Kabir Das Ke Dohe

कर गुजरान ग़रीबी में लिरिक्स (Kar Gujraan Garibi Me Lyrics in Hindi) - Kabir Bhajan by Prakash Gandhi - Bhaktilok

1,011 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

संत कबीर दास जी की वाणी सदैव ही सामान्य जनमानस के हृदय को स्पर्श करने वाली, सरल, सहज और गूढ़ आध्यात्मिक अर्थों से परिपूर्ण रही है। उनके दोहे और भजन न केवल साहित्यिक धरोहर हैं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाले दिव्य मार्गदर्शक भी हैं। प्रस्तुत भजन "कर गुजरान ग़रीबी में" संत कबीर की उस निर्गुण भक्ति परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो मनुष्य को संतोष, सादगी और ईश्वर के प्रति अनन्य शरणागति का संदेश देती है। इस भजन को प्रसिद्ध भजन गायक प्रकाश गांधी जी की मधुर वाणी में भक्तिलोक पर प्रस्तुत किया गया है। यह भजन हमें यह सिखाता है कि धन-दौलत, ऐश्वर्य और भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह में भटकते हुए मनुष्य को यदि शांति नहीं मिलती, तो ग़रीबी और अभाव के बीच भी ईश्वर का स्मरण करके परमानंद की प्राप्ति की जा सकती है। इस भजन का भाव यह है कि जब तक प्रभु कृपा नहीं होती, तब तक संसार के सारे सुख भी अधूरे हैं, और जब प्रभु का सान्निध्य प्राप्त हो जाता है, तो ग़रीबी की झोपड़ी भी स्वर्ग से बढ़कर हो जाती है। यह भजन साधक के अंतर्मन को शुद्ध करता है और उसे माया के बंधनों से मुक्त करके प्रभु चरणों में लीन करने की प्रेरणा देता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

कर गुजरान ग़रीबी में

कर गुजरान ग़रीबी में, ओ प्राणी,
कर गुजरान ग़रीबी में।
जो सुख पावे अमीरी में,
वो सुख नहीं ग़रीबी में।।
कर गुजरान ग़रीबी में।।

ऊँची हवेली देख के, तू मत ललचा मन,
जहाँ बसे हैं संत जन, वो झोपड़ी है मंदिर।
कर गुजरान ग़रीबी में।।

धन दौलत के पीछे भागे, क्या पाया तूने जग में,
जो पाया है उसी में, तू संतोष कर मन में।
कर गुजरान ग़रीबी में।।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।
कर गुजरान ग़रीबी में।।

जो नारायण भजते हैं, वो सुखी रहते हैं,
माया के बंधन में, वो कभी नहीं बंधते हैं।
कर गुजरान ग़रीबी में।।

कर गुजरान ग़रीबी में, ओ प्राणी,
कर गुजरान ग़रीबी में।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मुख्य संदेश अत्यंत गहन और आत्मिक है। संत कबीर जी कहते हैं कि हे प्राणी! तू अपना जीवन ग़रीबी में ही व्यतीत कर दे, अर्थात् सादगी और संतोष के साथ जीवन जी। यहाँ 'ग़रीबी' शब्द केवल आर्थिक विपन्नता का द्योतक नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक अवस्था का प्रतीक है जहाँ मनुष्य लोभ, मोह और अहंकार से मुक्त हो जाता है। भजन की दूसरी पंक्ति 'जो सुख पावे अमीरी में, वो सुख नहीं ग़रीबी में' का अर्थ है कि भौतिक वैभव में जो सुख मिलता है, वह क्षणभंगुर है, परंतु ग़रीबी में जो आत्मिक शांति और ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त होता है, वह शाश्वत है।

भजन के दूसरे अंतरे में कबीर जी कहते हैं कि ऊँची हवेलियों को देखकर तू लालच मत कर। जहाँ संत जन निवास करते हैं, वह झोपड़ी भी मंदिर के समान पवित्र होती है। यह पंक्ति हमें सिखाती है कि स्थान की भव्यता नहीं, बल्कि वहाँ निवास करने वाले व्यक्तियों की भक्ति और साधना महत्वपूर्ण है। तीसरे अंतरे में वे प्रश्न करते हैं कि धन-दौलत के पीछे भागकर तूने क्या पाया? जो मिला है उसी में संतोष करना सीख। संतोष ही सबसे बड़ा धन है। चौथे अंतरे में कबीर जी अपनी प्रसिद्ध वाणी 'कबीरा खड़ा बाज़ार में' के माध्यम से कहते हैं कि मैं तो सबकी भलाई चाहता हूँ, किसी से न दोस्ती, न बैर। यह समता का भाव है। अंतिम अंतरे में वे कहते हैं कि जो नारायण का भजन करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं और माया के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार यह भजन जीवात्मा को भौतिकता के दलदल से निकालकर आध्यात्मिकता के शिखर पर पहुँचाने का कार्य करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन संत कबीर की निर्गुण भक्ति धारा का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सादगी और संतोष का संदेश: यह भजन मनुष्य को अत्यधिक भौतिक महत्वाकांक्षा से दूर रहकर संतोषी जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
  • निर्गुण भक्ति: इसमें ईश्वर को निराकार और सर्वव्यापी मानकर उनके नाम स्मरण पर बल दिया गया है।
  • सामाजिक समरसता: 'ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर' पंक्ति समाज में प्रेम और सहिष्णुता का संदेश देती है।
  • आत्मिक शांति: इस भजन को सुनने और गाने से मन को असीम शांति मिलती है और चिंताएँ दूर होती हैं।
  • प्रकाश गांधी की स्वर लहरी: प्रकाश गांधी जी की भावपूर्ण प्रस्तुति इस भजन की आत्मा को और भी गहराई से छू लेती है।

इस भजन का महत्व इस बात में है कि यह किसी विशेष धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समस्त मानवता के लिए एक सार्वभौमिक संदेश लेकर आता है। यह हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आंतरिक शांति और ईश्वर प्रेम में है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

संत कबीर के भजनों का गायन किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन कुछ विशेष समय और विधियाँ हैं जो इसके प्रभाव को और अधिक बढ़ा देती हैं:

  • प्रातःकाल: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शुद्ध मन से इस भजन का गायन करने से दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा के साथ होती है।
  • संध्या काल: दिनभर के कार्यों के बाद शाम को दीप प्रज्वलित करके इस भजन को गाने से मन की थकान दूर होती है।
  • सत्संग में: संतों की संगति में या सत्संग सभा में इस भजन का गायन विशेष फलदायी माना जाता है।
  • विधि: किसी स्वच्छ आसन पर बैठकर, हाथ जोड़कर, श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ इस भजन का गायन करना चाहिए। साथ में ढोलक, मंजीरा या हारमोनियम का प्रयोग किया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन संत कबीर दास जी की वाणी पर आधारित है। संत कबीर जी 15वीं शताब्दी के महान संत और कवि थे, जिन्होंने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। इस भजन को प्रकाश गांधी जी ने अपनी मधुर आवाज में गाया है।

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागने के बजाय संतोष और सादगी के साथ जीवन जीना चाहिए। ईश्वर का स्मरण और भजन ही सच्चा सुख और शांति प्रदान करता है।

नहीं, संत कबीर की वाणी सार्वभौमिक है। यह भजन किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्त मानवता को संतोष, प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है।

इस भजन को प्रातःकाल या संध्या काल में किसी भी शुभ समय पर गाया जा सकता है। सत्संग में या एकांत में भक्ति भाव से गाने पर विशेष आनंद की प्राप्ति होती है।

हाँ, इस भजन के नियमित गायन और श्रवण से मानसिक शांति मिलती है, चिंता और तनाव दूर होता है, और जीवन में संतोष तथा आत्मिक आनंद की वृद्धि होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे संत कबीर दास जी की वाणी और निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है। भजन के बोल और भावार्थ को यथासंभव मूल भावना के अनुरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस भजन को श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ सुनें और अपने जीवन में संतोष तथा सादगी के संदेश को अपनाएँ।

संदर्भ: संत कबीर वाणी संग्रह, निर्गुण भक्ति परंपरा, और प्रकाश गांधी जी की भजन प्रस्तुति।

संबंधित भजन एवं लेख

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!