तुम हो जगत के स्वामी ओ मेरे जगन्नाथ - परिचय एवं भक्ति भाव
"तुम हो जगत के स्वामी ओ मेरे जगन्नाथ (Tum ho jagat ke swami o mere jagannaath lyrics in hindi)" अत्यंत पावन, भावपूर्ण और हृदय को द्रवित कर देने वाला एक लोकप्रिय भजन है। यह भजन सनातन धर्म के सर्वोच्च आराध्य, नीलांचल धाम पुरी के अधिपति, चतुर्धा मूर्ति भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा के चरणों में समर्पित है। इस भजन का मुख्य भाव शरणागति, दीनता और अपने आराध्य के प्रति अगाध प्रेम है। कलियुग में जब जीवात्मा सांसारिक दुखों, संघर्षों और चिंताओं से घिर जाती है, तब भगवान जगन्नाथ का यह संकीर्तन उसे परम शांति और संबल प्रदान करता है। भजन में भक्त की यह पुकार कि 'तुम हो जगत के स्वामी, फिर बच्चे क्यों अनाथ', भगवान और भक्त के वात्सल्यपूर्ण एवं अनन्य संबंध को अत्यंत सुंदर ढंग से उजागर करती है। इस दिव्य रचना का गायन पुरी की यात्रा के दौरान, रथ यात्रा उत्सव के पावन अवसरों, दैनिक संध्या वंदन, सत्संग और विशेष धार्मिक आयोजनों में अत्यंत श्रद्धा के साथ किया जाता है। इसके स्मरण मात्र से ही पुरी धाम के दर्शन की अनुभूति होने लगती है और मन भक्ति रस से सराबोर हो जाता है.
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ तुम हो जगत के स्वामी ओ मेरे जगन्नाथ ॥
तुम हो जगत के स्वामी ओ मेरे जगन्नाथ,
हम आए गए पूरी में ओ मेरे दीनानाथ।
समय का मैं हूं मारा तो तेरे दर पे आया,
आकर के प्रभु जी तेरा दरवाजा खटकाया।
तुम हो जब साथ मेरे फिर बच्चे क्यों अनाथ,
हम आए गए पूरी में ओ मेरे दीनानाथ॥
क्या मैं बताऊं बाबा कौन सी घड़ी है,
बच्चो पर तेरे बाबा मुश्किल बड़ी है।
सोचू मैं हर बारी तुम हो मेरे साथ,
हम आए गए पूरी में ओ मेरे दीनानाथ॥
लकी को प्रभु मेरे पूरी में रख लो,
विनती यही है प्रभु चरणों में रख लो।
रख दो मेरे सीर पर अपने ये दोनों हाथ,
हम आए गए पूरी में ओ मेरे दीनानाथ॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन एक साधारण भक्त की अपने इष्ट भगवान जगन्नाथ के प्रति अनन्य पुकार का सजीव चित्रण है। भक्त कहता है—हे प्रभु! आप संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं और मैं आपके ही शरण में आया हूँ। जीवन की विषम परिस्थितियों, समय की मार और कठिनाइयों से हारकर जब मनुष्य चारों तरफ से निराश हो जाता है, तब वह केवल अपने दीनानाथ (भगवान जगन्नाथ) के द्वार पर ही पहुंचता है।
भजन की पंक्तियों में भक्त अत्यंत भावुक होकर कहता है कि जब आप जैसे सर्वशक्तिमान और दयालु पिता मेरे साथ हैं, तो आपका कोई भी बच्चा अनाथ या असहाय कैसे हो सकता है? जीवन में जब भी कोई विकट घड़ी या बड़ी मुश्किल आती है, तो भक्त का यह विश्वास उसे अडिग रखता है कि उसके सिर पर भगवान का वरद हस्त है। अंत में भक्त भगवान से यही प्रार्थना करता है कि हे जगन्नाथ! मुझे अपने श्री चरणों की छाया में हमेशा के लिए स्थान दे दीजिए और अपना कृपा रूपी दोनों हाथ मेरे मस्तक पर रख लीजिए, जिससे मेरा यह जीवन और परलोक दोनों संवर जाएं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। भगवान जगन्नाथ को जगत का स्वामी कहा गया है जो बिना भेदभाव के सभी जीवों की सुधि लेते हैं।
- शरणागति का प्रतीक: यह भजन शरणागति (Surrender) के मार्ग को प्रशस्त करता है जहाँ भक्त अपनी सभी चिंताओं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है।
- पुरी धाम की महिमा: इस भजन के माध्यम से नीलांचल पुरी धाम की यात्रा और वहाँ के दर्शन की महत्ता को रेखांकित किया गया है।
- कलयुग में संकीर्तन: नाम स्मरण और संकीर्तन को कलयुग में भवसागर पार करने का सबसे सरल माध्यम माना गया है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को किसी भी समय पूरी तन्मयता के साथ गाया या सुना जा सकता है। विशेष रूप से निम्नलिखित अवसरों पर इसका विशेष महत्व है:
- नित्य पूजा एवं संध्या वंदन: सुबह या शाम के समय दीप प्रज्वलित करने के पश्चात इसे गाने से घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक बनता है।
- रथ यात्रा के पावन अवसर पर: आषाढ़ मास में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के दौरान इस भजन का गान भक्तों को झूमने पर विवश कर देता है।
- सत्संग और जागरण: धार्मिक आयोजनों, संकीर्तन सभाओं और धार्मिक यात्राओं के दौरान समूह में इस भजन का गायन बहुत आनंददायक होता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में भगवान जगन्नाथ (जो कि भगवान श्रीकृष्ण का ही स्वरूप हैं) विराजमान हैं। पुरी के श्री मंदिर में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। पुरी धाम चार धामों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैष्णव तीर्थ स्थल है। इस भजन की रचना लोक परंपरा और संतों के श्रीमुख से निकली उस भक्ति धारा से प्रेरित है जो सीधे भक्त के हृदय को स्पर्श करती है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन पारंपरिक लोक शैली और आधुनिक भक्ति संगीत का एक सुंदर संगम है। इसे उन भक्तों द्वारा गाया और संकलित किया गया है जो पुरी धाम की यात्रा करते हैं या भगवान जगन्नाथ के अनन्य उपासक हैं। भजन में प्रयुक्त भाषा बेहद सरल, सहज और आम जनमानस के हृदय तक सीधी उतरने वाली है, जिससे हर उम्र के लोग इसे आसानी से गा सकते हैं।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
भजन की भाषा सरल हिंदी और खड़ी बोली का वह रूप है जिसमें ब्रज और अवधी का हल्का सा प्रभाव भी देखने को मिलता है। इसमें उपमा और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। 'समय का मारा', 'दरवाजा खटकाना' जैसे मुहावरेदार प्रयोग इसे और अधिक जीवंत बनाते हैं। काव्य शैली गेय (Singable) है जिसे ढोलक, मंजीरे और harmonium के साथ आसानी से गाया जा सकता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:
- अटूट विश्वास: कितनी भी बड़ी कठिनाई क्यों न हो, ईश्वर पर भरोसा कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
- दीनता और विनम्रता: भगवान के दरबार में अहंकार का कोई स्थान नहीं है; वहाँ केवल दीनता और सच्ची पुकार ही सुनी जाती है।
- पितृवत प्रेम: भगवान केवल स्वामी ही नहीं, बल्कि एक रक्षक और माता-पिता की तरह अपने भक्तों की देखभाल करते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ / भाव |
|---|---|---|
| जगन्नाथ | जगत के नाथ या स्वामी | भगवान श्रीकृष्ण का पुरी धाम में स्थित स्वरूप |
| दीनानाथ | दीनों और गरीबों के नाथ | जो आश्रितों और असहायों की रक्षा करते हैं |
| समय का मारा | परिस्थितियों से सताया हुआ | जीवन के दुखों और संघर्षों से पीड़ित व्यक्ति |
| अनाथ | जिसका कोई नाथ न हो | असुरक्षित या असहाय महसूस करने वाला भक्त |
| विनती | प्रार्थना या निवेदन | भगवान के चरणों में समर्पण भाव |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
1. "तुम हो जगत के स्वामी ओ मेरे जगन्नाथ, हम आए गए पूरी में ओ मेरे दीनानाथ।"
अर्थात हे प्रभु! आप इस संपूर्ण सृष्टि के संचालनकर्ता हैं और मैं पुरी धाम में आपकी शरण में आ गया हूँ। मेरे सभी दुखों को दूर करने वाले दीनानाथ अब आप ही मेरा एकमात्र सहारा हैं।
2. "समय का मैं हूं मारा तो तेरे दर पे आया, आकर के प्रभु जी तेरा दरवाजा खटकाया।"
अर्थात जब भाग्य और समय मेरे प्रतिकूल थे, तब मैं सब कुछ छोड़कर आपके द्वार पर आया और भक्त की तरह आपका दरवाजा खटखटाया है। मुझे पूरा विश्वास है कि आप मेरे पुकार सुनेंगे।
3. "तुम हो जब साथ मेरे फिर बच्चे क्यों अनाथ, हम आए गए पूरी में ओ मेरे दीनानाथ।"
अर्थात जब ब्रह्मांड के पालनहार मेरे साथ हैं, तो मैं स्वयं को अनाथ कैसे मान लूं? आपके होते हुए मुझे किसी प्रकार का भय नहीं है।
4. "लकी को प्रभु मेरे पूरी में रख लो, विनती यही है प्रभु चरणों में रख लो।"
अर्थात भक्त (या भजन में प्रयुक्त नाम) निवेदन करता है कि हे प्रभु! मुझे अपने इस पावन पुरी धाम में ही स्थान दें और अपने दोनों हाथ मेरे सिर पर रखकर मुझे हमेशा के लिए अपना बना लें।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
भगवान जगन्नाथ के स्मरण के समय निम्नलिखित पावन मंत्र का जाप अत्यंत फलदायी माना गया है:
नीलाचल निवासाय नित्याय परमात्मने। बलभद्र सुभद्राभ्यां जगन्नाथाय ते नमः॥
अर्थात नीलांचल पुरी में निवास करने वाले, नित्य, परमात्मा स्वरूप, बलभद्र और सुभद्रा सहित भगवान जगन्नाथ को हमारा बारंबार नमस्कार है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | तुम हो जगत के स्वामी ओ मेरे जगन्नाथ (Tum ho jagat ke swami o mere jagannaath) |
|---|---|
| आराध्य देव | भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, माता सुभद्रा |
| भाषा | सरल हिंदी / लोक भाषा |
| मुख्य थीम | शरणागति, भक्ति, भगवान और भक्त का संबंध |
| प्रमुख भाव | विनय, प्रेम, समर्पण और विश्वास |
| उपयुक्त अवसर | रथ यात्रा, दैनिक पूजा, सत्संग, पुरी तीर्थ यात्रा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह सामग्री सनातन संस्कृति, धार्मिक साहित्य, लोक भजनों और पारंपरिक स्रोतों का अध्ययन करके तैयार की गई है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध और भावपूर्ण सामग्री प्रदान करना है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे पूरी प्रमाणिकि और भक्ति भाव के साथ संकलित किया गया है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्री जगन्नाथ मंदिर पुरी की परंपराएं एवं लोक गाथाएं
- पारंपरिक वैष्णव संकीर्तन एवं भजन संग्रह
- सनातन धर्म के ग्रंथ एवं स्तोत्र रत्नाकर
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