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Parvati Stotram

श्री सूक्तम् संस्कृत पाठ(Shri Suktam Lyrics in Sanskrit) - bhaktilok

471 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
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श्रीसूक्तम् संस्कृत पाठ(Shri Suktam Lyrics in Sanskrit) - 


श्री सूक्तम् संस्कृत पाठ(Shri Suktam Lyrics in Sanskrit) - bhaktilok

श्री सूक्तम् संस्कृत पाठ(Shri Suktam Lyrics in Sanskrit) - 


ॐ हिरण्यवर्णाम हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१॥


तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।

यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥२॥


अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।

श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मादेवी जुषताम्॥३॥


कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारां आद्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।

पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वयेश्रियम्॥४॥


चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियंलोके देव जुष्टामुदाराम्।

तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥५॥


आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तववृक्षोथ बिल्व:।

तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मी:॥६॥


उपैतु मां देवसख: कीर्तिश्चमणिना सह।

प्रादुर्भुतो सुराष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृध्दिं ददातु मे॥७॥


क्षुत्पपासामलां जेष्ठां अलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।

अभूतिमसमृध्दिं च सर्वानिर्णुद मे गृहात॥८॥


गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।

ईश्वरिं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥९॥


मनस: काममाकूतिं वाच: सत्यमशीमहि।

पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्री: श्रेयतां यश:॥१०॥


कर्दमेनप्रजाभूता मयिसंभवकर्दम।

श्रियं वासयमेकुले मातरं पद्ममालिनीम्॥११॥


आप स्रजन्तु सिग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।

नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥१२॥


आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टि पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥१३॥


आर्द्रां य: करिणीं यष्टीं सुवर्णां हेममालिनीम्।

सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आवह॥१४॥


तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।

यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥१५॥


य: शुचि: प्रयतोभूत्वा जुहुयाादाज्यमन्वहम्।

सूक्तं पञ्चदशर्च च श्रीकाम: सततं जपेत्॥१६॥


पद्मानने पद्मउरू पद्माक्षि पद्मसंभवे।

तन्मे भजसि पद्मक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्॥१७॥


अश्वदायै गोदायै धनदायै महाधने।

धनं मे लभतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे॥१८॥


पद्मानने पद्मविपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।

विश्वप्रिये विष्णुमनोनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि संनिधस्त्वं॥१९॥


पुत्रपौत्रं धनंधान्यं हस्ताश्वादिगवेरथम्।

प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे॥२०॥


धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्योधनं वसु।

धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरूणं धनमस्तु मे॥२१॥


वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृतहा।

सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिन:॥२२॥


न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभामति:।

भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्॥२३॥


सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांसुकगन्धमाल्यशोभे।

भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीदमह्यम्॥२४॥


विष्णुपत्नीं क्षमां देवी माधवी माधवप्रियाम्।

लक्ष्मीं प्रियसखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम्॥२५॥


महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि।

तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात्॥२६॥


श्रीवर्चस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते।

धान्यं धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायु:॥२७॥


ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


॥इति श्रीसूक्तं समाप्तम॥




🙏 भजन का विस्तृत अर्थ और भावार्थ (Lyrics Meaning)

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "श्री सूक्तम् संस्कृत पाठ(Shri Suktam Lyrics in Sanskrit) - bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व और आध्यात्मिक लाभ (Significance)

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि (Chanting Rules)

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 10 Aug 2026

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