bholenath bhajan lyrics

दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ लिरिक्स (Dil Tujhko Diya O Bhole Nath Lyrics in Hindi) - Bholenath Bhajan - Bhaktilok

135 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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"दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ" भगवान शिव के प्रति अनन्य समर्पण, अगाध प्रेम और पूर्ण शरणागति का एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण भजन है। यह भजन साधक के हृदय की उस पुकार को व्यक्त करता है जहाँ वह सांसारिक मोह-माया, राग-द्वेष और चिंताओं को त्यागकर अपना सर्वस्व देवादिदेव महादेव के चरणों में अर्पित कर देता है। इस भजन का मुख्य भाव 'समर्पण' (Surrender) और 'विनय' है, जो भक्ति मार्ग के सर्वोच्च सोपान माने जाते हैं। जब एक भक्त भगवान शिव की दिव्य लीलाओं, जैसे कि उनके डमरू की नाद, गंगा किनारे उनके पावन दर्शन और उनकी शांत ध्यानमग्न मुद्रा का स्मरण करता है, तो उसका मन स्वतः ही उनकी ओर खिंचा चला जाता है। यह भजन विशेष रूप से सावन के पवित्र महीने, महाशिवरात्रि, सोमवार के व्रत और शिव सत्संगों के दौरान गाया जाता है। इसकी सरल भाषा और हृदयस्पर्शी धुन भक्त को ध्यान की गहराइयों में ले जाने में पूरी तरह सक्षम है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

तूने ऐसा डमरू बजाया
तूने ऐसा डमरू बजाया
मेरा मन हर लिया ओ भोलेनाथ
दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ
दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ

तेरे चरणों में ध्यान लगाया
तेरे चरणों में ध्यान लगाया
मुझे अपना लिया ओ भोलेनाथ
मुझे अपना लिया ओ भोलेनाथ
दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ

अरे ओ भोलेनाथ मेरे भोलेनाथ
दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ
ये क्या कर दिया ओ भोलेनाथ

मैं तो बैठी थी गंगा किनारे
मै तो बैठी थी गंगा किनारे
आके दर्शन दिया ओ भोलेनाथ
दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ
दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ

अरे ओ भोलेनाथ मेरे भोलेनाथ
दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

"दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ" भजन का मूल अर्थ जीवात्मा का परमात्मा से मिलन और पूर्ण आत्मसमर्पण है। भजन की शुरुआत में भक्त कहता है कि हे भोलेनाथ! आपने अपने डमरू की ऐसी अलौकिक और दिव्य ध्वनि उत्पन्न की कि मेरा चंचल मन संसार के प्रपंचों से हटकर पूरी तरह से आपमें लीन हो गया। डमरू की ध्वनि यहाँ अनाहत नाद का प्रतीक है, जो ब्रह्मांड की आदि ध्वनि है और जो साधक के भीतर सोई हुई चेतना को जाग्रत करती है।

आगे भक्त कहता है कि जब मैंने आपके पावन चरणों में अपना ध्यान लगाया, तो आपने अपनी असीम करुणा के कारण मुझ जैसे साधारण जीव को भी अपना बना लिया। शिव की शरण में जाने पर जीव के सभी पाप, संताप और भय समाप्त हो जाते हैं। गंगा किनारे बैठने का प्रसंग अत्यंत प्रतीकात्मक है। गंगा ज्ञान, पवित्रता और वैराग्य की धारा है। गंगा किनारे बैठना इस बात का सूचक है कि भक्त सांसारिक कोलाहल से दूर, शांत चित्त होकर ईश्वर की प्रतीक्षा कर रहा था। ऐसे शांत और पवित्र क्षण में भगवान शिव ने स्वयं आकर उसे दर्शन दिए। यह दर्शाता है कि जब हृदय पवित्र और शांत होता है, तब ईश्वर का साक्षात्कार अत्यंत सुलभ हो जाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • समर्पण भाव (Complete Surrender): यह भजन भक्त के अहंकार को शून्य कर उसे पूरी तरह से शिव के चरणों में समर्पित करने की प्रेरणा देता है।
  • डमरू का आध्यात्मिक प्रतीक (Symbolism of Damru): डमरू की ध्वनि सृष्टि के सृजन, स्थिति और लय का प्रतीक है। भजन में डमरू बजाने का अर्थ है साधक के भीतर आध्यात्मिक जागृति पैदा करना।
  • गंगा तट का महत्व (Significance of Ganga Bank): गंगा तट साधना, वैराग्य और मानसिक शांति का उत्तम स्थान माना गया है। यह स्थान सांसारिक कोलाहल से दूर ईश्वर से जुड़ने का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • शिव की सुलभता (Accessibility of Shiva): शिव 'आशुतोष' हैं, जो बहुत जल्दी और केवल सच्चे भाव से प्रसन्न हो जाते हैं। भजन इस बात को रेखांकित करता है कि शिव अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन और श्रवण किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन कुछ विशेष अवसरों पर इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है:

  • शुभ समय: प्रातःकाल की पूजा या संध्याकालीन आरती के समय इस भजन को गाने से मन शांत और एकाग्र होता है।
  • विशेष अवसर: महाशिवरात्रि, सावन के सोमवार, प्रदोष व्रत और शिवरात्रि के पावन पर्व पर इस भजन का सामूहिक संकीर्तन अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • गायन विधि: शांत चित्त होकर, धूप-दीप जलाकर, भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग के समक्ष बैठकर इस भजन का गायन या श्रवण करना चाहिए। गाते समय हृदय में पूर्ण श्रद्धा और समर्पण का भाव होना आवश्यक है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन देवादिदेव महादेव (भगवान शिव) को समर्पित है, जो संहार और कल्याण के देवता हैं। इस भजन को प्रसिद्ध कथावाचक और भजन गायक श्री प्रदीप मिश्रा जी द्वारा गाया गया है। उन्होंने अपनी शिव महापुराण कथाओं के माध्यम से शिव भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया है। उनके द्वारा गाए गए भजनों में एक विशेष प्रकार की सादगी और भक्ति रस होता है, जो सीधे श्रोताओं के हृदय को स्पर्श करता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक शिव भक्ति की समृद्ध विरासत से प्रेरित है। आधुनिक समय में श्री प्रदीप मिश्रा जी के भजनों और शिव महापुराण कथाओं के माध्यम से इस भजन को अत्यधिक लोकप्रियता मिली है। इसकी पृष्ठभूमि भक्त और भगवान के बीच के सीधे और सरल संवाद पर आधारित है। इसमें किसी जटिल कर्मकांड की आवश्यकता नहीं बताई गई है, बल्कि केवल सच्चे मन से ध्यान लगाने और समर्पण करने की बात कही गई है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें लोक भाषा का सुंदर पुट भी शामिल है। इसकी काव्य शैली गेय (गाए जाने योग्य) है, जिसमें लय और ताल का अद्भुत समन्वय है। इसमें रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है, जो इसके सौंदर्य को और अधिक बढ़ाता है। सरल शब्दों के चयन के कारण इसे बच्चे से लेकर वृद्ध तक सभी आसानी से गा और समझ सकते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • मन की एकाग्रता: जैसे डमरू की ध्वनि मन को हर लेती है, वैसे ही हमें अपने बिखरे हुए विचारों को समेटकर ईश्वर की ओर एकाग्र करना चाहिए।
  • अहंकार का त्याग: "दिल तुझको दिया" का अर्थ है अपने अहंकार, बुद्धि और चतुरता को ईश्वर को सौंप देना। जब तक अहंकार रहता है, तब तक ईश्वर की प्राप्ति असंभव है।
  • धैर्य और प्रतीक्षा: गंगा किनारे बैठकर प्रतीक्षा करना यह सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए साधक में धैर्य और अटूट विश्वास होना आवश्यक है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द/वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
डमरू शिव का वाद्य यंत्र ब्रह्मांड की आदि ध्वनि (नाद ब्रह्म) का प्रतीक
मन हर लिया मन को आकर्षित करना सांसारिक मोह से मुक्त होकर ईश्वर में लीन होना
गंगा किनारे गंगा नदी का तट ज्ञान, पवित्रता और वैराग्य की अवस्था
ध्यान लगाया एकाग्र होना साधना और ईश्वर से सीधा जुड़ाव

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"तूने ऐसा डमरू बजाया, मेरा मन हर लिया ओ भोलेनाथ..."
हे शिव! आपके डमरू से निकलने वाली दिव्य ध्वनि ने मेरे भीतर के अज्ञान को नष्ट कर दिया है और मेरे चंचल मन को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। अब मेरा मन संसार की ओर नहीं, बल्कि आपकी ओर भागता है।

"तेरे चरणों में ध्यान लगाया, मुझे अपना लिया ओ भोलेनाथ..."
जब मैंने सब कुछ छोड़कर आपके पावन चरणों में अपना ध्यान केंद्रित किया, तो आपने अपनी असीम दयालुता दिखाते हुए मुझ जैसे दीन-हीन साधक को अपनी शरण में ले लिया और अपना बना लिया।

"मैं तो बैठी थी गंगा किनारे, आके दर्शन दिया ओ भोलेनाथ..."
मैं सांसारिक कोलाहल से दूर, अपने अंतःकरण को पवित्र कर गंगा के समान निर्मल भाव से आपकी प्रतीक्षा कर रही थी। मेरी इस मौन पुकार को सुनकर आपने स्वयं प्रकट होकर मुझे दर्शन दिए और कृतार्थ किया।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक गहराई से समझने के लिए भगवान शिव के इन पावन मंत्रों का स्मरण करना चाहिए:

ॐ नमः शिवाय।

त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम दिल तुझको दिया ओ भोलेनाथ
आराध्य देव भगवान शिव (भोलेनाथ)
मुख्य गायक श्री प्रदीप मिश्रा जी
भाषा हिंदी (खड़ी बोली)
मुख्य भाव समर्पण, श्रद्धा, वैराग्य
उपयुक्त अवसर सावन सोमवार, महाशिवरात्रि, शिव सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन को सुप्रसिद्ध कथावाचक और भजन गायक श्री प्रदीप मिश्रा जी ने गाया है।

इस भजन का मुख्य संदेश पूर्ण आत्मसमर्पण और अहंकार का त्याग है। जब भक्त अपना सर्वस्व शिव को सौंप देता है, तो शिव उसे अपना लेते हैं।

'गंगा किनारे' बैठना मन की पवित्रता, शांति और वैराग्य की अवस्था को दर्शाता है, जहाँ साधक सांसारिक चिंताओं से दूर ईश्वर का ध्यान करता है।

इसे प्रातःकाल या संध्याकाल की पूजा के समय गाना अत्यंत उत्तम माना जाता है। सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि पर इसका विशेष महत्व है।

डमरू की ध्वनि को सृष्टि की आदि ध्वनि (नाद ब्रह्म) माना जाता है। यह ध्वनि साधक के भीतर सोई हुई आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करती है।

हाँ, इसकी सरल भाषा और सहज धुन के कारण यह भजन शुरुआती साधकों के लिए मन को एकाग्र करने का एक बेहतरीन माध्यम है।

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जो अत्यंत सुबोध और गेय शैली में रचित है।

शिव जी अत्यंत सरल हृदय हैं और अपने भक्तों की थोड़ी सी पूजा और सच्चे भाव से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिए उन्हें 'भोलेनाथ' कहा जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस भजन के माध्यम से भगवान शिव के प्रति अनन्य भक्ति और समर्पण के भाव को बहुत ही सरल और सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है। हमारी संपादकीय टीम ने इस भजन के आध्यात्मिक पहलुओं, प्रतीकों और इसके महत्व का गहन विश्लेषण कर इसे पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक बनाया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद् शिव महापुराण (विभिन्न प्रसंग और कथाएं)
  • पारंपरिक शिव भजन संग्रह एवं लोक संगीत परंपरा
  • श्री प्रदीप मिश्रा जी के प्रवचन और भजन संकीर्तन

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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