आज का पंचांग | सूर्योदय: ०५:४५ AM | सूर्यास्त: ०६:५० PM
Kabir Amritvani

संत वाणी: ओंकार से सृष्टि का विस्तार – नाम का महत्व और चौथी अवस्था (Sant Vani: The Expansion of Creation from Omkar – Importance of Naam and the Fourth State)

168 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
आकार:
कंट्रास्ट:

🧘 संत वाणी: ओंकार और सृष्टि का रहस्य

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

निराकार ते भया अकारा – या विधि भौसागर बिस्तारा

नाम एक सार जग माहीं, नाम बिहूना आवे जाही

🌟 ओंकार – ब्रह्म का प्रथम ध्वनि स्वरूप

प्रस्तुत है संत वाणी का एक महत्वपूर्ण अंश, जो ओंकार को सृष्टि के मूल कारण के रूप में स्थापित करता है। यह वाणी निराकार से साकार के विस्तार, तीन लोकों और चौथी अवस्था (तुरीय) के रहस्य, तथा नाम (सतनाम) की सार्वभौमिक महिमा का वर्णन करती है।

संत कहते हैं कि ओंकार को सारा जगत जानता है, पर उसका सच्चा स्वरूप केवल सतगुरु के मार्ग पर चलने वाला ही समझ पाता है। निराकार से साकार हुआ, और इसी प्रकार भवसागर (संसार) का विस्तार हुआ। तीन लोकों में सब रचा-बसा है, पर चौथा (तुरीय) वह पद है जिसे कोई विरला ही पाता है। नाम ही सार है – नाम के बिना जीव जन्म-मरण के चक्र में भटकता है। वेद-कतेव (शास्त्र) एक ओर हैं, और नाम की निहोरी (शरण) दूसरी ओर। सच्ची साधना वही है जो सतगुरु के सत पंथ पर चलकर नाम को धारण करे।

📖 संत वाणी: मूल पाठ एवं सरल अर्थ

“ओंकार को सब जग जानी । ता ते पंडित बेद बखानी ॥
निराकार ते भया अकारा । या विधि भौसागर बिस्तारा ॥”

सरल अर्थ: ओंकार को सारा जगत जानता है। उसी से पंडित लोग वेदों की व्याख्या करते हैं। निराकार (निर्गुण ब्रह्म) से साकार (सगुण स्वरूप) उत्पन्न हुआ, और इसी विधि से भवसागर (संसार-समुद्र) का विस्तार हुआ।

“सू म से जो भया अस्थूला । हिलमिल बिलसे ता को मूला ॥
सुद्दम कार जाहि निरमाया । आपहि सब का मूल कहाया ॥”

सरल अर्थ: सूक्ष्म (सू) से स्थूल (अस्थूल) बना। उसके हिलने-मिलने (संयोग) से वह मूल (आधार) रूप में विलसता (प्रकट) हुआ। सुद्दम कार (शुद्ध ब्रह्म) जो माया से रहित (निर्माया) है, वही सबका मूल कहलाता है।

“ता म निःतत का बासा । विमल सरूप सदा परकासा ॥
तीन लोक में रहा समोई । चौथे को जब पावे कोई ॥
पाँच तत्त गुन तीन जो राचा । देह लागि सुर नर मुनि नाचा ॥”

सरल अर्थ: उस (ब्रह्म) में निःतत (नित्य) का वास है। वह विमल (निर्मल) स्वरूप है, सदा प्रकाशमान है। तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में वह समाया हुआ है। जब कोई चौथे (तुरीय) पद को प्राप्त करता है, तब सच्चा ज्ञान होता है। पाँच तत्त्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और तीन गुण (सत्व, रज, तम) – इनसे यह देह रची गई है, और इस देह के कारण देवता (सुर), मनुष्य (नर) और मुनि (ऋषि) सब नाचते (भ्रमित) हैं।

“तिरविधि ताप को काटही, चौथे आप कहाय ।
सत्त सब्द जाने बिना, सब जग रहा भुलाय ॥”

सरल अर्थ: (जो साधक) तीनों प्रकार के ताप (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) को काट देता है, वह चौथे (तुरीय) पद को प्राप्त होता है। सत् शब्द (सत्य शब्द/सतनाम) को जाने बिना सारा जगत भूला हुआ (भ्रमित) है।

“मूल बाँडि गह डार, सुर नर मुनि जो रहे सब ।
भूल रहा संसार, तिरविधि रूप परखंड में ॥”

सरल अर्थ: मूल (ब्रह्म) को बाँटकर (विभाजित कर) सुर, नर और मुनि सब स्थित हैं। यह संसार तीनों प्रकार के रूप (तिरविधि) के परखंड (आडंबर) में भूला हुआ है।

“विलें नाम कोई कोइ यावे । जेहि ते आवागवन नसावै ॥
ममता ते जग को विस्तारा । नाम गहे सो उतरे पारा ।
काहे पंडित विद्या पढ़ाई । सतगुरु के सत पंथ न चलई ॥
वेद कतेव धेरे इक ओरा । तन मन अपें नाम निहोरा ॥
पटतर नाम न जग कछु अहई । ब्रिजी जीव जो नाम छ देई ॥
नाम विना जिव परले होई । सुर नर मुनि सब गये बिगोई ॥
नाम एक सार जग माहीं । नाम बिहूना आवे जाही ॥”

सरल अर्थ: विरला कोई (विलें) नाम को पाता है, जिससे आवागमन (जन्म-मरण) नष्ट हो जाता है। ममता (आसक्ति) से इस जगत का विस्तार हुआ है; नाम को ग्रहण करने वाला ही पार उतरता है। पंडित लोग विद्या पढ़कर क्यों व्यर्थ घमंड करते हैं, जब वे सतगुरु के सत पंथ (सच्चे मार्ग) पर नहीं चलते? वेद-कतेव (शास्त्र) एक ओर हैं, और अपने तन-मन को नाम की निहोरी (शरण) में लगाना दूसरी ओर। पटतर (व्यापार, साधन) में नाम के समान कोई दूसरा (जगत में) नहीं है। जीव को जो नाम देता है, वही ब्रिजी (बृजी – सही मार्ग पर चलने वाला) है। नाम के बिना जीव परलोक में भटकता है; देवता, मनुष्य और मुनि सब नष्ट हो गए (नाम के अभाव में)। नाम ही एक सार (सत्य) है इस जगत में; नाम के बिना जीव आता-जाता (जन्म-मरण) रहता है।

“नाम भजै धन धाम तजि, नर नारी सब कोय ।
अवचल महिमा जेहि बसै, तो अवचल देही होय ॥”

सरल अर्थ: नाम का भजन करने वाला धन-धाम (सांसारिक सुख) का त्याग कर देता है, चाहे वह नर हो या नारी। जिसमें अवचल (अटल, शाश्वत) महिमा बस जाती है, वह अवचल देही (अमर आत्मा) हो जाता है।

“सतनाम विस्वास, करम भरम जग परिहरै ॥
सतगुरु पुरखे आस, जो नर आस ऐसी करें ॥”

सरल अर्थ: सतनाम में विश्वास रखने वाला, कर्म और भ्रम (संसारिक बंधन) को त्याग देता है। जो मनुष्य सतगुरु पुरख (सतगुरु परमात्मा) पर ऐसी आस (आशा, भरोसा) करता है, वह सफल होता है।

🕉️ वाणी का आध्यात्मिक विश्लेषण

1. ओंकार – सृष्टि का बीज

ओंकार को वेदों का सार और ब्रह्म का प्रथम ध्वनि स्वरूप माना गया है। यहाँ संत कहते हैं कि सब जगत ओंकार को जानता है, पर केवल जानना ही पर्याप्त नहीं; उसके रहस्य को सतगुरु के मार्ग पर चलकर ही समझा जा सकता है। निराकार (निर्गुण) से साकार (सगुण) का विस्तार हुआ और यही भवसागर का आधार है।

2. सूक्ष्म से स्थूल – सृष्टि का क्रम

“सू म से जो भया अस्थूला” – सूक्ष्म (अव्यक्त) से स्थूल (व्यक्त) की उत्पत्ति हुई। यह सांख्य दर्शन के सिद्धांत से मेल खाता है। “सुद्दम कार” (शुद्ध ब्रह्म) ही मूल है, जो माया से रहित है।


3. तीन लोक और चौथा पद

तीन लोक – स्वर्ग, मृत्यु, पाताल – में सब रचा-बसा है, पर यह सब भ्रम है। “चौथे को जब पावे कोई” – चौथा पद तुरीय अवस्था है, जो तीनों गुणों और अवस्थाओं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति) से परे है। यही आत्म-साक्षात्कार की स्थिति है।

4. त्रिविधि ताप और सत् शब्द

तीन प्रकार के ताप (आधिदैविक – दैवी यातनाएँ, आधिभौतिक – भौतिक कष्ट, आध्यात्मिक – मानसिक/आत्मिक संताप) से मुक्ति केवल सत् शब्द (सतनाम) के ज्ञान से होती है। बिना इस ज्ञान के सारा जगत भुलावे में है।


5. नाम की सार्वभौमिक महिमा

इस वाणी में नाम को सबसे श्रेष्ठ साधन बताया गया है। “नाम एक सार जग माहीं” – संसार में केवल नाम ही सार है। नाम ही आवागमन (जन्म-मरण) को नष्ट करता है। वेद-शास्त्र (वेद कतेव) एक ओर हैं, पर नाम की शरण (निहोरी) दूसरी ओर। पंडितों की विद्या व्यर्थ है यदि वे सतगुरु के सत पंथ पर न चलें।

🧘 साधना पथ: नाम ही सार, सतगुरु ही आस

यह वाणी साधक को स्पष्ट रूप से बताती है कि नाम (सतनाम) ही वह साधन है जो जन्म-मरण के चक्र को तोड़ता है और चौथी अवस्था (तुरीय) को प्राप्त कराता है। इसके लिए सतगुरु के सत पंथ पर चलना और सतनाम में विश्वास रखना आवश्यक है।

🔊

नाम भजन

“नाम भजै धन धाम तजि” – नाम का स्मरण सभी सांसारिक आसक्तियों का त्याग कराता है। नाम ही वह जहाज है जो भवसागर पार लगाता है।

🙏

सतगुरु का पंथ

“सतगुरु के सत पंथ न चलई” – केवल विद्या पढ़ने से कुछ नहीं होता। सतगुरु के बताए सच्चे मार्ग पर चलना ही सार्थक है।

🌀

तुरीय की प्राप्ति

तीनों लोकों और तीनों अवस्थाओं से परे चौथा पद (तुरीय) ही परम लक्ष्य है। यह नाम के अभ्यास से, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।

📌 अभ्यास सुझाव: सतगुरु से सतनाम ग्रहण करें। उस नाम का निरंतर जाप करें – मानसिक रूप से, कण्ठ से, या हृदय से। धीरे-धीरे ममता और आसक्तियाँ कम होंगी। जब नाम में स्थिरता आएगी, तब “चौथे” पद (तुरीय) का अनुभव होने लगेगा। वेद-शास्त्रों के पठन-पाठन में ही न उलझें, बल्कि सतगुरु के बताए सत पंथ पर चलें। याद रखें, “नाम बिहूना आवे जाही” – नाम के बिना जीव बार-बार आता-जाता है।

🌹 अन्य संतों की वाणी में ओंकार और नाम की महिमा

“ओंकार ब्रह्म सरूप है, ओंकार ही राम।
ओंकार ही गोविंद है, ओंकार ही नाम।।”

– संत कबीर

“जागत स्वप्न सुषुप्ति तीनों, चौथा तुरीय नाम।
नानक नाम अधार है, नामे ही विश्राम।।”

– गुरु नानक

“नाम रटत जग तरि गया, नाम बिहूना मरि मरि जाय।
सतगुरु मिले तो नाम मिले, फिर जनम न आवै धाय।।”

– संत तुलसीदास

❓ वाणी से जुड़े सामान्य प्रश्न

प्रश्न 1: “चौथा” पद क्या है? (चौथे को जब पावे कोई)

उत्तर: “चौथा” पद तुरीय अवस्था है। वेदांत में चार अवस्थाएँ बताई गई हैं – जागृत (जाग्रत), स्वप्न, सुषुप्ति (गहन निद्रा), और तुरीय (चौथी)। तुरीय वह अवस्था है जहाँ आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होती है, तीनों गुणों और अवस्थाओं से परे। यही मोक्ष या आत्म-साक्षात्कार की स्थिति है।

प्रश्न 2: “तिरविधि ताप” किन्हें कहते हैं?

उत्तर: तिरविधि (तीन प्रकार) ताप हैं – आधिदैविक (देवताओं/प्रकृति से उत्पन्न कष्ट – बाढ़, भूकंप, आदि), आधिभौतिक (जीवों/पदार्थों से उत्पन्न कष्ट – चोर, शत्रु, रोग), और आध्यात्मिक (मन, प्राण, आत्मा से उत्पन्न कष्ट – अज्ञान, अहंकार, वासनाएँ)। इन तीनों से मुक्ति का उपाय सत् शब्द (सतनाम) है।

प्रश्न 3: “वेद कतेव धेरे इक ओरा” – क्या वेद-शास्त्र व्यर्थ हैं?

उत्तर: संत का आशय यह नहीं कि वेद-शास्त्रों का कोई महत्व नहीं, बल्कि यह है कि केवल उनके पठन-पाठन से मोक्ष नहीं होता। वे साधन हैं, साध्य नहीं। “नाम” ही साध्य है। वेद-शास्त्र भी नाम की महिमा का गान करते हैं, पर यदि उन्हें पढ़कर भी सतगुरु के सत पंथ पर न चला जाए, तो वे केवल बोझ हैं।

प्रश्न 4: “नाम बिहूना आवे जाही” का क्या अर्थ है?

उत्तर: नाम के बिना जीव बार-बार जन्म-मरण के चक्र (आवागमन) में फँसा रहता है। वह इस लोक से उस लोक, एक योनि से दूसरी योनि में भटकता रहता है। नाम ही वह साधन है जो इस चक्र को समाप्त करता है और जीव को सतलोक (परम धाम) में स्थापित करता है।

प्रश्न 5: “अवचल देही” किसे कहते हैं?

उत्तर: “अवचल” = अचल, स्थिर, नाशरहित; “देही” = शरीरधारी, आत्मा। अवचल देही वह आत्मा है जो नाशवान शरीर के बंधन से मुक्त होकर अपने शाश्वत स्वरूप में स्थित हो जाती है। नाम का भजन करने वाला इस अवस्था को प्राप्त करता है।

📝 नाम ही सार – भवसागर पार करने का एकमात्र साधन

यह संत वाणी हमें सृष्टि के मूल कारण – ओंकार – से लेकर नाम की सार्वभौमिक महिमा तक का विस्तृत ज्ञान देती है। संत कहते हैं कि निराकार से साकार हुआ, तीन लोक रचे गए, पर यह सब भ्रम है। सच्चा लक्ष्य चौथी अवस्था (तुरीय) को प्राप्त करना है, जो केवल सत् शब्द (सतनाम) के ज्ञान से संभव है।

वेद-शास्त्र (वेद कतेव) पढ़ने वाले पंडित भी इस रहस्य से वंचित रह जाते हैं, क्योंकि वे सतगुरु के सत पंथ पर नहीं चलते। सच्ची साधना वही है जो नाम को धारण करे, ममता का त्याग करे, और सतगुरु की शरण में रहे। नाम ही वह जहाज है जो भवसागर पार कराता है, नाम ही वह सार है जो आवागमन को नष्ट करता है।

इसलिए साधक को चाहिए कि वह सतनाम में विश्वास रखे, सतगुरु पर आस लगाए, और नाम भजन में लीन हो जाए। तब वह “अवचल देही” बनकर सतलोक को प्राप्त होगा, जहाँ न जरा, न मरण, न शोक, न ताप।

🙏 ॐ नमो भगवते सतनाम्ने || सतगुरु सतपंथाय नमः || तुरीय पद प्रदायकाय नमः ||

🧘 नाम एक सार जग माहीं
नाम बिहूना आवे जाही
श्रेणियां: Kabir Amritvani

सनातन संस्कृति एवं प्रामाणिक संपादन

यह भजन/आरती लिरिक्स भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों के संदर्भ में समीक्षा एवं संपादन के बाद प्रकाशित किया गया है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 10 Aug 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
(function() { let voiceCounter = 0; const answers = { "ध्यान": "ध्यान मन को स्थिर करने और भीतर विद्यमान चैतन्य (आत्मा) से जुड़ने का वैज्ञानिक मार्ग है। दैनिक १०-१५ मिनट का ध्यान तनाव को कम करता है, मस्तिष्क की एकाग्रता बढ़ाता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है। साधना खंड में हमारे 'श्लोक उच्चारण' व '४३२Hz ध्यान संगीत' का उपयोग करें।", "पंचांग": "वैदिक पंचांग काल-गणना की अत्यंत सटीक वैज्ञानिक प्रणाली है। यह मुख्य रूप से पांच अंगों: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण पर आधारित होती है। इसके माध्यम से सौर तथा चंद्र गतियों के अनुसार शुभ मुहूर्त और राहु काल की स्थिति की गणना की जाती है।", "चार धाम": "सनातन संस्कृति में चार धाम - उत्तर में श्री बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारकाधीश, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और दक्षिण में रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग हैं। इन चारों धामों की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने देश की भौगोलिक एवं आध्यात्मिक एकता को अक्षउन बना रखने के उद्देश्य से की थी।", "आज का पंचांग": "आज का पंचांग देखने के लिए कृपया हमारे 'आज का वैदिक पंचांग' विजेट को देखें। वर्तमान दिन के अनुसार तिथि तथा राहु काल की सटीक गणना वहां उपलब्ध है।", "गायत्री": "गायत्री महामंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः...) समस्त वेदों का सार माना गया है। यह सविता देव (सूर्य) की उपासना करता है ताकि हमारी बुद्धि सन्मार्ग की ओर प्रेरित हो। इसका नित्य उच्चारण बुद्धि तीव्र करता है।", "केदारनाथ": "केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के पवित्र हिमालय क्षेत्र में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह शिव जी के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसकी स्थापना पांडवों द्वारा की गई मानी जाती है और आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार किया था।" }; function matchResponse(query) { query = query.toLowerCase(); if (query.includes("ध्यान") || query.includes("meditation") || query.includes("sadhana")) { return answers["ध्यान"]; } else if (query.includes("पंचांग") || query.includes("panchang")) { return answers["पंचांग"]; } else if (query.includes("धाम") || query.includes("dham")) { return answers["चार धाम"]; } else if (query.includes("गायत्री") || query.includes("gayatri")) { return answers["गायत्री"]; } else if (query.includes("केदारनाथ") || query.includes("kedarnath")) { return answers["केदारनाथ"]; } else { return "वत्स! आपका प्रश्न अत्यंत कल्याणकारी है। सनातन मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग है। मन को शांत कर सत्यपथ पर चलें। क्या आप किसी विशिष्ट तीर्थ यात्रा अथवा दैनिक साधना के बारे में जानना चाहते हैं?"; } } window.readGuruVoice = function(text, btnId) { window.speechSynthesis.cancel(); const utterance = new SpeechSynthesisUtterance(text); utterance.lang = 'hi-IN'; utterance.rate = 0.85; const btn = document.getElementById(btnId); if (btn) { btn.innerHTML = ' श्रवण जारी है...'; } utterance.onend = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; utterance.onerror = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; window.speechSynthesis.speak(utterance); }; function initChatbot() { const launcher = document.getElementById('chatLauncher'); const drawer = document.getElementById('chatDrawer'); const closeBtn = document.getElementById('chatClose'); const input = document.getElementById('chatInput'); const sendBtn = document.getElementById('chatSendBtn'); const body = document.getElementById('chatBody'); if (!launcher || !drawer || !closeBtn || !input || !sendBtn || !body) { return; } launcher.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.toggle('open'); }); closeBtn.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.remove('open'); }); input.addEventListener('keydown', e => { if (e.key === 'Enter') { submitGlobalMessage(); } }); sendBtn.addEventListener('click', submitGlobalMessage); window.sendGlobalSuggestion = function(text) { input.value = text; submitGlobalMessage(); }; function submitGlobalMessage() { const query = input.value.trim(); if (query === "") return; // User Message bubble const userMsg = document.createElement('div'); userMsg.className = 'chat-msg user'; userMsg.textContent = query; body.appendChild(userMsg); input.value = ""; body.scrollTop = body.scrollHeight; // Typing Indicator const typingIndicator = document.createElement('div'); typingIndicator.className = 'chat-msg guru typing-indicator-container'; typingIndicator.innerHTML = `
`; body.appendChild(typingIndicator); body.scrollTop = body.scrollHeight; // Response Delay setTimeout(() => { if (body.contains(typingIndicator)) { body.removeChild(typingIndicator); } const responseText = matchResponse(query); const guruMsg = document.createElement('div'); guruMsg.className = 'chat-msg guru'; voiceCounter++; const btnId = `global-guru-speech-${voiceCounter}`; guruMsg.innerHTML = `
${responseText}
`; body.appendChild(guruMsg); body.scrollTop = body.scrollHeight; }, 1200); } } if (document.readyState === 'loading') { document.addEventListener('DOMContentLoaded', initChatbot); } else { initChatbot(); } })(); �थ": "केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के पवित्र हिमालय क्षेत्र में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह शिव जी के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसकी स्थापना पांडवों द्वारा की गई मानी जाती है और आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार किया था।" }; function matchResponse(query) { query = query.toLowerCase(); if (query.includes("ध्यान") || query.includes("meditation") || query.includes("sadhana")) { return answers["ध्यान"]; } else if (query.includes("पंचांग") || query.includes("panchang")) { return answers["पंचांग"]; } else if (query.includes("धाम") || query.includes("dham")) { return answers["चार धाम"]; } else if (query.includes("गायत्री") || query.includes("gayatri")) { return answers["गायत्री"]; } else if (query.includes("केदारनाथ") || query.includes("kedarnath")) { return answers["केदारनाथ"]; } else { return "वत्स! आपका प्रश्न अत्यंत कल्याणकारी है। सनातन मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग है। मन को शांत कर सत्यपथ पर चलें। क्या आप किसी विशिष्ट तीर्थ यात्रा अथवा दैनिक साधना के बारे में जानना चाहते हैं?"; } } let voiceCounter = 0; window.readGuruVoice = function(text, btnId) { window.speechSynthesis.cancel(); const utterance = new SpeechSynthesisUtterance(text); utterance.lang = 'hi-IN'; utterance.rate = 0.85; const btn = document.getElementById(btnId); btn.innerHTML = ' श्रवण जारी है...'; utterance.onend = () => { btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; utterance.onerror = () => { btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; window.speechSynthesis.speak(utterance); }; function submitGlobalMessage() { const query = input.value.trim(); if (query === "") return; // User Message bubble const userMsg = document.createElement('div'); userMsg.className = 'chat-msg user'; userMsg.textContent = query; body.appendChild(userMsg); input.value = ""; body.scrollTop = body.scrollHeight; // Typing Indicator const typingIndicator = document.createElement('div'); typingIndicator.className = 'chat-msg guru typing-indicator-container'; typingIndicator.innerHTML = `
`; body.appendChild(typingIndicator); body.scrollTop = body.scrollHeight; // Response Delay setTimeout(() => { body.removeChild(typingIndicator); const responseText = matchResponse(query); const guruMsg = document.createElement('div'); guruMsg.className = 'chat-msg guru'; voiceCounter++; const btnId = `global-guru-speech-${voiceCounter}`; guruMsg.innerHTML = `
${responseText}
`; body.appendChild(guruMsg); body.scrollTop = body.scrollHeight; }, 1200); } });