Shri Shani Dev Arati

ॐ श्री गणेशाय नमः लिरिक्स (shree ganeshay namah Lyrics in Hindi) - SRIPARNA CHATTERJEE IVY ROY New Ganesh Mantra - Bhaktilok

1,583 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

प्रस्तावना एवं परिचय

सम्पूर्ण मूल पाठ एवं पवित्र श्लोक

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

ॐ श्री गणेशाय नमः वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः तू ही सुख करता तू ही है दुःख हरता आशीष दे हमको ए जगत के दाता ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः सुर को सजाये हम मान रखे सुर का ताल को ना भंग करे ये गुण दे दो देवा ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गणेशाय नमः
साझा करें:

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन श्री गणेश को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन आह्वान है जो संपूर्ण वैदिक परंपरा में पूजनीय है। 'वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ' - यह पंक्ति गणेश जी की वक्र सूंड और विशाल शरीर का वर्णन करती है जो लाखों सूर्यों के समान प्रज्ज्वलित और तेजस्वी है। 'निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा' - यह मूल संस्कृत मंत्र भक्त से प्रार्थना करता है कि हे देव, सभी कार्यों में हमारे लिए बाधाओं को दूर करो। भजन का दूसरा भाग 'तू ही सुख करता, तू ही है दुःख हरता' गणेश जी की दोहरी भूमिका को प्रकट करता है - वे सुख प्रदान करने वाले और कष्ट निवारक दोनों हैं। 'ए जगत के दाता' - यह पंक्ति गणेश को संपूर्ण जगत के स्वामी और दानदाता के रूप में स्वीकार करती है। अंतिम भाग में 'सुर को सजाये हम, मान रखे सुर का, ताल को ना भंग करे' - यह भक्त की आंतरिक प्रार्थना है कि हे देव, हमें संगीत, लय और सामंजस्य की शक्ति प्रदान करो।

इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और सर्वव्यापी है। गणेश को सभी देवताओं से पहले पूजा जाता है क्योंकि वे विघ्न-हर्ता हैं। भजन का हृदय मंत्र 'निर्विघ्नं कुरु मे देव' हमारे जीवन की प्रत्येक चुनौती में गणेश की कृपा माँगता है। जब भक्त कहता है 'तू ही सुख करता, तू ही है दुःख हरता', वह यह स्वीकार करता है कि सभी अनुभव - चाहे आनंद हो या पीड़ा - गणेश की दिव्य लीला का ही भाग हैं। यह भजन आत्म-समर्पण का भाव रखता है जहाँ भक्त सर्वकर्ता को समर्पित होता है। 'सुर को सजाये हम' - यह पंक्ति इंद्रियों को शुद्ध और सुव्यवस्थित रखने की प्रार्थना है ताकि हमारा जीवन एक सुंदर सुर और संगीत की तरह बहे। 'ताल को ना भंग करे' - यह जीवन की गति और प्रवाह को बनाए रखने की प्रार्थना है। संपूर्ण भजन भक्ति और समर्पण का एक अद्भुत संयोजन है।

इस भजन का दार्शनिक और आध्यात्मिक स्वरूप अत्यंत विशेष है। वेदांत दर्शन में गणेश को प्रमुख देवता के रूप में माना जाता है। वे ब्रह्मांड के नियामक, बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं। इस भजन में गणेश को 'सूर्यकोटि समप्रभ' कहा गया है - अर्थात उनकी चेतना असंख्य सूर्यों के समान प्रज्ज्वलित है। भक्ति मार्ग के अनुसार, गणेश की पूजा केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं है, बल्कि आंतरिक बाधाओं को दूर करने की एक प्रक्रिया है। भजन में 'निर्विघ्न' शब्द का प्रयोग आंतरिक और बाहरी दोनों विघ्नों से मुक्ति का प्रतीक है। आध्यात्मिक पथ पर चलते समय मन की शुद्धि, बुद्धि की स्पष्टता और कर्मों में सामंजस्य आवश्यक है। यह भजन इसी लक्ष्य को पाने का एक सुंदर माध्यम है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

गणेश भारतीय धर्म और संस्कृति में सर्वाधिक पूजनीय देवता हैं। गणेश पुराण, मुद्गल पुराण, और ब्रह्मांड पुराण में गणेश की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। महाभारत और रामायण दोनों में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश की पूजा से होती है। 'वक्रतुण्ड महाकाय' नामक मंत्र गणेश से संबंधित सबसे प्राचीन और पवित्र मंत्रों में से एक है। शास्त्रों में कहा गया है कि गणेश सभी विघ्नों को दूर करते हैं, ज्ञान प्रदान करते हैं, और सिद्धि देते हैं। इसीलिए हर पूजन की शुरुआत में गणेश गणपति की वंदना की जाती है। भजन का संस्कृत भाग 'निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा' अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध है जो हजारों वर्षों से भारतीय भक्तों के हृदय में स्थान रखता है।

प्रथम पूज्य श्री गणेश जी के जन्म और उनकी कथाओं का संपूर्ण विवरण जानने के लिए ब्रह्म पुराण गणेश महिमा का पाठ करें। इस भजन का नियमित चिंतन और गायन अनेक मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है। मानसिक स्तर पर, यह चिंता और भय को दूर करता है और मन को शांत और केंद्रित करता है। शारीरिक स्तर पर, इसका नियमित उच्चारण श्वसन तंत्र को मजबूत करता है और तनाव को कम करता है। आध्यात्मिक स्तर पर, यह सभी बाधाओं को दूर करने और आत्मविकास के पथ को सुगम करने में सहायक है। गणेश का ध्यान और भजन साधक को बुद्धिमान, सफल और निर्विघ्न जीवन की ओर ले जाता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल है, विशेषकर गणेश चतुर्थी को या शुक्रवार को। साधना के लिए एक शुद्ध और शांत स्थान का चयन करें। पूर्व की ओर मुख करके बैठें। दीपक जलाएं और गणेश को फूल, मोदक, और दूर्वा घास अर्पित करें। भजन को तीन बार, पांच बार, या इक्कीस बार गाएं। सर्वप्रथम 'ॐ' का उच्चारण करें, फिर भजन को मंत्र के रूप में गाएं। मन को पूरी तरह गणेश पर केंद्रित रखें। विकारों से मुक्त होकर, विनम्रता और श्रद्धा के साथ भजन करें। भजन के समय आसन में सीधे, शांत और दृढ़ रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'वक्रतुण्ड' शब्द का गणेश के साथ क्या संबंध है?

'वक्रतुण्ड' गणेश की वक्र सूंड का प्रतीक है जो उनकी सबसे पहचानी जाने वाली विशेषता है। यह सूंड बुद्धि, ज्ञान और सृजनशीलता का प्रतीक है। वक्रता कठोरता से दूर, लचीलापन और समायोजन क्षमता दर्शाती है जो जीवन में सफलता के लिए आवश्यक है।

क्या इस भजन को महिलाएं और बच्चे भी चा सकते हैं?

बिल्कुल। यह भजन सार्वभौमिक है और किसी भी आयु, लिंग या सामाजिक स्थिति के व्यक्ति द्वारा चाया जा सकता है। बच्चों के लिए यह विशेषकर लाभकारी है क्योंकि यह उनकी मानसिक शक्ति, एकाग्रता और बुद्धि को विकसित करता है।

क्या 'निर्विघ्नं कुरु मे देव' केवल बाहरी बाधाओं से संबंधित है?

नहीं। यह मंत्र बाहरी और आंतरिक दोनों विघ्नों को दूर करने के लिए है। आंतरिक विघ्न मन की नकारात्मकता, संदेह, भय और अहंकार हैं। गणेश की कृपा से ये सभी बाधाएं दूर होती हैं।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!