Kabir Das Ke Dohe

कहैं कबीर देय तू जब लग तेरी देह दोहे का अर्थ(Kahai Kabir Dey Tu Jab lag Teri Deh Dohe Ka Arth in Hindi)

103 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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कहैं कबीर देय तू जब लग तेरी देह दोहे का परिचय एवं लीड ओवरव्यू

संत कबीर दास जी की वाणी केवल शब्द नहीं, अपितु जीवमात्र के कल्याण का दिव्य प्रकाश स्तंभ है। उनकी साखियां और दोहे मानवीय जीवन के उन परम सत्यों को उजागर करते हैं, जिन्हें समझकर मनुष्य भवसागर से सहज ही पार हो सकता है। प्रस्तुत दोहा "कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह" जीवन की नश्वरता, दानशीलता, परोपकार और भगवद्भाव का एक अत्यंत गहन संदेश देता है। संत कबीर अपनी ओजस्वी और सदुकड़ी भाषा में हमें यह चेताते हैं कि जब तक यह भौतिक शरीर हमारे पास है, तब तक सत्कर्म, दान और परोपकार कर लेना चाहिए, क्योंकि इस देह का अंत निश्चित है। भक्तिलोक के इस विस्तृत और प्रामाणिक लेख में हम इसी महान दोहे के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि, आध्यात्मिक भावार्थ और दैनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

मूल दोहा / साखी | Original Text

कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह।
मरती बारे न देहिंगे, छन छन घटै सनेह॥

उच्चारण, पाठ एवं संरचना | Pronunciation & Structure

कबीर साहेब के दोहे मुख्य रूप से संत-भाषा या सधुक्कड़ी भाषा में रचे गए हैं, जिसमें राजस्थानी, हरियाणवी, अवधी, ब्रज और पूर्वी हिंदी के शब्दों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। इस दोहे का पाठ करते समय लय, ताल और अंतर्मन की गहराई का विशेष ध्यान रखा जाता है। 'देय तू' (दान करो या समर्पित करो) और 'देह' (शरीर) के बीच का यमक और अनुप्रास अलंकार इस दोहे की सुंदरता को और अधिक बढ़ा देता है। इसका पाठ करने से साधक के मन में अहंकार का शमन होता है और सेवा भाव का उदय होता है।

कठिन शब्दार्थ | Word Meanings

शब्द सरल हिंदी अर्थ संदर्भगत अर्थ
कहैं कबीर संत कबीर कहते हैं उपदेशक के रूप में संत का अंतिम संदेश
देय तू दान करो / दो परोपकार, सेवा और दानशीलता अपनाने का आह्वान
जब लग जब तक जीवन काल या प्राण रहने तक का समय
तेरी देह यह शरीर तुम्हारा है नश्वर भौतिक शरीर
मरती बारे मृत्यु के समय प्राण निकलते समय या अंतिम समय में
न देहिंगे नहीं देंगे दूसरों की सहायता या दान करने में असमर्थता
छन छन क्षण-क्षण / पल-पल आयु का निरंतर कम होना
घटै सनेह प्रेम या शक्ति का घटना शरीर की ऊर्जा और मोह का क्षीण होना

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति 1: कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह।
संत कबीर दास जी उपदेश देते हुए कहते हैं कि हे मानव! जब तक तुम्हारे पास यह शरीर (देह) सुरक्षित है, श्वासें चल रही हैं और शरीर में सामर्थ्य है, तब तक परोपकार करो, दान दो और दीन-दुखियों की सेवा करो। जीवन का वास्तविक सदुपयोग इसी में है कि अपने पास मौजूद धन, ज्ञान और ऊर्जा का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए किया जाए।

पंक्ति 2: मरती बारे न देहिंगे, छन छन घटै सनेह॥
कबीर साहेब आगे समझाते हैं कि मृत्यु के समीप आने पर या प्राण छूटने के समय कोई कुछ भी दान नहीं कर पाएगा। उस अंतिम क्षण में शरीर और संसार से मोह क्षीण होने लगता है तथा ताकत जवाब दे जाती है। इसलिए जीवित रहते हुए ही सत्कर्म कर लेना बुद्धिमत्ता है, क्योंकि मरने के बाद यह शरीर और इसकी शक्ति किसी काम की नहीं रहती।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

इस दोहे का मूल भाव दान, परोपकार और जीवन की नश्वरता पर आधारित है। कबीर दास जी ने मनुष्य को सचेत किया है कि मनुष्य का यह शरीर नाशवान है। आज स्वास्थ्य है, बल है, धन है और समय है, तो इसका सदुपयोग परमार्थ में करना चाहिए। लोग अक्सर सोचते हैं कि वे वृद्धावस्था में या जीवन के अंतिम पड़ाव में धार्मिक कार्य करेंगे, दान देंगे या भगवान का स्मरण करेंगे। किंतु कबीर साहेब इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ते हुए कहते हैं कि जब मृत्यु का समय आता है (मरती बारे), तब शरीर में न तो बल रहता है और न ही मन में देने की सामर्थ्य। उस समय तो प्राण संकट में होते हैं।

संत कबीर का यह कथन सनातन धर्म के उस सिद्धांत से पूरी तरह मेल खाता है जिसमें वेदों और उपनिषदों ने 'दानम यज्ञं च तपश्चैव' (दान, यज्ञ और तप) को गृहस्थ जीवन का सबसे बड़ा कर्तव्य माना है। शरीर रहते हुए जो कर्म किया जाता है, वही जीवात्मा की असली पूंजी बनती है। मृत शरीर से किसी प्रकार का परोपकार संभव नहीं है। अतः यह साखी हमें स्वार्थ त्यागकर लोक-कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार | Core Theme

इस साखी का केंद्रीय विचार नश्वरता (Mortality) और परोपकार (Altruism) है। कबीर दास जी सिखाते हैं कि मानव योनि बड़े सौभाग्य से मिलती है और इस जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल अपने लिए जीना नहीं, बल्कि संसार के अन्य जीवों की सेवा करना है। स्वार्थ और मोह मनुष्य को संकुचित बनाते हैं, जबकि दान और सेवा अंतःकरण को शुद्ध करती है। यही कारण है कि संत परंपरा में जीवन के हर क्षण को मूल्यवान माना गया है।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश | Spiritual & Philosophical Message

दार्शनिक दृष्टिकोण से यह दोहा जीव की अज्ञानता और मोह पर करारा प्रहार करता है। मनुष्य अज्ञानवश इस नाशवान शरीर को ही सब कुछ मान बैठता है और इसके संवर्धन में पूरा जीवन व्यतीत कर देता है। कबीर साहेब याद दिलाते हैं कि देह एक न एक दिन माटी में मिल जानी है। आत्मा अमर है और उसके कल्याण का एकमात्र साधन सत्कर्म और भगवद् भक्ति है। जब तक देह में प्राण हैं, तब तक उदारता का आचरण करना ही सच्चे साधक का लक्षण है। इसी से जीवात्मा भवसागर से मुक्त होकर अपनी मूल परम सत्ता में विलीन होने की योग्यता प्राप्त करती है।

भक्ति परंपरा में महत्व | Importance in Bhakti Tradition

संत कबीर की वाणियां 'बीजक' और 'कबीर ग्रन्थालय' में संकलित हैं और इन्हें उत्तर भारत की निर्गुण भक्ति धारा का मूलाधार माना जाता है। हालांकि कबीर साहब निर्गुणोपासक थे, किंतु उनकी शिक्षाएं समस्त सनातन धर्म और मानवता के लिए मार्गदर्शक हैं। श्री हनुमान चालीसा के पाठ की तरह ही कबीर के इन दोहों का स्मरण करने से मानसिक शुद्धि होती है और जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण विकसित होता है।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख | Daily Life Relevance & Lessons

कबीर दास जी के इस दोhe की प्रासंगिकता आज के आधुनिक युग में और अधिक बढ़ गई है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य अत्यधिक स्वार्थी और भौतिकवादी होता जा रहा है। ऐसे समय में यह साखी हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख देती है:

  • समय का सदुपयोग: कल पर कोई अच्छा काम न टालें, जो करना है आज और अभी करें।
  • दानशीलता: अपनी कमाई और संसाधनों का एक हिस्सा जरूरतमंदों की सहायता में लगाएं।
  • अहंकार का त्याग: यह शरीर और धन हमेशा साथ नहीं रहने वाले, इसलिए इनका अभिमान न करें।
  • परोपकार की भावना: दूसरों के जीवन में प्रकाश लाने से ही अपने जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली | Literary Analysis

कबीर की भाषा सीधी, सपाट और दिल को चीर देने वाली है। इस दोहे में 'देह' और 'सनेह' का तुकान्त (Rhyme) इसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। 'मरती बारे' और 'छन छन घटै' जैसे प्रयोग ग्रामीण और लोक-जीवन के अनुभवों से लिए गए हैं, जो आम जनमानस के हृदय में आसानी से उतर जाते हैं। इसमें उपदेशात्मक शैली के साथ-साथ गंभीर दार्शनिक गहराई भी विद्यमान है।

दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख | Key Lessons

  • शरीर नाशवान है, इसलिए इसका उपयोग सत्कर्मों में करें।
  • दान और परोपकार करने के लिए सही समय का इंतजार न करें, जब अवसर मिले तब करें।
  • अंतिम समय में शरीर और मन दोनों कमजोर हो जाते हैं, तब कुछ करना असंभव होता है।
  • स्वार्थ का त्याग कर परोपकार को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाएं।
  • संतों के वचनों को केवल सुनना नहीं, बल्कि अपने आचरण में उतारना चाहिए।

एक नजर में | Quick Summary

विशेषता विवरण
रचना कहैं कबीर देय तू जब लग तेरी देह
रचनाकार / संत संत कबीर दास जी
भाषा सधुक्कड़ी / संत-भाषा (हिंदी की लोक बोलियाँ)
परंपरा निर्गुण भक्ति धारा / कबीर वाणी
मुख्य विषय दान, परोपकार, नश्वरता और सेवा भाव
मुख्य संदेश जीवित रहते हुए अच्छे कर्म और दान अवश्य करें
मूल ग्रंथ कबीर बीजक / साखी ग्रंथ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस दोहे का मुख्य अर्थ यह है कि जब तक हमारे पास यह भौतिक शरीर और सामर्थ्य है, तब तक हमें परोपकार, दान और सत्कर्म करने चाहिए। मृत्यु के समय शरीर और बल क्षीण हो जाते हैं, तब कुछ भी करना संभव नहीं होता।

कबीर जी जानते थे कि यह शरीर नाशवान है। मनुष्य मोह-माया में फंसकर अपना पूरा जीवन व्यर्थ गंवा देता है। दान और परोपकार से अंतःकरण शुद्ध होता है और जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है।

इसका तात्पर्य यह है कि मृत्यु के समय या अंतिम क्षणों में मनुष्य न तो किसी को कुछ दे सकता है और न ही दान करने में समर्थ होता है, क्योंकि उस समय प्राण और शरीर दोनों साथ छोड़ रहे होते हैं।

यह दोहा संत कबीर दास की 'साखी' संग्रह और कबीर बीजक के अंतर्गत आता है, जिसमें जीवन और दर्शन के गहरे उपदेश दिए गए हैं।

आज के स्वार्थी और व्यस्त समय में यह दोहा हमें इंसानियत, दूसरों की मदद करने और अपने समय व धन का सदुपयोग करने की प्रेरणा देता है।

कबीर दास जी निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे और बाह्य आडंबरों का विरोध करते थे, परंतु उनकी शिक्षाएं सार्वभौमिक हैं जो मानवता, प्रेम और नैतिकता का पाठ पढ़ाती हैं।

कबीर वाणी का अध्ययन करने से मानसिक शांति मिलती है, जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण विकसित होता है और अहंकार का नाश होता है।

इस साखी को इसके कठिन शब्दों के अर्थ सहित समझकर प्रतिदिन अपने जीवन के आचरण में उतारना ही इसे आत्मसात करने का सबसे अच्छा तरीका है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संत कबीर दास के इस दोहे की यह व्याख्या पारंपरिक संतों के वचनों, कबीर बीजक के टीका-ग्रंथों और लोक-साहित्य के अध्ययन पर आधारित है। इसे पाठकों की आध्यात्मिक और व्यावहारिक सुगमता को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस लेख में प्रामाणिक शब्दावली और सरल हिंदी का प्रयोग किया गया है ताकि हर आयु वर्ग के पाठक इससे लाभान्वित हो सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • कबीर बीजक - स्वामी प्रज्ञानंद जी द्वारा टीका
  • कबीर ग्रन्थालय - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • संत कबीर वाणी और साखियां - सनातन भक्ति साहित्य
  • भारतीय दर्शन एवं भक्ति आंदोलन के प्रमुख आयाम

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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