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Kabir Amritvani

संत वाणी: सब्द एक – एकहि टेक, सतगुरु और सत्तलोक का रहस्य (Sant Vani: Shabd Ek – The Secret of the One Word, Satguru and Satlok)

163 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
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🔊 संत वाणी

संतों और ऋषियों के आध्यात्मिक इतिहास की गहरी समझ के लिए संत एवं ऋषि ज्ञानकोश अवश्य पढ़ें।

सब्द एक – एकहि टेक, सतगुरु और सत्तलोक का रहस्य

सत्तनाम है एक, जो सतगुरु सत भाखिया । करहु एक की टेक, मुक्ति नहीं परतीत बिनु ॥

🌟 साधना का परम रहस्य: एक शब्द, एक टेक, एक सतगुरु

प्रस्तुत है संत वाणी का एक अत्यंत सारगर्भित अंश, जो सब्द एक (एक ही शब्द), एकहि टेक (एक ही आधार) और सतगुरु के माध्यम से सत्तलोक (सत्यलोक) की प्राप्ति का मार्ग बताता है। यह वाणी हमें सिखाती है कि संसार की सारी विविधता (अनंत रूप, रंग, भेष) एक ही मूल सत्य से उत्पन्न हुई है – वह है सब्द एक (सत् शब्द)

इन पंक्तियों में संत कहते हैं कि जो इस एक शब्द को पहचान लेता है, उसका मन स्थिर (समोई) हो जाता है और वह द्विविधा (दुविधा) और भ्रम से मुक्त हो जाता है। सतगुरु ही इस भेद को बताते हैं और साधक को उस परम घर (सत्तलोक) तक पहुँचाते हैं। अंत में, संत कहते हैं कि सच्ची साधना के लिए सिर गुरु को अर्पण करना (अहंकार का पूर्ण समर्पण) आवश्यक है – तभी तत्व का विचार होता है और सतगुरु की दया से भवसागर पार होता है।

📖 संत वाणी: मूल पाठ एवं सरल अर्थ

“सब्द एक और एकहि रूपा । सेत से उपजा लाल सरूपा ॥
एक देख तब मन पतियाई । एकहि में मन रहा समाई ॥
एकहि से जग भया अनंता । सतगुरु भेद बतावै संता ॥
वही वहाँ ले घर पहुँचावें । जग अनंत में एक कहावें ॥
एकहि टेक करें जिव आसा । मन बच क्रम सतगुरु बिस्वासा ॥”

सरल अर्थ: शब्द एक है और उसका रूप भी एक ही है। श्वेत (सेत) रूप से ही लाल रूप उत्पन्न हुआ (अर्थात एक मूल से अनेक रंग, रूप प्रकट हुए)। जब (साधक) इस एक (सत् शब्द) को देख लेता है, तब उसका मन पतियाई (श्रद्धा से स्थिर) हो जाता है, और वह एक (शब्द) में ही समा जाता है। उसी एक (सत् शब्द) से यह जगत अनंत (अनेक रूपों में) प्रकट हुआ। सतगुरु ही इस भेद को संत (साधक) को बताते हैं। वे (सतगुरु) उस (परम) घर तक पहुँचाते हैं, जहाँ यह अनंत जगत (विविधता) एक (मूल सत्य) के रूप में कहा जाता है। जीव को एक ही टेक (आधार, सहारा) पर आशा (आश्रय) करनी चाहिए, और मन, वचन, क्रम (शरीर की क्रिया) से सतगुरु में विश्वास (बिस्वासा) रखना चाहिए।

“एक रूप इक बर्न है, एकहि है सब भेष ।
दुविधा भरम विसारिये, ऐसा अगम संदेस ॥”

सरल अर्थ: (सत्य का) एक ही रूप है, एक ही वर्ण (रंग) है, सब भेष (वेश, रूप) वह एक ही है। दुविधा (दो-तरफ़ा सोच) और भ्रम को त्याग दो – यह अगम (अगम्य, दुर्लभ) संदेश (उपदेश) है।

“सत्तनाम है एक, जो सतगुरु सत भाखिया ।
करहु एक की टेक, मुक्ति नहीं परतीत बिनु ॥”

सरल अर्थ: सत्तनाम (सत् नाम) एक है, जिसे सतगुरु ने सच्चा (सत) बताया है। (इसलिए) एक (सत्तनाम) की टेक (आधार, सहारा) करो, क्योंकि बिना परतीत (श्रद्धा) के मुक्ति नहीं है।

“वा का ज्ञान अखरावति सारा । बावन अच्छर का बिस्तारा ॥
नौ उपदेस भेद अस भाखा । नेति नेति से ऊपर राखा ॥
इक इक अच्छर की सहदानी । वेद का मूल कथा कहो बानी ॥
सत्त लोक का अगम संदेसा । सो सतगुरु जीवन उपदेसा ॥
अकथ कथा अखरावति भाखी । वेद कतेब देहिं सब साखी ॥
अखरावति पढ़ि भेद बखाने । सतगुरु को महिमा सो जाने ॥
आदि अंत निज अच्छर ठहरै । अच्छर माहिं निअच्छर सुख करै ॥”

सरल अर्थ: उस (सत्य) का ज्ञान अखरावति (अक्षरों के माध्यम से) सार (सारांश) रूप में कहा गया है। बावन अक्षरों (वर्णमाला) का विस्तार (समस्त शास्त्र) है। नौ उपदेश (नव-विधा भक्ति या नौ नाथों के उपदेश) आदि भेदों को कहा गया है, परंतु (सत्य को) नेति-नेति (यह नहीं, वह नहीं) के द्वारा ऊपर रखा गया है (अर्थात इन सबसे परे बताया गया है)। प्रत्येक अक्षर की सहदानी (साक्षी, शक्ति) है। वेदों का मूल (आधार) कथा (वाणी) कहो। सत्तलोक का अगम (दुर्लभ) संदेश – वह सतगुरु जीवन (जीवित) उपदेश देते हैं। अकथ कथा (जो कही न जा सके) को अखरावति (अक्षरों के माध्यम से) कहा गया है। वेद और कतेब (कुरान आदि धर्मग्रंथ) सब साखी (गवाही) देते हैं। अखरावति (लिखित शास्त्रों) को पढ़कर लोग भेद (रहस्य) बखानते हैं, पर सतगुरु की महिमा वही जानता है (जो अनुभव करता है)। आदि और अंत में निज अच्छर (अपना मूल अक्षर, सत् नाम) स्थिर है। अच्छर (अक्षर) के भीतर निःअच्छर (अक्षरातीत) सुख (आनंद) करता है।

“विन अच्छर सब झूठ है, अच्छर सब में सार ।
अच्छर भेद जो पावई, सोई हंस हमार ॥”

सरल अर्थ: बिना अच्छर (मूल अक्षर, सत् नाम) के सब झूठ है; अच्छर ही सब में सार (तत्व) है। जो अच्छर का भेद (रहस्य) प्राप्त कर लेता है, वही हमारा हंस (परमहंस, सिद्ध साधक) है।

“कहै कबीर उर माहिं, सत्तलोक परतीत कर ।
हंसराज की छाँहिं, सो निहचे भोजल तरै ॥”

सरल अर्थ: कबीर कहते हैं कि हृदय में सत्तलोक (सत्यलोक) की परतीत (श्रद्धा) करो। (तब) हंसराज (परमहंस, सतगुरु) की छाँह (शरण, साया) में वह निश्चय ही भवसागर (भोजल) को पार कर जाता है।

“सीस गुरू को अरपि के, कीजै तत्व विचार ।
सतगुरु दया से मुक्ति फल, उतरे भोजल पार ॥”

सरल अर्थ: (अपना) सिर गुरु को अर्पण करके (अहंकार का पूर्ण समर्पण करके), तत्व का विचार करो। सतगुरु की दया से मुक्ति का फल (प्राप्त होता है), और (जीव) भवसागर (भोजल) को पार उतर जाता है।

🕉️ वाणी का आध्यात्मिक विश्लेषण

1. सब्द एक – एकता का दर्शन

वाणी का मूल संदेश है – सब्द (सत् शब्द) एक है। यह एक ही शब्द (सत् नाम) सभी रूपों, रंगों और भेषों का मूल कारण है। “सेत से उपजा लाल सरूपा” – जैसे एक श्वेत प्रकाश से सात रंग प्रकट होते हैं, वैसे ही एक सत् शब्द से यह अनंत जगत विस्तारित हुआ है। जो साधक इस एक को देख लेता है, उसका मन स्थिर (समाई) हो जाता है और वह द्विविधा (दुविधा) से मुक्त हो जाता है।

2. सतगुरु – एक से अनंत तक और वापस

“एकहि से जग भया अनंता” – एक से अनंत जगत प्रकट हुआ। परंतु सतगुरु ही वह भेद बताते हैं कि कैसे इस अनंत में एक को देखा जाए। वे साधक को उस परम घर (सत्तलोक) तक पहुँचाते हैं, जहाँ यह अनंत विविधता एक (सत् शब्द) में लीन हो जाती है। सतगुरु ही “एक की टेक” करना सिखाते हैं और “सत्तलोक” का अगम संदेश सुनाते हैं।


3. अच्छर, बावन अच्छर, और निःअच्छर

वाणी “अच्छर” (मूल अक्षर, सत् नाम) को सबका सार बताती है। “बावन अच्छर” (52 अक्षरों की वर्णमाला) और उनसे बने सभी शास्त्र (वेद, कतेब) विस्तार मात्र हैं। परंतु इन सबसे परे “नेति-नेति” (यह नहीं, वह नहीं) के द्वारा “निःअच्छर” (अक्षरातीत) को स्थापित किया गया है। सच्चा ज्ञानी वह है जो अक्षरों को पढ़कर भेद बखानने वालों से ऊपर उठकर, सतगुरु की महिमा को जानता है।

4. सीस गुरू को अरपि के – पूर्ण समर्पण

अंतिम दोहा साधना का सबसे गूढ़ रहस्य बताता है – “सीस गुरू को अरपि के”। सिर अर्पण करने का अर्थ है अहंकार का पूर्ण समर्पण। जब तक अहंकार (मैं) शेष है, तब तक तत्व का विचार नहीं हो सकता। सतगुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और श्रद्धा (परतीत) ही वह मार्ग है, जिससे सतगुरु की दया प्राप्त होती है और भवसागर पार होता है।


5. हंसराज की छाँह – सतगुरु की शरण

“हंसराज” का अर्थ है परमहंस – सतगुरु। उनकी छाँह (शरण) में रहने वाला निश्चित रूप से भवसागर पार कर जाता है। “सत्तलोक परतीत कर” – हृदय में सत्यलोक (परमधाम) की श्रद्धा धारण करो। यही साधना का सार है।

🧘 साधना पथ: एक की टेक, अहंकार समर्पण, सतगुरु की दया

इस वाणी में साधना के तीन स्पष्ट चरण बताए गए हैं – एक की टेक (सत् शब्द का एकमात्र आधार), सतगुरु में पूर्ण विश्वास और श्रद्धा (परतीत), और अहंकार का समर्पण (सीस अर्पण)

🔊

एक की टेक

“करहु एक की टेक” – सत् शब्द (सत्तनाम) को ही एकमात्र आधार बनाएँ। समस्त विविधता में एक (सत्) को देखें। “एकहि टेक करें जिव आसा” – जीव की एक ही टेक (आशा) होनी चाहिए।

🙏

परतीत (श्रद्धा)

“मुक्ति नहीं परतीत बिनु” – बिना श्रद्धा के मुक्ति नहीं। सतगुरु के उपदेश में पूर्ण विश्वास रखें। “सत्तलोक परतीत कर” – हृदय में सत्यलोक की श्रद्धा धारण करें।

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सीस अर्पण

“सीस गुरू को अरपि के” – अहंकार का पूर्ण समर्पण। जब तक ‘मैं’ है, तत्व का विचार नहीं होता। सतगुरु को सिर अर्पण करने का अर्थ है – अपनी बुद्धि, अहंकार, और इच्छाओं को गुरु के चरणों में समर्पित कर देना।

📌 अभ्यास सुझाव: प्रतिदिन ध्यान में बैठकर सतगुरु द्वारा बताए गए “सत्तनाम” (सत् शब्द) का स्मरण करें। इस एक शब्द को ही अपनी साधना का एकमात्र आधार (टेक) बनाएँ। सभी बाहरी विविधताओं (रूप, रंग, भेष, मत-पंथ) में एक ही सत्य को देखने का प्रयास करें। सतगुरु में पूर्ण श्रद्धा (परतीत) रखें – उनके उपदेश को बिना किसी द्विविधा (दुविधा) के ग्रहण करें। सबसे महत्वपूर्ण – अपने अहंकार को गुरु के चरणों में समर्पित करें। “सीस अर्पण” का अभ्यास है – अपनी इच्छाओं, अपनी समझ, अपने ‘मैं’ को गुरु की इच्छा में मिला देना। तभी “तत्व विचार” संभव है और सतगुरु की दया से “भोजल पार” होता है।

🌹 अन्य संतों की वाणी में एक की टेक और सिर अर्पण

“एक कहूँ एकै जानू, एक बिना दूजा न मानू।
एक सबद एकै ध्यानू, एकै गुरु एकै ज्ञानू।।”

– कबीर

“सिर धरि गुरु के आगे, कीजै सब अरदास।
तब गुरु दया दरस दें, मिटै भव-भ्रम नाश।।”

– गुरु नानक

“हंसा हंसा करि तरे, जिन गुरु कीन्ह बिचार।
सतगुरु छाँह जिन लीनी, तिनका नहीं संसार।।”

– संत दादूदयाल

❓ वाणी से जुड़े सामान्य प्रश्न

प्रश्न 1: “सब्द एक और एकहि रूपा” – इस एक शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर: यह “सब्द एक” सत् शब्द (सत् नाम) है – जो परमात्मा का मूल स्वरूप है। यही वह एक सत्य है, जिससे यह अनंत जगत प्रकट हुआ है। जैसे एक प्रकाश से अनेक रंग, एक बीज से अनेक वृक्ष, वैसे ही एक सत् शब्द से यह विविधता उत्पन्न हुई। साधना का लक्ष्य इस एक को पहचानना और उसी में लीन हो जाना है।

प्रश्न 2: “एकहि टेक” करने का क्या अर्थ है? क्या यह अन्य धर्मों या देवी-देवताओं को नकारना है?

उत्तर: “एकहि टेक” का अर्थ है – सत् शब्द (सत् नाम) को ही एकमात्र आधार बनाना। यह अन्य धर्मों या देवी-देवताओं को नकारना नहीं है, बल्कि उन सब के मूल सत्य (एक सत्) को पहचानना है। सभी रूप, भेष, नाम उसी एक सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं। साधक का लक्ष्य उस मूल सत्य तक पहुँचना है, न कि बाहरी विविधताओं में भटकना।

प्रश्न 3: “सीस गुरू को अरपि के” – क्या सचमुच सिर काटकर गुरु को अर्पण करना होता है?

उत्तर: यह आलंकारिक भाषा है। “सीस” का अर्थ है अहंकार (मैं), स्वार्थ, और अपनी बुद्धि का अभिमान। सिर अर्पण करने का अर्थ है – अपने अहंकार को, अपनी इच्छाओं को, अपनी समझ के अहंकार को गुरु के चरणों में समर्पित कर देना। जब साधक पूर्ण रूप से गुरु के प्रति समर्पित हो जाता है, तभी वह तत्व का विचार कर पाता है। यह समर्पण आंतरिक है, बाह्य नहीं।

प्रश्न 4: “हंसराज की छाँह” से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: “हंसराज” का अर्थ है परमहंस – वह सिद्ध सतगुरु जो स्वयं उस परम सत्य को प्राप्त कर चुके हैं। “छाँह” का अर्थ है शरण, साया, संरक्षण। सतगुरु की शरण में रहने वाला, उनके उपदेशों का पालन करने वाला साधक निश्चित रूप से भवसागर पार कर जाता है। यह गुरु-कृपा का महत्व बताता है।

📝 आत्म-साधना का परम रहस्य

यह संत वाणी हमें साधना का सबसे सरल और सबसे गहन रहस्य बताती है – एक की टेक। संसार की सारी विविधता, सभी रूप, रंग, भेष, मत-पंथ – सब एक ही मूल सत्य (सब्द एक, सत्तनाम) से उत्पन्न हुए हैं। साधक का लक्ष्य है उस एक को पहचानना, उसी में मन को समाना, और उसी को अपना एकमात्र आधार (टेक) बनाना।

इस मार्ग पर चलने के लिए सतगुरु की आवश्यकता है। सतगुरु ही इस भेद को बताते हैं, वे ही साधक को सत्तलोक (परमधाम) तक पहुँचाते हैं। और इस मार्ग पर चलने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है – परतीत (श्रद्धा) और सीस अर्पण (अहंकार का समर्पण)। जब तक अहंकार शेष है, तब तक सतगुरु की दया नहीं उतरती।

संत कबीर कहते हैं – “हंसराज की छाँहिं, सो निहचे भोजल तरै”। जो सतगुरु (हंसराज) की शरण में आ जाता है, वह निश्चित रूप से भवसागर पार कर जाता है। इसलिए साधक को चाहिए कि वह सतगुरु को अपना सिर अर्पण करे (अहंकार समर्पित करे), उनके उपदेश में पूर्ण श्रद्धा रखे, और “एक की टेक” को धारण करे। यही वह मार्ग है, जो “भोजल पार” कराता है और सत्तलोक की प्राप्ति कराता है।

🙏 ॐ सब्द एकाय नमः || एकहि टेक करहु, सीस गुरू अरपि, भोजल पार उतरहु ||

🔊 सब्द एक और एकहि रूपा
एक देख तब मन पतियाई, सतगुरु भेद बतावै संता
श्रेणियां: Kabir Amritvani

सनातन संस्कृति एवं प्रामाणिक संपादन

यह भजन/आरती लिरिक्स भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों के संदर्भ में समीक्षा एवं संपादन के बाद प्रकाशित किया गया है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 11 Aug 2026

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