारंपरिक लोक संगीत (Folk Devotional) |
| मुख्य वाद्य यंत्र (Instruments) | ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम, बांसुरी |
| उपयुक्त अवसर (Occasion) | छठ महापर्व (कार्तिक और चैती छठ) |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
इस लोकप्रिय छठ गीत को अपनी सुरीली और ऊर्जावान आवाज से सजाया है प्रसिद्ध लोक गायक बंशीधर चौधरी ने। बंशीधर चौधरी बिहार के लोक संगीत क्षेत्र में एक जाना-माना नाम हैं, विशेष रूप से मैथिली और अंगिका क्षेत्रों में उनके गीतों को बेहद पसंद किया जाता है। इस गीत में उन्होंने पारंपरिक धुनों को आधुनिक संगीत के साथ इस प्रकार पिरोया है कि यह युवाओं और बुजुर्गों दोनों को समान रूप से आकर्षित करता है। गीत के बोल अत्यंत सरल और आम बोलचाल की भाषा में हैं, जिससे हर कोई इससे सहजता से जुड़ जाता है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| कठिन शब्द (Word) | सरल हिंदी अर्थ (Meaning) | सांस्कृतिक संदर्भ (Context) |
|---|---|---|
| बहंगिया / बहंगी | बांस से बना हुआ कांवड़ | छठ का प्रसाद घाट तक ले जाने का पारंपरिक साधन। |
| दउरा | बांस की बड़ी टोकरी | इसमें ठेकुआ, फल और पूजा की अन्य सामग्रियां रखी जाती हैं। |
| बेरिया | समय या प्रहर | संध्या काल या अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त। |
| हरषाइल | हर्षित या अत्यंत प्रसन्न | भक्तों के मन में पूजा को लेकर उठने वाला उत्साह। |
| अरघ / अरघ्या | अर्घ्य (जल या दूध अर्पित करना) | डूबते और उगते सूर्य को अर्पण करने की मुख्य क्रिया। |
| सुहाग | पति की दीर्घायु का प्रतीक | छठी मैया से महिलाओं द्वारा मांगा जाने वाला अखंड सौभाग्य का वरदान। |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
छठ महापर्व में लोकगीतों की भूमिका केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि ये गीत इस कठिन व्रत के अनुष्ठानिक और आध्यात्मिक पक्ष को सरल भाषा में जन-जन तक पहुंचाते हैं। "छठी घाट चला जीजा" गीत का सांस्कृतिक महत्व बहुआयामी है:
1. लोक परंपरा का संरक्षण: यह गीत सदियों से चली आ रही मौखिक परंपरा को जीवित रखता है। "कांच ही बांस के बहंगिया" जैसी पंक्तियां प्राचीन काल से ही छठ गीतों का आधार रही हैं, जिन्हें नए संदर्भों में प्रस्तुत कर युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ा जाता है।
2. सामाजिक और पारिवारिक समरसता: छठ पूजा में जात-पात, ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं होता। इस गीत में जीजा-साली के माध्यम से पारिवारिक रिश्तों की मधुरता को दर्शाया गया है, जो यह संदेश देता है कि धर्म और उत्सव हमारे आपसी संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ और आनंदमय बनाते हैं।
3. प्रकृति और पर्यावरण की पूजा: गीत में वर्णित सामग्रियां जैसे बांस, केला, नारियल आदि पूर्णतः प्राकृतिक हैं। यह गीत हमें याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति प्रकृति की गोद में फली-फूली है और ईश्वर की सच्ची आराधना प्रकृति के संरक्षण में ही निहित है।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
इस मधुर लोकगीत से हम अपने दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख ले सकते हैं:
- सहयोग की भावना: जीवन के किसी भी बड़े कार्य या अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग अनिवार्य है। जैसे जीजा दउरा उठाते हैं और साली तैयारियों में हाथ बंटाती है।
- उत्साह और सकारात्मकता: कठिन से कठिन परिस्थितियों और व्रतों में भी मन को हमेशा "हरषाइल" यानी प्रसन्न और सकारात्मक रखना चाहिए।
- समय प्रबंधन: शुभ कार्यों को समय पर पूरा करना अत्यंत आवश्यक है। संध्या अर्घ्य का समय सीमित होता है, इसलिए समय रहते घाट पर पहुंचना अनुशासन सिखाता है।
- कृतज्ञता: सूर्य देव और छठी मैया के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमें यह सिखाता है कि हमें जीवन देने वाली शक्तियों के प्रति हमेशा नतमस्तक रहना चाहिए।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यह गीत विशेष रूप से छठ पूजा के चारों दिनों के दौरान सुना और गाया जाता है:
1. खरना के दिन से शुरुआत: खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद से ही घरों में छठ गीतों की गूंज तेज हो जाती है। इस समय महिलाएं समूह में बैठकर इस गीत को गाती हैं।
2. घाट प्रस्थान के समय (अत्यंत उपयुक्त): जब व्रती और उनके परिवार के सदस्य सिर पर दउरा रखकर घाट की ओर प्रस्थान करते हैं, तब यह गीत लाउडस्पीकरों और मोबाइल पर सबसे अधिक बजाया जाता है। यह गीत यात्रा के उत्साह को दोगुना कर देता है।
3. अर्घ्य के समय: घाट पर संध्या अर्घ्य और सुबह के अर्घ्य के बीच के समय में भी इस गीत का श्रवण भक्तों को भक्तिमय आनंद से सराबोर रखता है।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| मुख्य बिंदु | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| गीत का शीर्षक | छठी घाट चला जीजा |
| मुख्य देवता | छठी मैया (प्रकृति देवी) एवं भगवान सूर्य देव |
| गायक | बंशीधर चौधरी |
| मुख्य रस | भक्ति रस एवं वात्सल्य/हास्य-विनोद लोक रस |
| प्रमुख वाद्य | पारंपरिक ढोलक और आधुनिक सिंथेसाइज़र |
| मुख्य संदेश | पारिवारिक एकता, समय पर घाट पहुंचना और श्रद्धा भाव |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "छठी घाट चला जीजा" गीत के सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लोकगीत हमारी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं। बंशीधर चौधरी का यह गीत आधुनिक युग में भी पारंपरिक मूल्यों को संजोए रखने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस सामग्री का संपादन और संकलन लोक परंपराओं के विशेषज्ञों और वैदिक विद्वानों की देखरेख में किया गया है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री - संदर्भ एवं व्याख्या सहित सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- बिहार की लोक संस्कृति और पारंपरिक छठ गीत संग्रह।
- श्रीमद्भगवद्गीता और पुराणों में वर्णित सूर्य उपासना के शास्त्रीय संदर्भ।
- मैथिली और भोजपुरी लोक साहित्य अकादमी के शोध पत्र।
- बंशीधर चौधरी के आधिकारिक भक्ति संगीत एल्बम और प्रस्तुतियां।
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