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सत्संग में बहनों आया करो लिरिक्स ( Satsang mein bahas aayo karo Lyrics in Hindi) - Satsang Bhajan - Bhaktilok

189 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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सत्संग में बहनों आया करो लिरिक्स - Satsang mein bahas aayo karo Lyrics

सत्संग केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव आत्मा के उत्थान, मन की शुद्धि और परमात्मा से सीधा संबंध जोड़ने का एक पावन माध्यम है। सनातन संस्कृति में सत्संग को 'सत् + संग' यानी सत्य और सतपुरुष का संग कहा गया है। यह पारंपरिक सत्संग भजन "सत्संग में बहनों आया करो" अत्यंत सरल, मधुर और ग्रामीण एवं शहरी दोनों परिवेशों में महिलाओं की मंडली द्वारा अत्यंत प्रेम से गाया जाने वाला लोकप्रिय भजन है। प्रसिद्ध गायिका रेखा गर्ग द्वारा स्वरबद्ध इस भजन में सनातन धर्म के समस्त प्रमुख देवी-देवताओं — श्री गणेश, ब्रह्मा-ब्रह्माणी, विष्णु-लक्ष्मी, शिव-पार्वती, राम-सीता, राधा-कृष्ण और नवदुर्गा — का क्रमिक रूप से आह्वान किया गया है। यह भजन हमें सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वरीय स्मरण और सामूहिक भजन-कीर्तन में भाग लेने की प्रेरणा देता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, भावार्थ, धार्मिक महत्व, और आध्यात्मिक संदेश का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:


सत्संग में बहनों आया करो.. (2)

इस सत्संग में गणपति जी आए.. (2)
संग में अपने रिद्धि सिद्धि लाएं.. (2)
सिद्धि का ध्यान लगाया करो, सत्संग में ना आया करो..
सत्संग में बहनों आया करो..

इस सत्संग में ब्रह्मा जी आए.. (2)
संग में अपने ब्रह्मणी को लाएं.. (2)
वेदों का ध्यान लगाया करो, सत्संग में बहनों..
सत्संग में बहनों आया करो..

इस सत्संग में विष्णु जी आए.. (2)
संग में अपने लक्ष्मी जी को लाए.. (2)
लक्ष्मी का ध्यान लगाया करो.. (2)
सत्संग में बहनों आया करो..

इस सत्संग में शंकर जी आए…. (2)
संग में अपने गौरा को लाएं.. (2)
गौरा का ध्यान लगाया करो, सत्संग में बहनों आया करो..
सत्संग में बहनों आया करो..

इस सत्संग में रामा जी आए.. (2)
संग में अपने सीता मां को लाए.. (2)
सीता-राम का ध्यान लगाया करो, सत्संग में बहनों आया करो..

इस सत्संग में कृष्णा जी आए… (2)
संग में अपनी राधा को लाए..
राधा-कृष्ण का ध्यान लगाया करो.. (2)
सत्संग में बहनों आया करो..

इस सत्संग में मैया जी आए.. (2)
संग में अपने नव दुर्गे लाई..
नव दुर्गे का ध्यान लगाया करो, सत्संग में बहनों आया करो..
सत्संग में बहनों आया करो..

--- गायिका: रेखा गर्ग (Singer - Rekha Garg) ---

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्हें दैनिक गृहस्थ जीवन की व्यस्तताओं से समय निकालकर सत्संग में आने का निमंत्रण और प्रेरणा देता है। भारतीय संस्कृति में नारी को गृह लक्ष्मी और परिवार की रीढ़ माना गया है, जो घर-परिवार संभालते हुए यदि ईश्वर की आराधना और सत्संग से जुड़ जाए, तो पूरा परिवार संस्कारित हो जाता है। भजन की हर पंक्ति में एक-एक देवी-देवता के आगमन और उनके गुणों का वर्णन है:

  • प्रथमेश गणेश एवं रिद्धि-सिद्धि: भजन की शुरुआत विघ्नहर्ता भगवान गणेश से होती है, जो अपनी शक्ति रिद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (बुद्धि-सफलता) के साथ सत्संग में पधारते हैं। यह संदेश है कि सत्संग से हमारे जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और बुद्धि व समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • सृष्टि रचयिता ब्रह्मा और ब्रह्माणी: ब्रह्मा जी वेदों और ज्ञान के प्रतीक हैं। उनका सत्संग में आना इस बात का संकेत है कि सत्संग में हमें ज्ञान, वेदों और सत्य का बोध प्राप्त होता है।
  • पालनकर्ता विष्णु और लक्ष्मी: भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी स्थिरता, पालन और वैभव के प्रतीक हैं। उनका स्मरण जीवन में सुख-शांति और आर्थिक स्थिरता लाता है।
  • योगेश्वर शिव और माता गौरा: भगवान शिव वैराग्य और कल्याण के देवता हैं तथा माता पार्वती शक्ति व प्रेम की प्रतीक हैं। उनका ध्यान हमारे मन को संयमी और पवित्र बनाता है।
  • मर्यादा पुरुषोत्तम राम और सीता: श्री राम और माता सीता धर्म, मर्यादा, त्याग और आदर्श पारिवारिक जीवन का पाठ पढ़ाते हैं।
  • प्रेम के अवतार राधा और कृष्ण: भगवान कृष्ण और राधा रानी अहैतुकी भक्ति, प्रेम और आनंद के प्रतीक हैं, जिनका स्मरण हृदय को प्रेम और आनंद से भर देता है।
  • शक्तिस्वरूपा नवदुर्गा: अंत में नौ देवियों (नवदुर्गा) का आह्वान किया गया है, जो साधक को शक्ति, साहस और आंतरिक ऊर्जा प्रदान करती हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, लयबद्धता और लोक-संस्कृति से जुड़ाव है। इसे किसी भी साधारण घरेलू अनुष्ठान, महिला कीर्तन मंडली, मंगलवार या शुक्रवार की पूजा, या किसी भी व्रत के दौरान आसानी से गाया जा सकता है। सामूहिक रूप से जब महिलाएं तालियों की गड़गड़ाहट के साथ इस भजन को गाती हैं, तो वातावरण पूरी तरह से चैतन्य और भक्तिमय हो जाता है। यह भजन मानसिक तनाव को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने में अत्यंत प्रभावी है। ऐसे भजनों से हमारी सनातन सांस्कृतिक और पारिवारिक परंपराएं जीवित रहती हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने के लिए कोई कठोर नियम नहीं है, फिर भी इसे निम्नलिखित अवसरों पर विशेष रूप से गाया जा सकता है:

  • दैनिक या साप्ताहिक महिला सत्संग मंडली के दौरान।
  • नवरात्रि, हरियाली तीज, करवा चौथ, या किसी भी व्रत-त्योहार की कथा के समय।
  • घर में किसी मांगलिक कार्य, सत्यनारायण कथा या गृह प्रवेश के अवसर पर।
  • प्रातःकाल या संध्याकालीन विश्राम के समय मानसिक शांति के लिए।

इसे हारमोनियम, ढोलक और मंजीरे की थाप के साथ गाया जाए तो इसका आनंद और प्रभाव द्विगुणित हो जाता है। भगवान के विग्रह या चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करके सामूहिक रूप से यह संकीर्तन करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा और पारिवारिक सौहार्द बढ़ता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन में सनातन धर्म के प्रमुख देव-पंथ के लगभग सभी प्रमुख स्वरूपों को सम्मिलित किया गया है। लोक-प्रसिद्ध भजन गायिका रेखा गर्ग जी ने अपनी मधुर वाणी में इस पारंपरिक शैली को पुनर्जीवित किया है। लोकगीतों और पारंपरिक भजनों की इस श्रेणी में महिलाओं की सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए ऐसे गीतों का विशेष स्थान रहा है। संत परंपरा में भी सत्संग को भवसागर से पार उतरने का सबसे सुगम मार्ग बताया गया है। जैसा कि तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में कहा है— "सत्संगत मुद मंगल दाता, होइ बिनु सत्संग विवेक न होई।"

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन उत्तर भारत की लोक-भक्ति परंपरा (Lok-Bhakti Parampara) से आया है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी महिलाओं द्वारा मौखिक रूप से गाए जाने वाले इन भजनों का कोई एक मूल रचयिता ज्ञात नहीं होता, बल्कि यह लोक-मानस की सहज अभिव्यक्ति हैं। समय के साथ विभिन्न कलाकारों जैसे रेखा गर्ग और अन्य भजन गायकों ने इसे आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ रिकॉर्ड किया और लोकप्रिय बनाया। इस प्रकार के भजन भारतीय ग्रामीण और अर्ध-शहरी संस्कृति की उस थाती का हिस्सा हैं जहाँ समाज सामूहिक रूप से मिलकर ईश्वर का गुणगान करता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल ठेठ हिंदी एवं ब्रज-अवधि मिश्रित लोक-बोली है, जिसे हर उम्र की महिलाएं आसानी से समझ और गा सकती हैं। इसमें पुनरावृत्ति (Repetition) शैली का सुंदर प्रयोग हुआ है जैसे "आया करो.. आया करो" और "लाए.. लाए..", जो गाने वाले और सुनने वाले दोनों के मन में एक गहरा सम्मोहन और लेयात्मक प्रभाव पैदा करता है। इसमें रूपक अलंकार और आह्वान शैली का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल गाने के लिए नहीं है, बल्कि इसके भीतर गहरा जीवन-दर्शन छिपा है:

  1. सामूहिक साधना का महत्व: अकेले पूजा करने की अपेक्षा सामूहिक सत्संग से ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है।
  2. समर्पण भाव: देवी-देवताओं को उनके परिवार (पत्नियों) के साथ आमंत्रित करना परिवार में एकता, प्रेम और सामंजस्य का प्रतीक है।
  3. नारियों की आध्यात्मिक भूमिका: घर-परिवार संभालने वाली महिलाओं के लिए सत्संग मानसिक शांति और नैतिक शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत है।
  4. नित्य स्मरण: जीवन की भागदौड़ में ईश्वर को न भूलकर नियमित रूप से उनका ध्यान लगाना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
सत्संग सत्य का संग, अच्छी संगति ईश्वर और संतों के सान्निध्य में बैठना
गणपति गणों के स्वामी, गणेश जी विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य
रिद्धि-सिद्धि सफलता और समृद्धि भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियां
ब्रह्मणी ब्रह्मा जी की शक्ति (सरस्वती) ज्ञान, विद्या और वाणी की देवी
गौरा माता पार्वती (गौरी) सौंदर्य, तपस्या और शक्ति की प्रतीक
संकीर्तन मिलकर ईश्वर का गुणगान भक्ति का सबसे सरल मार्ग

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"सत्संग में बहनों आया करो.."
गायिका सभी महिलाओं से आह्वान कर रही हैं कि वे अपने घरेलू कार्यों से थोड़ा समय निकालकर साप्ताहिक या दैनिक सत्संग में अवश्य पधारें, क्योंकि यहाँ आकर मन को जो शांति मिलती है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।

"इस सत्संग में गणपति जी आए.. संग में अपने रिद्धि सिद्धि लाएं.."
जब हम सत्संग में आते हैं, तो प्रथम पूज्य भगवान गणेश अपनी दोनों शक्तियों—रिद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (उपलब्धि)—के साथ हमारे जीवन के सभी संकटों को हरने के लिए उपस्थित होते हैं।

"ब्रह्मा जी आए.. विष्णु जी आए.. शंकर जी आए.."
सृष्टि के संचालनकर्ता ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव अपने-अपने शक्ति स्वरूपों (सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती) के साथ इस पवित्र भजन कीर्तन में विराजमान होते हैं और भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।

"रामा जी आए.. कृष्णा जी आए.. नव दुर्गे लाई.."
मर्यादा और प्रेम के प्रतीक श्री राम-सीता, राधा-कृष्ण तथा दुष्टों का संहार करने वाली नवदुर्गा सभी इस सत्संग रूपी यज्ञ में उपस्थित होकर भक्तों के भाव को स्वीकार करते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव से संबंधित निम्नलिखित पावन श्लोक का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है:

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।।"

अर्थात: सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों, सभी का कल्याण हो और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े—यही सत्संग की मूल भावना है।

इसके अतिरिक्त भगवान श्री गणेश के इस मंत्र का स्मरण भी किया जा सकता है: वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ, जो हर शुभ कार्य की शुरुआत में पढ़ा जाता है। भगवान शिव की आराधना के लिए आप शिव तांडव स्तोत्र का पाठ भी देख सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण तथ्य / जानकारी
भजन का नाम सत्संग में बहनों आया करो (Satsang mein bahas aayo karo)
प्रकार पारंपरिक सत्संग भजन / लोकगीत
प्रमुख गायिका रेखा गर्غ (Rekha Garg)
भाषा सरल हिंदी / लोक बोली
मुख्य विषय ईश्वर स्मरण, महिला सत्संग, सामूहिक भक्ति
भाव (Bhava) भक्ति, प्रेम, उत्साह और समर्पण
उपयुक्त अवसर महिला कीर्तन, व्रत, कथा, सत्संग सभा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह एक पारंपरिक लोक भजन है जिसे कई प्रसिद्ध लोकगायिकाओं ने गाया है, जिनमें प्रमुख रूप से गायिका रेखा गर्ग (Rekha Garg) का नाम लिया जाता है।

सत्संग से मन को शांति मिलती है, वैचारिक शुद्धि होती है, तनाव दूर होता है और ईश्वर के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना जाग्रत होती है।

इस भजन में भगवान गणेश (रिद्धि-सिद्धि सहित), ब्रह्मा-ब्रह्माणी, विष्णु-लक्ष्मी, शिव-पार्वती, राम-सीता, राधा-कृष्ण और नवदुर्गा का क्रमिक रूप से आह्वान किया गया है।

हाँ, यह विशेष रूप से महिलाओं की कीर्तन मंडली और घरेलू सत्संग कार्यक्रमों के लिए ही रचा गया है। इसे ढोलक और मंजीरे के साथ बहुत आनंद से गाया जाता है।

पारंपरिक लोक भजन पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को जीवित रखते हैं। यह बिना किसी कठिन ग्रंथ के ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाते हैं।

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त, संध्याकाल या साप्ताहिक अवकाश के दिन (विशेषकर एकादशी, प्रदोष या व्रत के दिनों में) सत्संग का आयोजन अत्यंत फलदायी होता है।

बिल्कुल नहीं। इसकी लय बहुत सरल और एक जैसी है। एक बार अंतरा और मुखड़ा समझ लेने के बाद इसे कोई भी आसानी से गा सकता है।

घर में होने वाले सत्संग और भजनों को सुनकर बच्चों के मन में देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा, आदर और नैतिक मूल्यों के संस्कार स्वतः ही स्थापित हो जाते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिकुल (Bhaktilok) पर प्रकाशित यह सामग्री पारंपरिक लोक-साहित्य, कीर्तन संग्रह और शास्त्रीय भक्ति परंपराओं के अध्ययन पर आधारित है। इस आलेख को पाठकों की सुगमता और प्रामाणिकता को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है जो उपयोगकर्ताओं को शुद्ध लिरिक्स और विस्तृत भावार्थ प्रदान करती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक लोक भजन संग्रह एवं महिला कीर्तन परंपरा
  • श्रीमद्भागवत गीता एवं रामचरितमानस (संत संग महिमा)
  • लोक-साहित्य और भजन संस्कृति के विविध आयाम

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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