जब पूरण प्रेम लगा दिल में (Jab Puran Prem Laga Dil Mien Lyrics in Hindi) - एक दिव्य निर्गुणी सत्संगी भजन
भक्ति और अध्यात्म के असीम सागर में 'जब पूरण प्रेम लगा दिल में' (Jab Puran Prem Laga Dil Mien) एक अत्यंत पावन, दार्शनिक और अंतःचेतना को झकझोर देने वाला निर्गुणी सत्संगी भजन है। संत ब्रह्मानंद जी द्वारा रचित और प्रसिद्ध गायक के.सी. निमेश (KC Nimesh) की मधुर एवं गंभीर वाणी में गाया गया यह भजन भौतिक बंधनों, कर्म-कांडीय सीमाओं और सांसारिक रूढ़ियों से परे जाकर आत्मिक प्रेम और ब्रह्म-मिलन के सर्वोच्च मार्ग को प्रशस्त करता है। जब किसी साधक के हृदय में परमात्मा के प्रति सच्चा, अहैतुक और 'पूरण प्रेम' (पूर्ण प्रेम) जागृत होता है, तब संसार के सभी कृत्रिम नियम, बंधन और द्वैतभाव स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। यह भजन न केवल सत्संग प्रेमियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है, बल्कि उन सभी साधकों के लिए एक मार्गदर्शिका है जो अद्वैत वेदांत और निर्गुण भक्ति की गहराई को आत्मसात करना चाहते हैं। इसे विशेष रूप से ब्रह्म मुहूर्त की साधना, संध्याकालीन सत्संग, संतों के समागम और ध्यान सत्रों के दौरान गाया व श्रवण किया जाता है, जिससे मन को असीम शांति और आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन - शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:
मुखाड़ा (Refrain):
जब पूरण प्रेम लगा दिल में,
तब नेम का बंधन छूट गया।
कोई पण्डित लोग बतावत है,
समझावत रीतन को।
जब प्रीतम से दृढ़ प्रीत भई,
सब रीत का बंधन टूट गया।
पूरण प्रेम लगा दिल में,
तब नेम का बंधन छूट गया।
प्रथम अंतरा:
कोई तीरथ दर्शन जावत है,
कोई मंदिर में नित दर्शन को।
घट भीतर देव दीदार हुआ,
तब से मन ये रूठ गया।
पूरण प्रेम लगा दिल में,
तब नेम का बंधन छूट गया।
द्वितीय अंतरा:
कोई जीव कहे कोई ईश कहे,
कोई गावत ब्रह्म निरंजन को।
जब अंदर बाहर एक हुआ,
सब द्वैत का परदा फुट गया।
पूरण प्रेम लगा दिल में,
तब नेम का बंधन छूट गया।
पूरण प्रेम लगा दिल में,
तब नेम का बंधन छूट गया।
Song: Ja Puran Prem Laga Dil Mein
Singer: KC Nimesh
Writer: Brahmanand
Video: Shree Kreates
Category: Hindi Devotional (Satsangi Bhajan)
Producers: Amresh Bahadur - Ramit Mathur
Label: Yuki
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
संत ब्रह्मानंद जी द्वारा रचित इस अद्भुत निर्गुणी भजन का मर्म अत्यधिक गहरा और दार्शनिक है। भजन के मुखड़े में कवि कहते हैं कि जब मनुष्य के हृदय में परमात्मा के प्रति 'पूर्ण प्रेम' यानी अहैतुक भक्ति का संचार होता है, तब दुनिया के बनाए गए नियम, धर्म-कर्म के विधान और संकुचित नेम-धर्म के बंधन स्वतः ढीले पड़कर छूट जाते हैं। सांसारिक लोग या पण्डित-पुरोहित अक्सर कर्मकांड और बाहरी रीतियों-रिवाजों को ही धर्म मानकर समझाते रहते हैं, किंतु जब साधक की प्रीति अपने वास्तविक प्रीतम (परमात्मा) से दृढ़ हो जाती है, तो वह समाज की सभी कृत्रिम रीतियों के बंधनों से मुक्त हो जाता है।
प्रथम अंतरे में संत जी समझाते हैं कि दुनिया के लोग भगवान को पाने के लिए विभिन्न तीर्थों की यात्रा करते हैं, मंदिरों में दर्शन के लिए कतारों में खड़े होते हैं। किंतु जिस साधक को अपने ही 'घट भीतर' (हृदय की गहराइयों में) अपने आराध्य देव के दर्शन हो जाते हैं, उसका बाहरी दुनिया से मन रूठ जाता है यानी उसकी आसक्ति बाहरी दिखावों से समाप्त होकर अंतर्मुखी हो जाती है। उसे समझ आ जाता है कि ईश्वर बाहर नहीं, बल्कि भीतर ही विराजमान हैं।
द्वितीय अंतरे में अद्वैत दर्शन का चरम रूप प्रकट होता है। संसार में कोई जीव (आत्मा) की बात करता है, कोई ईश्वर (परमात्मा) की, तो कोई निराकार ब्रह्म निरंजन का गुणगान करता है। परंतु जब साधक की साधना परिपक्व होती है और उसका 'अंदर और बाहर' एक हो जाता है (अर्थात घट-घट व्यापी ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है), तब जीव और ब्रह्म के बीच का सारा द्वैत भाव और भेद-भाव का पर्दा हमेशा के लिए फूट जाता है। तब केवल अद्वैत और असीम आनंद ही शेष रहता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह निर्गुणी सत्संगी भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि वेदों और उपनिषदों के अद्वैत ज्ञान का सरल काव्यात्मक रूप है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- अद्वैत दर्शन का संदेश: यह भजन जीव और ब्रह्म की एकता को स्थापित करता है और बाहरी पाखंडों से ऊपर उठकर आंतरिक प्रेम को सर्वोपरि मानता है।
- प्रेम की सर्वोच्चता: इसमें ज्ञान, योग और कर्म से भी ऊपर 'प्रेम भक्ति' (प्रेम लक्षणा भक्ति) को मुक्ति का एकमात्र द्वार बताया गया है।
- मानसिक शांति और अंतर्मुखता: इस भजन के श्रवण से मन बाहरी कोलाहल से हटकर अंतःकरण की यात्रा पर अग्रसर होता है।
- सत्संग परंपरा का आधार: उत्तर भारत और विशेषकर कबीरपंथी व निर्गुणी संप्रदायों के सत्संगों में यह भजन आत्म-ज्ञान प्राप्ति का मुख्य माध्यम माना जाता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस प्रकार के दार्शनिक और निर्गुणी भजनों को गाने और सुनने के लिए एक निश्चित मानसिक स्थिति और वातावरण की आवश्यकता होती है:
- ब्रह्म मुहूर्त एवं संध्याकाल: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्या के शांत समय में इस भजन का स्मरण करने से मन को अत्यधिक शांति मिलती है।
- सत्संग एवं ध्यान सत्र: साप्ताहिक या मासिक सत्संग सभाओं, ध्यान शिविरों (Meditation Sessions) तथा प्रवचन के आरंभ में इस भजन का गान माहौल को आध्यात्मिक बनाता है।
- एकांत साधना: जब साधक एकांत में बैठकर आत्ममंथन करना चाहे, तब इस भजन की पंक्तियाँ आंतरिक चेतना को जागृत करती हैं।
- शुद्ध उच्चारण: भजन गाते समय शब्दों के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करें, जिससे भाव सीधे हृदय तक पहुंच सके।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के रचनाकार संत ब्रह्मानंद जी हैं, जो निर्गुण धारा और संत परंपरा के महान मर्मज्ञ रहे हैं। इस भजन में किसी एक साकार देवता की पूजा के स्थान पर 'निराकार ब्रह्म', 'आत्म-स्वरूप' और 'घट-वासी प्रीतम' की आराधना का विधान है। इसमें ब्रह्म, निरंजन और अंतःकरण में बसे परमात्मा को ही सर्वव्यापी माना गया है। संत परंपरा में इस प्रकार के भजनों का उद्देश्य मनुष्य को उसके मूल स्वरूप (आत्मा) से परिचित कराना है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
संत ब्रह्मानंद जी की रचनाएं हमेशा से पारंपरिक रूढ़ियों और बाहरी आडंबरों पर सीधा प्रहार करती रही हैं। 'जब पूरण प्रेम लगा दिल में' भजन की पृष्ठभूमि भारतीय दर्शन के उस काल से जुड़ी है जहाँ समाज विभिन्न जातियों, पंथों, तीर्थों और कर्मकांडों में उलझा हुआ था। संत महात्माओं ने लोगों को यह समझाने का प्रयास किया कि जब तक हृदय में सच्चा प्रेम उत्पन्न नहीं होता, तब तक सारे बाहरी अनुष्ठान व्यर्थ हैं। के.सी. निमेश की soulful आवाज़ ने इस प्राचीन रचना को आधुनिक डिजिटल माध्यमों (जैसे Yuki Music चैनल) के माध्यम से घर-घर तक पहुँचाया है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सहज और आम जनमानस की समझ में आने वाली सदुकड़ी / ब्रधी-मिश्रित हिंदी (संत भाषा) है। इसमें रूपक अलंकार और दार्शनिक प्रतीकों का सुंदर प्रयोग किया गया है:
- प्रतीकात्मक भाषा: 'नेम का बंधन', 'रीत का बंधन', 'द्वैत का परदा' जैसे शब्द मानसिक और सामाजिक सीमाओं के प्रतीक हैं।
- लयबद्धता: भजन की ताल और धुन इतनी कर्णप्रिय है कि एक बार सुनने के बाद इसके बोल लंबे समय तक स्मरण रहते हैं।
- भावनात्मक गहराई: प्रत्येक पंक्ति सीधे पाठक के हृदय को छूती है और उसे आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरित करती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमारे दैनिक जीवन के लिए अत्यंत गहरी सीख देता है:
- आडंबरों से मुक्ति: केवल बाहरी तीर्थाटन और दिखावे के कर्मकांड से ईश्वर नहीं मिलते, इसके लिए हृदय की पवित्रता और सच्चा प्रेम आवश्यक है।
- प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म: जब जीवन में प्रेम और समर्पण आ जाता है, तो सारे द्वेष, ईर्ष्या और संकुचित नियम स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
- भीतर की यात्रा: ईश्वर बाहर नहीं, हमारे अपने भीतर (घट भीतर) ही निवास करते हैं। आवश्यकता केवल अपनी दृष्टि को अंतर्मुखी बनाने की है।
- भेद-भाव का अंत: जीव और ईश का भेद केवल अज्ञानता के कारण है; ज्ञान और प्रेम के उदय होते ही सारे द्वैत मिट जाते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| पूरण प्रेम | पूर्ण और अहैतुक प्रेम | परमात्मा के प्रति बिना किसी स्वार्थ की सच्ची भक्ति |
| नेम का बंधन | नियम और अनुष्ठान की सीमाएं | धर्म के नाम पर जकड़े गए बाहरी कर्मकांड |
| रीत | रीति-रिवाज और परंपराएं | समाज द्वारा बनाई गई रूढ़ियां |
| घट भीतर | शरीर या हृदय के अंदर | आत्मा का निवास स्थान जहाँ परमात्मा का अनुभव होता है |
| ब्रह्म निरंजन | माया रहित निराकार परमेश्वर | समस्त ब्रह्मांड के आदि स्रोत |
| द्वैत का परदा | भेदभाव का आवरण | यह भावना कि मैं और भगवान अलग-अलग हैं |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
पंक्ति: "जब पूरण प्रेम लगा दिल में, तब नेम का बंधन छूट गया।"
भावार्थ: कवि कहते हैं कि जब हृदय में परमात्मा के प्रति सच्चा और पूर्ण प्रेम उत्पन्न होता है, तब संसार के सभी कृत्रिम नियम और बंधन स्वतः टूट जाते हैं। प्रेम किसी नियम का मोहताज नहीं होता।
पंक्ति: "कोई पण्डित लोग बतावत है, समझावत रीतन को। जब प्रीतम से दृढ़ प्रीत भई, सब रीत का बंधन टूट गया।"
भावार्थ: ज्ञानी या पंडित लोग अक्सर शास्त्रों और पुरानी रीतियों का पाठ पढ़ाते रहते हैं, परंतु जब एक बार जीव की सच्ची प्रीत अपने प्रीतम (भगवान) से हो जाती है, तो वह इन तमाम सामाजिक बंधनों से मुक्त हो जाता है।
पंक्ति: "घट भीतर देव दीदार हुआ, तब से मन ये रूठ गया।"
भावार्थ: जब साधक को अपने ही हृदय के भीतर ईश्वर के दर्शन हो जाते हैं, तब उसका मन बाहरी दुनिया के प्रपंचों और दिखावों से हमेशा के लिए विरक्त (रूठ) हो जाता है।
पंक्ति: "जब अंदर बाहर एक हुआ, सब द्वैत का परदा फुट गया।"
भावार्थ: अद्वैत की स्थिति तब आती है जब साधक को यह अनुभव होता है कि जो बाहर है वही भीतर है। इसके साथ ही जीव और ईश्वर के बीच का द्वैत भाव हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस निर्गुणी भजन के भाव को पुष्ट करने वाले प्रमुख वैदिक एवं पौराणिक संदर्भ निम्नलिखित हैं:
- ईोपनिषद मंत्र: "ईस्ावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" - इस संपूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है।
- श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 18, श्लोक 66): "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" - सभी धर्मों और कर्मकांडों को छोड़कर केवल मुझ एक शरण में आओ।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| भजन का नाम | जब पूरण प्रेम लगा दिल में (Jab Puran Prem Laga Dil Mien) |
| गायक (Singer) | के.सी. निमेश (KC Nimesh) |
| रचयिता (Writer) | संत ब्रह्मानंद जी |
| संगीत लेम्बल | युकी (Yuki Music) |
| शैली | निर्गुणी सत्संगी भजन |
| मुख्य भाव | अद्वैत प्रेम, आत्म-साक्षात्कार और बंधन मुक्ति |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, ध्यान, ब्रह्म मुहूर्त साधना |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संत ब्रह्मानंद जी के निर्गुणी दर्शन और के.सी. निमेश द्वारा गाए गए लोकप्रिय सत्संगी भजन के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध गीत के बोल, उसका दार्शनिक अर्थ और आध्यात्मिक महत्व प्रदान करना है। यह सामग्री पूरी तरह से संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जो सनातन भक्ति परंपरा और सत्संग साहित्य पर आधारित है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- संतवाणी संग्रह एवं निर्गुणी साहित्य ग्रंथ
- उपनिषद और अद्वैत वेदांत के दार्शनिक सिद्धांत
- Yuki Music ऑफिशियल डिवोशनल आर्काइव
- पारंपरिक सत्संग भजन संकलन
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