Parvati Stotram

यदि नाथ का नाम दयानिधि है लिरिक्स (Yadi Nath Ka Naam Dayanidhi Hai Lyrics in Hindi ) - Vishnu Bhajan Pujya Shri Devendra Ji - Bhaktilok

94 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"यदि नाथ का नाम दयानिधि है" एक अत्यंत मर्मस्पर्शी, विनय भाव और करुणा रस से ओतप्रोत प्रसिद्ध विष्णु भजन है। इस भजन को पूज्य श्री देवेंद्र जी महाराज (श्री धाम अयोध्या जी) ने अपने सुमधुर और भावपूर्ण कंठ से गाकर देश-विदेश के श्रद्धालुओं के हृदय में एक अमिट छाप छोड़ी है। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के अनन्य संबंध, अटूट विश्वास और शरणागति की पराकाष्ठा को दर्शाता है। इसमें भक्त भगवान विष्णु (या प्रभु श्रीराम) के 'दयानिधि' (दया के सागर) और 'करुणानिधि' नाम की दुहाई देते हुए पूर्ण अधिकार के साथ प्रार्थना करता है कि यदि आपका नाम सचमुच दयानिधि है, तो आप कभी न कभी मेरी पुकार अवश्य सुनेंगे और मेरे दुखों का निवारण करेंगे। यह भजन गोस्वामी तुलसीदास जी की 'विनय पत्रिका' की परंपरा के पदों के समान है, जहाँ भक्त भगवान से प्रेमपूर्वक तर्क भी करता है और पूर्ण समर्पण भी दिखाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

यदि नाथ का नाम दयानिधि है,
तो दया भी करेंगे कभी ना कभी।
दुःख हारी हर दुखियाँ जन के,
दुःख क्लेश हरेंगे कभी ना कभी॥

जिस अंग की शोभा सुहावनी है,
जिस सामली रंग में मोहनी है।
उस रूप सुधा के सनेहियों के,
दृग प्याले भरेंगे कभी न कभी॥
यदि नाथ का नाम दयानिधि है...

करुणानिधि नाम सुनाया जिन्हें,
चरणामृत पान करवाया जिन्हें।
सरकार अदालत में गवाह,
सभी गुजरेंगे कभी न कभी॥
यदि नाथ का नाम दयानिधि है...

हम द्वार पे आपके आके पड़े,
मुद्दत से इसी जिद पर हैं अड़े।
भव सिंधु तरे जो बड़े तो बड़े,
बिंदु तरेंगे कभी न कभी॥
यदि नाथ का नाम दयानिधि है,
तो दया भी करेंगे कभी ना कभी॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन वैष्णव भक्ति परंपरा के 'विनय' और 'आत्म-निवेदन' भाव का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस भजन के माध्यम से भक्त अपने आराध्य के प्रति अटूट विश्वास प्रकट करता है। भक्त का मानना है कि यदि ईश्वर का एक नाम 'दयानिधि' (दया का खजाना) है, तो यह असंभव है कि वे अपने भक्त पर दया न करें। भले ही इसमें समय लगे, लेकिन प्रभु की कृपा एक न एक दिन अवश्य बरसेगी।

भजन के प्रथम अंतरे में भगवान के मनमोहक श्यामल रूप का वर्णन है। भक्त कहता है कि प्रभु का जो श्यामल और अत्यंत सुंदर रूप है, वह भक्तों के मन को मोहने वाला है। जो लोग उस रूप-सुधा (सौंदर्य रूपी अमृत) के प्रेमी हैं, उनके नेत्र रूपी प्याले कभी न कभी प्रभु के दर्शन पाकर अवश्य तृप्त होंगे।

दूसरे अंतरे में भक्त एक सुंदर रूपक का प्रयोग करता है। वह कहता है कि जिन संतों और शास्त्रों ने हमें भगवान का नाम 'करुणानिधि' बताया है और जिन्होंने हमें उनके चरणामृत का पान कराया है, वे सभी गवाह के रूप में खड़े हैं। जब प्रभु की अदालत (न्याय) लगेगी, तो ये सभी गवाह गवाही देंगे कि प्रभु सचमुच कृपालु हैं, इसलिए प्रभु को अपने नाम की लाज रखनी ही होगी।

अंतिम अंतरे में भक्त की हठ और अनन्य शरणागति दिखाई देती है। भक्त कहता है कि हम बहुत समय से आपके द्वार पर आकर अड़े हुए हैं। यदि इस संसार रूपी महासागर (भवसागर) को बड़े-बड़े ज्ञानी और संत पार कर गए हैं, तो हम जैसे छोटे 'बिंदु' (तुच्छ जीव) भी आपकी कृपा से कभी न कभी इस संसार सागर को अवश्य पार कर लेंगे।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • अनन्य भक्ति और हठ: इस भजन में भक्त का भगवान के प्रति एक मीठा हठ (जिद्द) प्रदर्शित होता है, जो केवल एक सच्चे और आत्मीय भक्त में ही हो सकता है।
  • करुणा रस की प्रधानता: भजन की प्रत्येक पंक्ति में करुणा और शांत रस का सुंदर समन्वय है, जो मन को असीम शांति प्रदान करता है।
  • अयोध्या की गायन शैली: पूज्य श्री देवेंद्र जी महाराज द्वारा गाए जाने के कारण इसमें अयोध्या की पारंपरिक संकीर्तन शैली और शास्त्रीय पुट का सुंदर मिश्रण मिलता है।
  • सकारात्मक दृष्टिकोण: यह भजन निराशा के क्षणों में आशा का संचार करता है। "कभी न कभी" शब्द बार-बार दोहराकर भक्त को धैर्य और प्रतीक्षा का महत्व सिखाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन और श्रवण मुख्य रूप से शांत बेला में किया जाना चाहिए।

  • सर्वोत्तम समय: संध्या काल की आरती के बाद या सुबह के समय आत्म-चिंतन और ध्यान के दौरान इस भजन को सुनना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • गायन विधि: इसे गाते समय मन में पूर्ण समर्पण और शांत भाव होना चाहिए। यदि संभव हो, तो हाथ में करताल या झांझ लेकर प्रभु की मूर्ति के सम्मुख बैठकर इसका संकीर्तन करें।
  • विशेष अवसर: एकादशी, रामनवमी, जन्माष्टमी और सामूहिक सत्संग के अवसरों पर इस भजन का सामूहिक संकीर्तन भक्तों को भाव-विभोर कर देता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान विष्णु और उनके अवतार भगवान श्री रामचंद्र जी को समर्पित है। भजन में प्रयुक्त शब्द जैसे 'नाथ', 'दयानिधि', 'करुणानिधि' और 'सरकार' सीधे तौर पर प्रभु श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम और कृपालु रूप को इंगित करते हैं। अयोध्या के प्रसिद्ध संत और कथावाचक पूज्य श्री देवेंद्र जी महाराज ने इस भजन को अपनी मधुर आवाज देकर जन-जन तक पहुँचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन के रचयिता सुप्रसिद्ध कवि योगेश दास शास्त्री हैं। उन्होंने इस भजन में पारंपरिक ब्रज और खड़ी बोली के शब्दों का प्रयोग करते हुए एक अत्यंत सरल लेकिन दार्शनिक रचना तैयार की है। संगीतकार कैलाश कुमार ने इसे शास्त्रीय और सुगम संगीत के बीच एक सुंदर लय प्रदान की है। यह भजन 'देवेंद्र पाठक' लेबल के अंतर्गत जारी किया गया था और बहुत ही कम समय में यह विष्णु भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हो गया।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली) है, जिसमें उर्दू और ब्रजभाषा के शब्दों का बहुत ही सुंदर और स्वाभाविक मिश्रण है। जैसे 'मुद्दत', 'अदालत', 'गवाह', 'सरकार' जैसे शब्दों का प्रयोग करके भक्त ने भगवान के दरबार को एक सर्वोच्च न्यायालय के रूप में चित्रित किया है, जहाँ भक्त अपनी अर्जी लेकर आया है। काव्य शैली में 'रूपक अलंकार' और 'अनुप्रास अलंकार' का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश देता है:

  1. धैर्य और विश्वास (प्रतीक्षा): ईश्वर की कृपा तुरंत न मिले, तो भी निराश नहीं होना चाहिए। "कभी न कभी" का भाव हमें जीवन में धैर्य रखना सिखाता है।
  2. पूर्ण शरणागति: जब हम स्वयं को पूरी तरह से ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तो हमारे कल्याण का दायित्व स्वयं ईश्वर का हो जाता है।
  3. अहंकार का त्याग: स्वयं को 'बिंदु' (छोटा) मानना और ईश्वर को 'सिंधु' (विशाल) मानना ही सच्ची विनम्रता है, जो भक्ति का मूल आधार है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
दयानिधि दया का खजाना / सागर भगवान विष्णु का एक नाम जो उनकी असीम कृपा को दर्शाता है।
दुःख क्लेश कष्ट और मानसिक संताप संसार के भौतिक और आध्यात्मिक कष्ट।
रूप सुधा सौंदर्य रूपी अमृत भगवान के दिव्य और मनमोहक श्यामल रूप का दर्शन।
दृग प्याले नेत्र रूपी प्याले दर्शन पाने के लिए लालायित भक्त की आँखें।
भव सिंधु संसार रूपी सागर जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे पार पाना है।
बिंदु पानी की एक छोटी बूंद भक्त स्वयं को ईश्वर के सामने अत्यंत तुच्छ और छोटा मानता है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"यदि नाथ का नाम दयानिधि है, तो दया भी करेंगे कभी ना कभी।"
यदि मेरे स्वामी का नाम दया का सागर है, तो वे मुझ पर अपनी कृपा अवश्य करेंगे। यह असंभव है कि दया का सागर होने के बाद भी वे निर्दयी बने रहें।

"दुःख हारी हर दुखियाँ जन के, दुःख क्लेश हरेंगे कभी ना कभी॥"
वे सभी दुखी लोगों के दुखों को दूर करने वाले हैं। इसलिए, वे मेरे भी सारे कष्ट और क्लेश कभी न कभी अवश्य दूर करेंगे।

"जिस अंग की शोभा सुहावनी है, जिस सामली रंग में मोहनी है।"
प्रभु के प्रत्येक अंग की सुंदरता अत्यंत मनमोहक है और उनके श्यामल रंग में एक अद्भुत आकर्षण (मोहनी) है।

"उस रूप सुधा के सनेहियों के, दृग प्याले भरेंगे कभी न कभी॥"
जो भक्त उनके इस सुंदर रूप के प्रेमी हैं, उनके नेत्र रूपी प्याले प्रभु के दिव्य दर्शन पाकर कभी न कभी अवश्य तृप्त होंगे।

"करुणानिधि नाम सुनाया जिन्हें, चरणामृत पान करवाया जिन्हें।"
जिन संतों और गुरुओं ने हमें भगवान का नाम 'करुणानिधि' बताया है और जिन्होंने हमें उनके चरणों का अमृत पिलाया है...

"सरकार अदालत में गवाह, सभी गुजरेंगे कभी न कभी॥"
वे सभी संत-महात्मा भगवान के दरबार में गवाह के रूप में प्रस्तुत होंगे और प्रभु को अपने भक्तों पर दया करनी ही पड़ेगी।

"हम द्वार पे आपके आके पड़े, मुद्दत से इसी जिद पर हैं अड़े।"
हम बहुत लंबे समय से आपके द्वार पर आकर बैठ गए हैं और इसी जिद पर अड़े हैं कि जब तक आप कृपा नहीं करेंगे, हम यहाँ से नहीं जाएंगे।

"भव सिंधु तरे जो बड़े तो बड़े, बिंदु तरेंगे कभी न कभी॥"
यदि इस संसार रूपी विशाल सागर को बड़े-बड़े ज्ञानी और महात्मा पार कर गए हैं, तो हम जैसे छोटे बिंदु (साधारण जीव) भी आपकी कृपा से कभी न कभी इसे अवश्य पार कर लेंगे।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भावों को पुष्ट करने वाला श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ भगवान अर्जुन को अपनी शरण में आने का संदेश देते हैं:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥

(श्रीमद्भगवद्गीता - 18.66)

अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम यदि नाथ का नाम दयानिधि है (Yadi Nath Ka Naam Dayanidhi Hai)
मुख्य आराध्य भगवान विष्णु / भगवान श्री राम
गायक (Singer) पूज्य श्री देवेंद्र जी महाराज (श्री धाम अयोध्या जी)
गीतकार (Lyricist) कवि योगेश दास शास्त्री
संगीतकार (Music) कैलाश कुमार
मुख्य भाव (Bhava) विनय, करुणा, शरणागति, अटूट विश्वास
उपयुक्त अवसर दैनिक संध्या प्रार्थना, एकादशी, सत्संग, रामनवमी

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन के मुख्य गायक अयोध्या के सुप्रसिद्ध संत और कथावाचक पूज्य श्री देवेंद्र जी महाराज हैं।

इस भजन के सुंदर और भावपूर्ण शब्दों की रचना कवि योगेश दास शास्त्री जी ने की है।

यह भजन मुख्य रूप से भगवान विष्णु और उनके अवतार भगवान श्री रामचंद्र जी को समर्पित है।

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर अत्यंत दयालु हैं। यदि हम पूर्ण विश्वास और धैर्य के साथ उनके द्वार पर अड़े रहें, तो वे हमारी पुकार कभी न कभी अवश्य सुनेंगे।

इसका अर्थ है कि जिन संतों और शास्त्रों ने हमें भगवान की करुणा के बारे में बताया है, वे सभी भगवान के दरबार में इस बात के गवाह हैं कि प्रभु दयालु हैं, इसलिए प्रभु को अपने भक्तों पर दया करनी ही होगी।

'भव सिंधु' का अर्थ संसार रूपी विशाल महासागर है और 'बिंदु' का अर्थ भक्त स्वयं को मानता है, जो अत्यंत छोटा और तुच्छ है लेकिन प्रभु की कृपा से पार होना चाहता है।

इसे बहुत ही सुगम, शांत और करुण रस से युक्त सुमधुर संगीत शैली में पिरोया गया है, जो मन को तुरंत एकाग्र कर देता है।

हाँ, दैनिक संध्या आरती के बाद या सुबह के ध्यान के समय इस भजन का गायन या श्रवण मानसिक शांति के लिए अत्यंत उत्तम है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के बोल और उनके भावार्थ को वैष्णव भक्ति परंपरा, संतों के प्रवचनों और प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर संकलित और विश्लेषित किया गया है ताकि पाठकों को शुद्ध और सटीक जानकारी प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता एवं विनय पत्रिका के भक्ति सिद्धांत।
  • पूज्य श्री देवेंद्र जी महाराज (श्री धाम अयोध्या जी) के आधिकारिक संकीर्तन संग्रह।
  • पारंपरिक वैष्णव भजन संग्रह एवं संतों की वाणी।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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