देवादिदेव महादेव भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। शिव पुराण और विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जो भक्त सच्चे मन से भगवान भोलेनाथ की शरण में जाता है, उसे इस लोक और परलोक दोनों में अक्षय सुख की प्राप्ति होती है। "जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है" भजन भगवान शिव की उसी असीम और अहैतुकी कृपा का बहुत ही सुंदर, भावपूर्ण और लयबद्ध वर्णन करता है। जब देवादिदेव अपने भक्तों पर प्रसन्न होते हैं, तो वे अपनी जटाओं, त्रिशूल और डमरू की ध्वनि के साथ भक्त की झोली ऐसी भर देते हैं जिसकी कोई सीमा नहीं होती। इस भजन में साधक के समर्पण, शिव के वैराग्य और उनकी कृपा की भव्यता को दर्शाया गया है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, सरल हिंदी अर्थ, आध्यात्मिक महत्व, गायन विधि और शिव भक्ति से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि साधक इसका पूरा आध्यात्मिक लाभ उठा सकें।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है,
तो देने वाले को सदका तू क्यों नहीं देता है!
जटाओं से जो गंगा बहाते हैं,
भक्तों के सारे दुख मिटाते हैं।
जो शरण में आए उसकी बिगड़ी बनाते हैं,
वह भोले भंडारी सबका भाग जगाते हैं!
जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है,
तो देने वाले को सदका तू क्यों नहीं देता है!
गले में जिनके नाग बिराजे,
हाथ में डमरू और त्रिशूल साजे।
भस्म रमाने वाले आशुतोष कहलाते हैं,
वे पल भर में भक्तों के कष्ट भगाते हैं!
जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है,
तो देने वाले को सदका तू क्यों नहीं देता है!
नंदी पर जो सवारी करते,
भक्तों की हर विपदा हरते।
जो मांगे उसे मनचाहा वरदान देते हैं,
वे महाकाल तीनों लोकों में पूजे जाते हैं!
जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है,
तो देने वाले को सदका तू क्यों नहीं देता है!
उपासना और माया का यह गान,
शिव चरणों में अर्पित है प्राण।
जो भोले के गुण गाता है निसदिन,
उसका जीवन बनता है परम पावन!
जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है,
तो देने वाले को सदका तू क्यों नहीं देता है!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का केंद्रीय भाव कृतज्ञता (Gratitude) और देवादिदेव महादेव के प्रति अनन्य समर्पण है। भजन की इन पंक्तियों— *"जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है, तो देने वाले को सदका तू क्यों नहीं देता है!"*— के माध्यम से कवि या रचनाकार मनुष्य को यह स्मरण करा रहा है कि भगवान शिव ने हमें यह अनमोल जीवन, सांसें, प्रकृति और समस्त सुख-संसाधन बिना किसी शर्त के असीम (बेहिसाब) रूप में दिए हैं। इसके बदले में भगवान हमसे कोई धन-दौलत नहीं मांगते, बल्कि वे केवल हमारा प्रेम, शुद्ध भक्ति और दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित भाव (सदका या सेवा भाव) चाहते हैं।
भजन के आगे के अंतारों में शिवजी के स्वरूप का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। उनकी जटाओं से निकलने वाली पवित्र मां गंगा का प्रवाह जीवन को पावन करता है। गले में सर्पराज और हाथ में त्रिशूल-डमरू धारण करने वाले भोलेनाथ जितने भयानक और रुद्र रूप में दिखते हैं, उतने ही वे आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) और करुणा के सागर हैं। नंदी की सवारी करने वाले महाकाल अपने भक्तों के सभी संकटों को हर लेते हैं और उन्हें भवसागर से पार लगाते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि जब महादेव हमें सब कुछ देने में संकोच नहीं करते, तो हमें भी अपने अहंकार का त्याग कर शिव भक्ति और परोपकार में तल्लीन रहना चाहिए। इसी भक्ति मार्ग से साधक शिव तांडव स्तोत्र और महामृत्युंजय मंत्र के अभ्यास से अपनी आध्यात्मिक यात्रा को और सुदृढ़ कर सकता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
भगवान शिव को समर्पित यह भजन कई दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- भक्ति रस और समर्पण: यह गीत साधक के मन में भगवान के प्रति अगाध प्रेम और कृतज्ञता का भाव जगाता है।
- शिव के स्वरूप का दर्शन: भजन में डमरू, त्रिशूल, भस्म, नंदी और गंगा जैसी शिव से जुड़ी पावन प्रतीकात्मकताओं का सजीव चित्रण किया गया है।
- मानवीय मूल्य: यह भजन हमें सिखाता है कि जब ईश्वर हमें इतना कुछ देता है, तो हमें भी समाज और जरूरतमंदों के प्रति सेवा भाव रखना चाहिए।
- सरल और संगीतमय संरचना: इसके बोल इतने सहज और कर्णप्रिय हैं कि कोई भी भक्त इसे आसानी से गुनगुना सकता है और झूम सकता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन का गायन और श्रवण किसी भी विशेष धार्मिक अवसर पर किया जा सकता है:
- प्रदोष काल और सोमवार: भगवान शिव के प्रिय वार सोमवार और प्रदोष व्रत के दिन इस भजन का संकीर्तन विशेष फलदायी होता है।
- महाशिवरात्रि और सावन मास: सावन के पवित्र महीने में और महाशिवरात्रि की रात्रि के जागरण में यह भजन भक्तों को झूमने पर मजबूर कर देता है।
- दैनिक पूजा एवं सत्संग: सुबह या संध्याकालीन पूजा के पश्चात, घर में होने वाले भजन-कीर्तन या जागरण के दौरान इसे गाया जा सकता है।
- गायन विधि: इसे हारमोनियम, ढोलक और मंजीरे की ताल के साथ उच्च स्वर में पूरे भाव के साथ गाना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में देवादिदेव महादेव, महाकाल, भोले भंडारी हैं। शिव सनातन धर्म के संहारक और कल्याणकारी देवता माने जाते हैं। वे योगियों के आदि गुरु और गृहस्थों के पालक दोनों रूपों में पूजे जाते हैं। इस भजन को उपासना मेहता, माया गोस्वामी और अन्य कलाकारों द्वारा स्वरबद्ध किया गया है, जो अपनी सुरीली आवाज़ के माध्यम से श्रोताओं को भक्ति के सागर में डुबो देते हैं। संगीतकार बिन्नी नारंग और गीतकार परंपरा से जुड़ी लोक-भावनाओं को जोड़कर इसे एक उत्कृष्ट devotional रचना बनाते हैं।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
भजन की रचना पारंपरिक लोक शैलियों और आधुनिक संगीत संयोजन का एक अद्भुत मिश्रण है। पारंपरिक शिव भजनों की तर्ज पर रचे गए इस गीत में ग्रामीण और शहरी दोनों ही परिवेश के भक्तों को जोड़ने की अद्भुत क्षमता है। बिन्नी नारंग का संगीत और शालिनी शर्मा का वीडियो निर्देशन इस भजन को दृश्य और श्रव्य दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत मनमोहक बनाता है। देव तनेजा के कुशल कंटेंट मैनेजमेंट के माध्यम से यह रचना आज घर-घर तक पहुंच रही है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और आम बोलचाल की हिंदी (खड़ी बोली मिश्रित लोक भाषा) है। इसमें शास्त्रीय संस्कृत के कठिन शब्दों के स्थान पर सीधे हृदय को छूने वाले भावपूर्ण शब्दों का प्रयोग किया गया है। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक आशु-गीत और भजन शैली का सुंदर उदाहरण है, जिसमें अनुप्रास और यमक अलंकारों की स्वाभाविक छटा देखने को मिलती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:
- अहंकार का त्याग: मनुष्य को अपनी उपलब्धियों पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि सब कुछ उसी डमरू वाले की कृपा से प्राप्त होता है।
- कृतज्ञता का भाव: जीवन में जो कुछ भी मिला है, उसके लिए ईश्वर के प्रति सदैव आभारी रहना चाहिए।
- परोपकार और उदारता: जिस प्रकार शिव सब कुछ लुटाकर भी मस्त रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।
- नियमित साधना: जीवन की विपदाओं से उबरने के लिए नियमित रूप से भगवान का स्मरण और नाम जप करना आवश्यक है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| डमरू वाला | भगवान शिव | ब्रह्मांडीय नाद (प्रणव) और सृष्टि के संचालक के रूप में शिव। |
| बेहिसाब | अमित, जिसकी कोई सीमा न हो | ईश्वर की अहैतुकी और असीम कृपा। |
| सदका | दान, परोपकार या सेवा | ईश्वर के प्रति कृतज्ञता स्वरूप दूसरों की भलाई करना। |
| आशुतोष | शीघ्र प्रसन्न होने वाले | वह देवता जो थोड़े से भाव से ही अपने भक्तों पर सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। |
| भस्म रमाने वाले | अंगों पर विभूति लगाने वाले | वैराग्य और नश्वर संसार की वास्तविकता का प्रतीक। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
भजन की मुख्य पंक्तियों का विस्तृत भावार्थ इस प्रकार है:
1. "जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है..."
यहाँ कवि मनुष्य को झकझोरते हुए कहता है कि हे मानव! तू ज़रा आँखें खोलकर देख कि उस आदिनाथ ने तुझे जीवन की अनमोल सांसें, सुंदर प्रकृति और सुख-साधन बिना किसी पाबंदी के दिए हैं।
2. "तो देने वाले को सदका तू क्यों नहीं देता है!"
जब वह दाता तुझे इतना सब कुछ दे रहा है, तो क्या तेरा यह कर्तव्य नहीं बनता कि तू भी अपने जीवन का कुछ अंश समाज की सेवा, परोपकार और ईश्वर के चरणों में समर्पित करे?
3. "जटाओं से जो गंगा बहाते हैं, भक्तों के सारे दुख मिटाते हैं..."
शिव अपनी जटाओं में मोक्षदायिनी गंगा को धारण करके संसार के संतापों को धो डालते हैं। जो भी भक्त उनकी शरण में जाता है, उसके सारे कष्ट पल भर में दूर हो जाते हैं।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
भगवान शिव की आराधना करते समय निम्नलिखित पावन मंत्र का स्मरण करना अति उत्तम माना गया है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
यह महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव का सबसे शक्तिशाली और प्राण-रक्षक मंत्र माना जाता है, जिसके नियमित जप से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और आरोग्य की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही भगवान शिव के अन्य पावन स्तोत्रों जैसे रुद्राष्टकम स्तोत्र का पाठ भी साधकों के लिए अत्यधिक फलदायी है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विशिष्टता | विवरण |
|---|---|
| भजन का नाम | जब डमरू वाला तुझको बेहिसब देता है (Jab Damru Wala Tujhko Behisab Deta Hai) |
| समर्पित देवता | भगवान शिव / भोले बाबा / महाकाल |
| गायिका | उपासना मेहता, माया गोस्वामी एवं अन्य |
| संगीतकार | बिन्नी नारंग |
| गीतकार | पारंपरिक (Traditional) एवं अन्य |
| भाषा | हिंदी / लोक भाषा |
| मुख्य भाव | भक्ति, समर्पण, कृतज्ञता और वैराग्य |
| उपयुक्त अवसर | सोमवार व्रत, प्रदोष, महाशिवरात्रि एवं सत्संग |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तलुक (Bhaktilok) पर प्रस्तुत यह सामग्री शिव भक्तों की धार्मिक भावनाओं और पारंपरिक लोक संगीत के सम्मान में तैयार की गई है। इस लेख में भजन के मूल शब्दों, उनके भावार्थ और आध्यात्मिक महत्व का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से श्री हनुमान चालीसा और अन्य पवित्र ग्रंथों के अध्ययन के अनुरूप मार्गदर्शित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के तहत इसे उच्च गुणवत्ता मानकों के साथ प्रकाशित किया गया है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- शिव पुराण एवं पौराणिक कथा ग्रंथ
- पारंपरिक भारतीय लोक संगीत एवं भजन संग्रह
- वैदिक एवं आध्यात्मिक प्रवचन परंपरा
- भक्तलुक आर्काइव एवं संगीत प्रकाशन विवरण
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