Parvati Stotram

एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरख मूल मंत्र(Ek Onkar Satnam Karta Purakh Mool Mantra in Hindi )

904 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरख मूल मंत्र का समग्र परिचय

सिख धर्म के मूल आधार और गुरु ग्रंथ साहिब की प्रथम वाणी के रूप में 'मूल मंत्र' (Mool Mantra) का आध्यात्मिक जगत में अत्यंत विशिष्ट और सर्वोच्च स्थान है। 'एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरख' से प्रारंभ होने वाला यह पावन मंत्र केवल एक धार्मिक श्लोक नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की उस अदम्य, निराकार और सर्वव्यापक शक्ति का सबसे सटीक दार्शनिक और आध्यात्मिक प्रतिपादन है जो संपूर्ण चराचर जगत का संचालन करती है। सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी द्वारा रचे गए इस मंत्र में संपूर्ण वेदों, उपनिषदों और आस्तिक दर्शनों का सार निहित है। जब कोई साधक या जिज्ञासु इस मंत्र का स्मरण करता है, तो उसके भीतर का अज्ञान और द्वेष समाप्त होने लगता है तथा उसे परम सत्य की अनुभूति होने लगती है। भक्तीलोक के इस विस्तृत और प्रामाणिक लेख में हम 'मूल मंत्र' के हर एक शब्द के गहन अर्थ, इसके दार्शनिक महत्व, जाप विधि और जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तार से अध्ययन करेंगे, जिससे पाठकों को आत्मिक शांति और सनातन ज्ञान की प्राप्ति हो सके।

मूल मंत्र एवं शुद्ध पाठ

ੴ स नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर ਪ੍ਰਸਾदि ॥

हिंदी लिप्यंतरण:
एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरख निरभऊ निरवैर अकाल मूरत अजूनी सैभं गुरप्रसाद ॥

मंत्र उच्चारण एवं पद-विच्छेद

इस पावन मूल मंत्र के सही उच्चारण और प्रभावशीलता के लिए इसके प्रत्येक शब्द का शुद्ध पद-विच्छेद और उच्चारण अत्यंत आवश्यक है। गुरुमुखी लिपि से हिंदी में रूपांतरित इस मंत्र को धीरे-धीरे और स्पष्ट रूप से पढ़ा जाना चाहिए:

  • ੴ (एक ओंकार): एक + ओंकार (ब्रह्मांड की मूल ध्वनि)
  • सतनाम (सत् नामु): सत्य + नाम (जिसका नाम ही सत्य है)
  • कर्ता पुरख (कर्ता पुरखु): सृष्टिकर्ता + सर्वव्यापक पुरुष
  • निरभऊ (निरभउ): भय से रहित (निर्भय)
  • निरवैर (निरवैरु): किसी से भी द्वेष या शत्रुता न रखने वाला
  • अकाल मूरत (अकाल मूरति): काल (समय) से परे जिसका स्वरूप है
  • अजूनी: जो योनि में जन्म नहीं लेता (अजन्मा)
  • सैभं: स्वयंभू (स्वयं से प्रकट होने वाला)
  • गुरप्रसाद (गुर प्रसादि): गुरु की कृपा (प्रसाद) द्वारा प्राप्त होने वाला

विस्तृत शब्दार्थ एवं पद-विच्छेद

मूल शब्द (गुर्मुखी/संस्कृत) पद-विच्छेद सरल Hindi Meaning Contextual Meaning
ੴ एक + ओंकार ईश्वर एक है और वह ओंकार है परमात्मा की अद्वितीयता और आद्य नाद का प्रतीक
सत् नामु सत् + नाम सत्य ही जिसका नाम है अविनाशियों में एकमात्र शाश्वत सत्य
कर्ता पुरखु कर्ता + पुरुष रचने वाला और सर्वव्यापक चेतना संपूर्ण ब्रह्मांड का निर्माता और संचालक
निरभउ निर् + भय भयमुक्त जिसे किसी भी शक्ति से कोई भय नहीं है
निरवैरु निर् + बैर वैर-रहित जो किसी से द्वेष नहीं करता, जो करुणावान है
अकाल मूरति अकाल + मूरति काल (समय) से परे जिसका स्वरूप अमर, अविनाशी और शाश्वत वास्तविकता
अजूनी अ + जूनी योनि से रहित जो जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता (अजन्मा)
सैभं स्वयंभू स्वयं से प्रकट होने वाला जिसका कोई माता-पिता या आदि कारण नहीं है
गुर प्रसादि गुरु + प्रसाद गुरु की कृपा से प्राप्त Divine Grace (दिव्य कृपा) के बिना जिसकी प्राप्ति असंभव है

सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ

मूल मंत्र सिख धर्म का हृदय और आत्मा है, जो ईश्वर के स्वरूप को अत्यंत सरल किंतु वैज्ञानिक एवं दार्शनिक शब्दों में परिभाषित करता है। 'एक ओंकार' का अर्थ है कि इस संपूर्ण सृष्टि को रचने और पालने वाली परम शक्ति अनेक नहीं, बल्कि केवल एक ही है। वही एक शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। 'सतनाम' बताता है कि इस भौतिक जगत में सब कुछ नश्वर और परिवर्तनशील है, केवल ईश्वर का नाम और उसका अस्तित्व ही शाश्वत सत्य है। 'कर्ता पुरख' का तात्पर्य है कि वह परमात्मा केवल निष्क्रिय दृष्टा नहीं है, बल्कि वह इस सृष्टि का सक्रिय रचयिता और हर कण में वास करने वाला पुरुष (चेतना) है।

आगे के शब्दों में, ईश्वर को 'निरभऊ' (भयमुक्त) और 'निरवैर' (द्वेषरहित) बताया गया है। इसका अर्थ यह है कि जो परमात्मा सृष्टिकर्ता है, वह समस्त भयों से परे है क्योंकि उससे बड़ा कोई नहीं है, और वह किसी से भी बैर नहीं रखता क्योंकि संपूर्ण सृष्टि उसकी अपनी ही संतान है। 'अकाल मूरत' का भाव है कि उसका स्वरूप समय और काल की सीमाओं से परे है; वह जन्म और मृत्यु के बंधनों से मुक्त ('अजूनी') है और वह किसी अन्य पर निर्भर न होकर स्वयं ही उत्पन्न हुआ ('सैभं') है। अंत में, 'गुरप्रसाद' यह सिखाता है कि इस सर्वोच्च सत्य की अनुभूति केवल और केवल सच्चे गुरु की कृपा और दिव्य मार्गदर्शन से ही संभव है। इस प्रकार, यह मंत्र मनुष्य को अहंकार त्यागकर उस एक परम सत्य से जुड़ने की प्रेरणा देता है।

मंत्र का भाव एवं आध्यात्मिक संदेश

मूल मंत्र हमें यह सिखाता है कि मनुष्य जीवन का परम उद्देश्य उस एक अकाल पुरुष को पहचानना और उसके गुणों को अपने जीवन में उतारना है। जब हम यह जान लेते हैं कि ईश्वर निरवैर (द्वेषरहित) है, तो हमारे मन से भी दूसरों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष की भावना स्वतः समाप्त होने लगती है। यह मंत्र हमें समता, निस्वार्थ सेवा, और आंतरिक शांति का मार्ग दिखाता है। इसके नियमित स्मरण से मनुष्य के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सांसारिक दुखों से ऊपर उठकर आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है। ऐसे ही अन्य पावन स्तोत्रों के बारे में जानने के लिए आप श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र के लेखों को भी पढ़ सकते हैं।

शास्त्रीय संदर्भ, ऋषि, छंद एवं देवता

यह मूल मंत्र गुरु ग्रंथ साहिब के आदि में, जपजी साहिब के प्रारंभ में आता है। इसकी रचना सिखों के प्रथम गुरु, जगतगुरु श्री नानक देव जी महाराज द्वारा की गई है। इस मंत्र का कोई पारंपरिक वैदिक छंद नहीं है क्योंकि यह गुरुबाणी का हिस्सा है, किंतु इसकी लय, गात्मकता और गांभीर्य इसे किसी भी उपनिषदिक महावाक्य के समकक्ष खड़ा करते हैं। इसके आराध्य देव 'ੴ' यानी निर्गुण, निराकार अकाल पुरख वाहिगुरु हैं। सिख परंपरा में इसे गुरुमंत्र और बीज मंत्र दोनों की मान्यता प्राप्त है।

मंत्र जप विधि, नियम एवं शुभ मुहूर्त

  • शुभ समय: मूल मंत्र के जाप के लिए ब्रह्म मुहूर्त (तड़के 3:00 बजे से 6:00 बजे तक) या संध्याकाल का समय सबसे उत्तम माना जाता है।
  • स्थान और पवित्रता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शांत एकाग्र स्थान पर आसन लगाकर बैठें।
  • जप संख्या: इस मंत्र का जाप श्रद्धा अनुसार 5, 11, 21 या 108 बार किया जा सकता है।
  • उच्चारण शुद्धता: मन में पूर्ण समर्पण भाव रखते हुए प्रत्येक शब्द के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करें।
  • नियम: पाठ के दौरान मन को शांत रखें और सांसारिक चिंताओं से मुक्त रहकर गुरु चरणों में ध्यान लगाएं।

मंत्र का दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

दार्शनिक दृष्टिकोण से, 'मूल मंत्र' अद्वैत वेदांत और एकेश्वरवाद का एक सुंदर संगम है। यह इस बात पर जोर देता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही ऊर्जा का विस्तार है। जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि घट-घट में वही 'कर्ता पुरख' वास कर रहा है, तो वह किसी भी जीव के प्रति हिंसा या भेदभाव नहीं करता। यह मंत्र मनुष्य को अहंकार से निकालकर विनम्रता की ओर अग्रसर करता है।

मंत्र के आध्यात्मिक लाभ

  1. मन की चंचलता और अज्ञात भय का नाश होता है।
  2. आंतरिक शांति, संतोष और सकारात्मकता की प्राप्ति होती है।
  3. अहंकार, क्रोध और द्वेष जैसी मानसिक विकृतियों का शमन होता है।
  4. परमात्मा के प्रति गाढ़ भक्ति और अटूट विश्वास जागृत होता है।
  5. दैनिक जीवन में नैतिक मूल्यों और सदाचार का विकास होता है।

मंत्र का दैनिक जीवन में महत्व

आज की भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जिंदगी में मानसिक शांति पाने के लिए मूल मंत्र का स्मरण एक अचूक औषधि की तरह काम करता है। जब भी जीवन में कोई कठिनाई या संकट आए, तो 'एक ओंकार सतनाम' का स्मरण व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है। यह पारिवारिक जीवन में प्रेम, सद्भाव और सहिष्णुता को बढ़ावा देता है।

Quick Information Table

मंत्र का नाम मूल मंत्र (Mool Mantra)
आराध्य देव अकाल पुरख / वाहिगुरु (निर्गुण निराकार ब्रह्म)
रचइया / गुरु श्री गुरु नानक देव जी महाराज
ग्रंथ संदर्भ श्री गुरु ग्रंथ साहिब (आरंभिक वाणी / जपजी साहिब)
भाषा / लिपि गुरुमुखी / संत भाषा
जप संख्या 11, 21 या 108 बार (श्रद्धा अनुसार)
मुख्य उद्देश्य परम सत्य की प्राप्ति, भय मुक्ति और आत्मिक शांति

मुख्य आध्यात्मिक संदेश

  • ईश्वर एक है और वह संपूर्ण चराचर जगत का एकमात्र निर्माता है।
  • सत्य ही सबसे बड़ा आभूषण और जीवन का आधार है।
  • भय और द्वेष को छोड़कर प्रेम और करुणा का मार्ग अपनाएं।
  • जीवन के हर पल में उस अकाल पुरख की उपस्थिति को महसूस करें।
  • गुरु की कृपा के बिना आध्यात्मिक उन्नति असंभव है।

संबंधित मंत्र, श्लोक, स्तोत्र एवं प्रार्थनाएं

सिख और सनातन आध्यात्मिक परंपरा में ऐसे कई अन्य पावन ग्रंथ और स्तोत्र हैं जो मनुष्य को दिव्यता से जोड़ते हैं। आप श्री सुंदरकांड पाठ और अन्य धार्मिक रचनाओं के माध्यम से अपनी आध्यात्मिक यात्रा को और अधिक समृद्ध बना सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

मूल मंत्र की रचना सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी महाराज ने की थी। यह पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब के बिल्कुल आरंभ में दर्ज है।

'एक ओंकार' का अर्थ है कि ईश्वर एक है और वह समस्त ब्रह्मांड का मूल नाद और स्रोत है। अनेकता में एकता का यह सबसे बड़ा प्रतीक है।

हाँ, मूल मंत्र सर्वव्यापी परमात्मा की स्तुति है। जाति, धर्म, या संप्रदाय के बंधन से ऊपर उठकर कोई भी व्यक्ति मानसिक शांति और आत्मिक उन्नति के लिए इसका जाप कर सकता है।

'सतनाम' का अर्थ है कि इस संसार में केवल ईश्वर का नाम और उसका सत्य स्वरूप ही शाश्वत और अपरिवर्तनीय है, बाकी सब नश्वर है।

'निरभऊ' का अर्थ है जो भयमुक्त है (जिसे किसी का भय नहीं है) और 'निरवैर' का अर्थ है जो किसी से भी द्वेष या शत्रुता नहीं रखता।

ब्रह्म मुहूर्त (सुबह का समय) या संध्याकाल में शांत चित्त होकर इसका जाप करना सबसे अधिक फलदायी माना जाता है, हालांकि इसे दिन में कभी भी स्मरण किया जा सकता है।

'अकाल मूरत' यानी समय से परे अमर स्वरूप, और 'अजूनी' यानी योनि या जन्म-मरण के चक्र से मुक्त। ये दोनों शब्द ईश्वर की अमरता को दर्शाते हैं।

इसके नियमित पाठ से मनुष्य के भीतर से अहंकार, ईर्ष्या और भय समाप्त होते हैं तथा विनम्रता, परोपकार और मानसिक शांति का विकास होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तलोक पर प्रकाशित यह सामग्री प्रामाणिक सिख इतिहास, गुरुबाणी के सिद्धांतों और दार्शनिक ग्रंथों के गहन अध्ययन पर आधारित है। पाठकों की आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने और सटीक जानकारी प्रदान करने के लिए इसे विशेष रूप से तैयार किया गया है। यह संपूर्ण सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत मान्य है।

स्रोत एवं संदर्भ

  • श्री गुरु ग्रंथ साहिब - आदि ग्रंथ साहिब (जपजी साहिब प्रसंग)
  • सिख इतिहास और दर्शन ग्रंथ - डॉ. सुरिंदर सिंह कोहली
  • गुरु नानक वाणी और दार्शनिक चिंतन
  • पारंपरिक सिख रेहत मर्यादा एवं विद्वानों के संस्मरण

संबंधित भजन एवं लेख

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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